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बच्चों को उम्र के अनुसार ज़िम्मेदारियां देना उनके विकास के लिए ज़रूरी है!

एक मां की आपबीती, जो आपको सही परवरिश के लिए प्रेरित करेगी

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
September 17, 2022
in पैरेंटिंग, रिलेशनशिप
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responsible parenting
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बच्चों पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान देना, उन्हें ज़रूरत से ज़्यादा सुविधाएं देना आपको यूं महसूस करा सकता है, जैसे आप बहुत की केयरिंग पैरेंट हैं, लेकिन ऐसा कर के आप बच्चों के व्यक्तित्व का सही विकास नहीं कर सकेंगे. हिताशा मेरानी, जो एक मां और आक्यपेशनल थेरैपिस्ट हैं, की आपबीती सुन कर आपको एहसास हो जाएगा कि क्यों बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार ज़िम्मेदारियां देना ज़रूरी है.

‘‘मैं अपने बच्चे का ज़रूरत से ज़्यादा ख़याल रखती थी, उसे बहुत प्रोटेक्ट कर के रखती थी और मुझे इस बात का एहसास भी नहीं था. मुझे इस बात का पता तब चला, जब मैंने बतौर आक्यपेशनल थेरैपिस्ट एक स्कूल के साथ बहुत लंबे समय तक काम किया है. मेरे काम के चलते प्री प्राइमरी से ग्रेड फ़ाइव तक के ऐसे बच्चों के पैरेंट्स के साथ मिलना जुलना होता था, जिनके व्यवहार में कोई समस्या थी या जो बहुत अटेंशन चाहते थे. तब मुझे एहसास हुआ कि बच्चों के ऐसे व्यहार के पीछे, उनके परिवार का वातावरण कितनी अहम् भूमिका निभाता है. यही वो मुख्य चीज़ होती है, जिसकी वजह से बच्चा वो व्यवहार करता है, जो कि वो करता है.

‘‘ऐसे बच्चों और उनके पैरेंट्स से बात करती तो मुझे लगता मैं जैसे ख़ुद ही किसी आईने के सामने खड़ी हूं, जहां मुझे इस बात का एहसास हो रहा था कि मैं भी ये तो करती हूं. जब मैं उनको कुछ कहती थी, जैसे- आप बच्चे को कुछ ज़िम्मेदारियां दो तो मेरे अंदर की आवाज़ मुझे कहती थी कि क्या तुमने ये किया है, जो तुम इन्हें करने को कह रही हो? जैसे-जैसे मैं अलग-अलग पैरेंट्स के साथ, अलग-अलग बच्चों की अलग-अलग समस्याओं के बारे में बात करती जाती थी और उनकी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं मिलती थीं, उनकी सोच पता चलती थी तो यूं लगता जैसे मैं तो उनकी मदद कर ही रही हूं, लेकिन हर बच्चा और हर पैरेंट कुछ न कुछ मुझे भी सिखा कर जाता है.

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‘‘मैंने यह भी क़रीब से देखा कि ज़्यादातर पैरेंट्स अपने बच्चों को ज़रूरत से ज़्यादा ख़्याल रखते हैं. मुझे यह एहसास हुआ कि मैं ख़ुद भी यह कर रही हूं.  हम बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार छोड़ नहीं पाते हैं. हम इसलिए ओवरकेयर करते हैं कि कही बच्चा हर्ट न महसूस करे, बुरा न महसूस करे, कहीं उसका आत्मविश्वास कम न हो जाए. जबकि सच्चाई इसके ठीक उलट है, आप उसे जितना छोड़ेंगे वो उतना आत्मविश्वासी बनेगा. जब बच्चे चलना सीखते हैं तो कहते हैं ना कि अगर गिरेगा नहीं तो चलना कैसे सीखेगा? यह बहुत ज़रूरी हो जाता है कि हम उन्हें इवॉल्व होने दें.

‘‘जब तक वे छोटे हैं, हमारा ओवर प्रोटेक्टिव होना बहुत सामान्य है और पूरी तरह स्वीकार्य भी है. लेकिन कब उन्हें छोड़ देना चाहिए, कब इस चीज़ को कम करना है यह बात भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. क्योंकि केवल उनका शारीरिक विकास ही महत्वपूर्ण नहीं है, भावनात्मक और मानसिक विकास भी उतना ही महत्व रखता है. इससे बच्चा ज़िम्मेदार बनेगा. आप ही सोचिए क्या यह सही नहीं है कि जब वह ख़ुद बाहर निकलेगा दुनिया में तो यह ज़्यादा मायने रखेगा कि क्या उसे पैसों का लेनदेन आता है, क्या वह दुकान से जा कर कुछ ख़रीद सकता है, क्या उसको दूसरों से मदद मांगना आता है, क्या वह नए लोगों से मिल कर यह समझ सकता है कि उसे किस पर भरोसा करना है? ये बहुत बुनियादी बातें हैं, पर यही बातें बहुत ज़्यादा ज़रूरी भी हैं. तो हमें बच्चे को उस स्तर तक इक्विप करना होगा.

