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आख़िर पुरुषों में सेक्शुअल विविधता की गहरी चाहत क्यों होती है?

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
July 9, 2021
in प्यार-परिवार, रिलेशनशिप
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आख़िर पुरुषों में सेक्शुअल विविधता की गहरी चाहत क्यों होती है?
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क्या आपके भीतर भी कभी इस बात को गहराई से जानने की इच्छा हुई है कि आख़िर पुरुषों में सेक्शुअल विविधता यानी अलग-अलग सेक्स पार्टनर बनाने की चाहत क्यों होती है? हमें पता है यदि ऐसी इच्छा हुई भी होगी तो आपने इसे दबा लिया होगा, क्योंकि हमारे यहां आज भी सेक्स पर बात करना वर्जित माना जाता है. पर यह तो सोचिए कि यदि हम इस पर बात ही नहीं करेंगे तो इसके बारे में सही जानकारी कैसे जुटाएंगे? ख़ैर, हम मुद्दे पर आते हैं और आपकी इस जिज्ञासा को शांत करते हैं कि आख़िर पुरुषों के भीतर ज़्यादा पार्टनर बनाने की लालसा क्यों होती है…

अमेरिकी राष्ट्रपति कैल्विन कूलिज के बारे में एक क़िस्सा सुनाया जाता है, जो पुरुषों के वासनायुक्त होने को अच्छी तरह बयान करता है.
वर्ष 1920 में कूलिज और उनकी पत्नी मुर्गियों के एक फ़ार्म हाउस के दौरे पर गए. देश की प्रथम महिला ने फ़ार्म हाउस के मालिक से पूछा कि आप केवल कुछ ही मुर्गों की सहायता से इतने सारे अंडे कैसे पैदा कर लेते हैं. इस पर फ़ार्म मालिक ने बताया कि ये मुर्गे दिन में कई बार ख़ुशी-ख़ुशी अपना पति-धर्म निभाते हैं.
‘‘तब तो आपको यह बात मेरे राष्ट्रपति पति को ज़रूर बतानी चाहिए,’’ प्रथम महिला ने कहा.
कूलिज ने अपनी पत्नी का जवाब सुन लिया था और उन्होंने तुरंत उस मालिक से पूछा,‘‘क्या हर मुर्गा, हर बार एक ही मुर्गी को पति होने की सेवा देता है?’’
‘‘नहीं, बिल्कुल नहीं,’’ मालिक ने बताया,‘‘वे मुर्गियां बदलते रहते हैं.’’
‘‘तो मुझे लगता है कि आपको यह बात भी मिसेज़ कूलिज को बतानी चाहिए,’’ राष्ट्रपति ने मुस्कुराते हुए कहा.
अब यह क़िस्सा कितना सही है यह तो नहीं पता, लेकिन तब से पुरुषों की वासनामय सेक्शुअल विविधता की चाहत को आनेवाले समय के साइकोलॉजिस्ट्स ने ‘कूलिज इफ़ेक्ट’ का नाम दे दिया.
लेकिन आपको बता दें कि ‘कूलिज इफ़ेक्ट’ केवल पुरुषों में ही पाई जानेवाली प्रवृत्ति नहीं है. शोधकर्ताओं ने पाया है कि नएपन की चाहत का यह व्यवहार स्त्री प्रजाति (फ़ीमेल स्पिशीज़) में भी पाया जाता है.
इस विविधता की चाहत के उठने के पीछे जो कारण सामने आए हैं, वो हमारे क्रमिक विकास से यानी एवॉलूशन से संबंधित हैं. इसकी वजह है प्रजनन में सफलता की संभावना को बढ़ाना.

क्या कहते हैं शोध?
शोधकर्ताओं ने पाया कि लाखों साल पहले, पूरी दुनिया में फैलने से पहले, हमारे पूर्व-ऐतिहासिक पूर्वजों का विकास इसी तरह हुआ था. ये तब की बात है जब हमारे पूर्वज अफ्रीका के सवाना जंगलों में, जो हमारा पहला घर कहा जाता है, वहां खाने की खोज में शिकारियों की तरह भटका करते थे.
पूर्व ऐतिहासिक काल में मानव स्तनधारी फिर चाहे वो महिलाएं हों या पुरुष दोनों इसी तरह ‘कूलिज इफ़ेक्ट’ को जीवन की वास्तविकता मानते हुए रहा करते थे. फिर लगभग 10,000 साल पहले जैसे ही खेती की शुरुआत और धर्म का आगमन हुआ तो चीज़ें अचानक ही बदल गईं.
इस बदलाव का सबसे पहला कहर महिलाओं पर टूटा. उनका स्थान बराबरी के साझेदार से परे लेन-देन की वस्तु में तब्दील हो गया. इस नई व्यस्था को संगठित धर्म ने वैध बना दिया, जिसने एक ही पत्नी या एक ही विवाह यानी मोनोगैमी को ‘आदर्श’ बना दिया, क्योंकि संपत्ति के अधिकार पर पितृसत्तात्मकता एक बड़ी भूमिका निभा रही थी.
थोड़े में कहा जाए तो लाखों वर्षों के विकासक्रम के आवेग के चलते हमारे भीतर सेक्शुअल नयापन ढूंढ़ने की चाहत हमेशा से ही मौजूद है, लेकिन अब हम रहने की नई व्यवस्था में बंधे हुए हैं, जिसकी खोज हमने ही कुछ हज़ार वर्षों पहले की है.

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क्या कहते हैं एक्स्पर्ट?
ज़्यादातर समय आधुनिक सेक्शुअल हेल्थ एक्स्पर्ट्स उन कपल्स को इस जैविक इच्छा का कारण बताते रहते हैं, जो उनके पास मदद मांगने के लिए आते हैं, ताकि वे इस बात को अच्छी तरह समझ सकें. ऐसे में यदि आप भी पुरुषों में सेक्शुअल विविधता की चाहत के सवाल का वैज्ञानिक जवाब पाना चाहते हैं तो अपोलो हॉस्पिटल, नई दिल्ली के जानेमाने यूरो-ऐन्ड्रोलॉजिस्ट और वीवॉक्स क्लीनिक के सह संस्थापक डॉ अजीत सक्सेना से बेहतर जवाब कौन दे सकता है?
डॉ सक्सेना समझाते हैं,‘‘होमो सेपियन्स हमेशा से ही आनंद चाहने वाले और भोगी रहे हैं. लेकिन अब हमें एक विवाह या एक साथी के साथ रहने का प्रशिक्षण दिया गया है. यदि हम हमारे क्रमिक विकास के नज़रिए से देखें तो हम जिस तरह आज रह रहे हैं, जोड़े यानी कपल के रूप में, वो स्वाभाविक नहीं है.’’
वे आगे बताते हैं,‘‘जो चीज़ें स्वाभाविक होती हैं, उन्हें वैसा बनाए रखने के लिए किसी तरह के नियमों की ज़रूरत नहीं पड़ती. अब चूंकि एक साथी के साथ रहना या मोनोगैमी प्राकृतिक नहीं है अत: समाज ने इसके लिए कड़े नियम बना लिए हैं. ये नियम हमारी स्वाभाविक इच्छाओं को नियंत्रित करने के लिए हैं. और जब हम अपनी इच्छाएं नियंत्रित करते हैं तो हम लाखों साल से चले आ रहे विकास क्रम में मौजूद उस आवेग और हमारी इच्छाओं के मनोविज्ञान के ख़िलाफ़ भी लड़ाई कर रहे हैं, जो हममें से हर एक के भीतर मौजूद है.’’

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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