‘‘जब मैंने बच्चों और पैरेंट्स से बात कर के यह महसूस करना शुरू किया कि अरे इसमें तो कुछ कुछ झलक मेरे जैसी है तो मेरे लिए यह आंखें खोल देने वाला अनुभव था. मैंने धीरे-धीरे कर के चीज़ों को छोड़ना शुरू किया अपने बच्चे को कमान देना शुरू किया. जैसे बच्चों के विकास के हर पड़ाव के लिए एक चाइल्ड डवलपमेंट चार्ट आता है, कि इतने महीने तक बच्चे को टर्न होना चाहिए, इतनी उम्र तक बैठना चाहिए, इतनी उम्र तक चलना चाहिए, ऐसे ही मुझे लगता है कि एक माइलस्टोन चार्ट पैरेंट्स के लिए भी आना चाहिए, ताकि वो जान सकें कि कब उनको बच्चों को कितनी ज़िम्मेदारी या कितनी ढील देनी है. जिससे पता चले कि इस उम्र तक आपको बच्चे को अपने बिल्डिंग प्रिमाइसेस में अकेले भेजना चाहिए, इतनी उम्र तक नज़दीकी स्टोर से सामान लेने भेज सकते हैं.

‘‘मेरे लिए अपने बच्चे को ज़िम्मेदारी सौपना आसान नहीं था. जब मैंने पहली बार अपने बच्चे को एक छोटा सामान लेने पास की दुकान तक भेजा था तो उसे ढेर सारे इन्स्ट्रक्शन्स दिए थे. उस दिन उसे ये पता चला कि घर में सामान लाने वाले बैग कहां रखे हैं, मेरा पर्स कहां है, उसके अंदर वॉलेट कहां है… ऐसी ही और भी कई बातें. हम उसे ब्रेड लेने भेज रहे हैं, लेकिन इस एक काम से बच्चे ने कितने स्किल्स सीखे यह बात ग़ौर करने वाली है. ये बातें आप बच्चों को तब तक नहीं सिखा सकते, जब तक वे प्रैक्टिकली इसे करें नहीं. यदि हम बच्चों को उनकी उम्र के मुताबिक़ ज़िम्मेदारियां नहीं देते तो हम बच्चे से ये सारे अनुभव छीन लेते हैं.

‘‘मुझे अपना व्यवहार बदलने में डेढ़ से दो सालों का समय लगा. पहले मैं किसी काम के लिए भेजते समय यदि अपने बच्चे को 10 इन्स्ट्रक्शन्स देती थी तो कम कर के 8 किए फिर 6 यूं समझिए कि आख़िरी के दो तो छोड़ना बहुत मुश्क़िल लग रहा था. छूटते ही नहीं थे. इसी बीच एक दिन जब मैंने अपने बेटे को किसी काम के लिए बाहर जाने को कहा तो मेरे कहने से पहले ही उसने वो सारे इन्स्ट्रक्शन्स दोहरा दिए और कहा कि मैं इन सभी बातों का ध्यान रखूंगा.

‘‘तब मुझे समझ आया कि मेरे बच्चा कहना चाहता है कि अब आपका यह काम ख़त्म हो गया, मैं समझ गया हूं कि मुझे क्या-क्या करना है. और मैं कर लूंगा. यह बदलाव ऐसे नहीं आएगा कि आज आपको महसूस हुआ कि आप बच्चे की ज़रूरत से ज़्यादा देखभाल कर रहे हैं और कल आप बदल गए. ये एक प्रॉसेस है और इसमें समय लगना सामान्य है. यह प्रॉब्ल्म एकल परिवार और अकेले बच्चों वाले परिवार में सबसे ज़्यादा होती है. जॉइंट फ़ैमिली हो तो पैरेंट्स घर के कामों में ही व्यस्त रहते हैं और घर के दूसरे सदस्य बच्चों को कब चीज़ें सिखा देते हैं पता ही नहीं चलता. लेकिन एकल परिवार में पैरेंट्स का पूरा ध्यान अपने बच्चे पर ही होता है. पैरेंट्स ख़ुद से पूछते रहते हैं- एम आई डूइंग इनफ़?

‘‘मैंने इसके बारे में बहुत पढ़ा यह जानने के लिए कि आख़िर बच्चों का ज़रूरत से ज़्यादा ख़्याल रखने वाला माता-पिता का व्यवहार इतना आम क्यों है? इसके कुछ ऐसे कारण हैं- पैरेंट्स को लगता है कि जो चीज़ें हमें नहीं मिलीं, वो हम बच्चों को दें. क्योंकि यह सच है कि हमारे माता-पिता हमें बड़ा करते समय ज़्यादा व्यस्त थे. उनके पास समय नहीं था, मिक्सी, वॉशिंग मशीन जैसे गैजेट्स नहीं थे, हाउस हेल्प का कॉन्सेप्ट भी नहीं था. तो आज के माता-पिता सोचते हैं कि जो चीज़ें हमें नहीं मिलीं, जैसे- माता-पिता का समय, प्यार, अटेंशन, थोड़ी पैम्परिंग, वो हम अपने बच्चों को दें. यदि पैरेंट्स वर्किंग हों तो उनके भीतर यह ग्लानि भी होती है कि हम अपने बच्चे को ज़्यादा समय नहीं दे पा रहे हैं, जिसकी पूर्ति वो उन्हें ज़्यादा लाड़ जता कर, उनका ख़्याल रख कर करना चाहते हैं.

‘‘पर सच्चाई ये है कि आप अपने बच्चे के व्यक्तित्व का सही विकास तभी कर सकते हैं, जब उसे उसकी उम्र के मुताबिक़ ज़िम्मेदारियां दें, लाइफ़ स्किल्स सिखाएं. यदि आप बच्चे का संपूर्ण विकास चाहते हैं तो धीरे-धीरे ही सही आपको बच्चे को ज़िम्मेदारियां देना शुरू करना होगा.’’

फ़ोटो: फ्रीपिक

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Tags: Parentingpersonality developmentresponsible childrenupbringingज़िम्मेदार बच्चेपरवरिशव्यक्तित्व का विकास
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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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