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ओए अफ़लातून
Home ओए हीरो

‘‘मांओं को अब बच्चों की परवरिश यूं करनी होगी कि कोई उन्हें भटका न सके.‘‘

शिल्पा शर्मा by शिल्पा शर्मा
May 2, 2022
in ओए हीरो, मुलाक़ात
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मदर्स डे! हालांकि कुछ लोग अब भी यह कहते मिल जाते हैं कि मदर्स डे मनाना हमारी संस्कृति नहीं, पर वे भी इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि हमारे देश में भी इसे मनाने का चलन पिछले कुछ सालों में बढ़ा ही है. इस दिन हमारे देश में हर धर्म और मज़हब के लोग बाज़ार के दबाव में ही सही अपनी मां को याद कर लेते हैं, उनसे फ़ोन पर बात कर लेते हैं और कुछ तो उन्हें हैप्पी मदर्स डे कह कर विश भी कर देते हैं. लेकिन जिस तरह हमारे देश के सामाजिक तानेबाने में पिछले कुछ सालों में बदलाव आया है, जिस तरह अल्पसंख्यकों, बहुसंख्यकों के मुद्दे उठाए जा रहे हैं और जिस तरह की हिंसा देखने में आई है, आख़िर यह भी तो जाना जाना चाहिए कि आख़िर एक मां ऐसे में कैसा महसूस करती है? आज से आठ मई तक हम रोज़ाना इस मामले में एक मां से बात कर के जानेंगे उनके दिल की बात. जानेंगे कि आज के परिवेश में वो अपने बच्चों को बड़ा करते हुए कैसा महसूस करती हैं? आज इस क्रम में हमने बात की मुंबई की ज़ाहबिया तस्नीम सुहैल उस्मानी से.

ज़ाहबिया, इस सीरीज़ में मैं सभी मांओं से दो ही सवाल करने जा रही हूं. मेरा पहला सवाल ये है कि आज के समय में जब देश का सामाजिक तानाबाना थोड़ा बिगड़ा हुआ नज़र आता है तो बतौर एक मां आप अपने बच्चों की परवरिश को लेकर कैसा महसूस करती हैं?
मेरी दो बेटियां है. और आजकल देश में जो माहौल चल रहा है, वो बतौर एक मां मुझे कई बार डराता है, लेकिन डरने की बजाय मैं इस बात के लिए मॉटिवेट होती हूं कि मैं अपने बच्चों को बहुत मज़बूत बनाऊं. क्योंकि मैं हमेशा उनके साथ नहीं रह सकती. कोई भी पैरेंट हमेशा अपने बच्चों के साथ नहीं रह सकता. तो हर कोई चाहता है कि उनका बच्चा ज़िंदगी की किसी भी सिचुएशन में विक्टोरियस निकले. फ़िलहाल जो माहौल अभी चल रहा है, जो घृणा फैलाई जा रही है, वो थोड़े समय के लिए है. पॉलिटिकल लोग अपनी रोटियां सेंकने के लिए कुछ लोगों को टार्गेट करते हैं, ताकि पोलराइज़ेशन हो जाए.
लेकिन जो आम इन्सान है, जो भारत का नागरिक है, जो रोज़मर्रा काम कर रहा है, जी रहा है, वो हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और भी कई धर्म के लोगों से मिलकर बना है. हम एक साथ रहते हैं इस देश में और हमेशा रहेंगे. पहले भी रहते थे, आज भी रहते हैं और आगे भी रहेंगे. हम लोग एक-दूसरे के बिना भी नहीं रह सकते. हम सभी को एक-दूसरे की ज़रूरत है, ताकि हम साथ-साथ सर्वाइव कर सकें. मैं अपने बच्चों को फ़िज़िकली और मेंटली इतना स्ट्रॉन्ग बनाना चाहती हूं, बना भी रही हूं, ताकि कल को हम मौजूद हों या नहीं हों, अगर कोई ऐसी सिचुएशन आ गई, जहां वे फंस गए हों और उन पर अटैक हो रहा हो तो वो अपने सर्वाइवल के लिए लड़ें.

मैं तो दूसरे पैरेंट्स को भी यह कहूंगी कि जो लोग हेट फैला रहे हैं, उनके बहकावे में न आएं. आप अपने बच्चों को रीज़निंग पावर दें, ताकि वे सही और ग़लत को समझ सकें. और वे हमेशा एक अच्छे भविष्य के लिए संघर्ष करें. ऐसा भविष्य नहीं, जहां बच्चे बाहर खेलने जाने से डरें, वे दूसरे धर्मों के बच्चों के साथ खेलना न चाहें. ऐसा नहीं होना चाहिए. सोसाइटी होती है तो उसमें सब तरह के लोग होते हैं. ऐंटी सोशल एलिमेंट्स को तो सोसाइटी से बाहर निकाल देना चाहिए. पर अन्फ़ॉर्चुनेटली हमारे देश में इसी तरह के कुछ लोग सत्ता में जा कर बैठ गए हैं. अब वो जो अच्छे लोग हैं, उनको जीने नहीं दे रहे हैं. हमारे बच्चों के लिए अच्छा एजुकेशन सिस्टम नहीं दे रहे हैं. हमें अपने बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा चाहिए, अच्छी गतिविधियां, अच्छे खेल के मैदान वगैरह, जो कि अब भी कई जगहों पर नहीं हैं. फिर चाहे वो हिंदू बच्चा हो, मुसलमान बच्चा हो या फिर किसी और धर्म का… बच्चा तो बच्चा है. हर बच्चे की एक क्षमता है, हर इंसान की एक क्षमता है. हम सब को एक-दूसरे को साथ लेकर चलना है.

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हम सभी अपने समाज के स्तंभ हैं. यदि हमारी सोसाइटी में 10 घर हिंदुओं के हैं, 10 घर मुस्लिमों के, 10 सिखों के या क्रिश्चन के हैं तो हम एक-दूसरे का परिवार हैं, लेकिन कोई बाहर वाला आ कर हमें ये बोलेगा कि ये हिंदू है, ये मुसलमान है या फिर ये किसी और धर्म का है तो हमें उनको भगा देना चाहिए. हमें उन्हें कहना चाहिए-गेट आउट.

इस माहौल के बारे में आप अपने बच्चे से, सरकार से और आम लोगों से क्या कहना चाहेंगी?
बतौर मां मैं शुरू में बहुत डरती थी, लेकिन अब मैं नहीं डरती. अब मैं ख़ुद अपने बच्चों को सर्वाइवल स्किल्स देना चाहती हूं. उन्हें कहना चाहती हूं कि यू हैव टू सर्वाइव, इन वॉटएवर सिचुएशन यू आर. चाहे आप इस देश में हों या दूसरे देश में. दूसरे देशों में युद्ध हो जाता है और हमारे बच्चे फंसे रह जाते हैं. तो उन्हें सर्वाइव करना सीखना होगा. दरअसल हमें अपने बच्चों को यह स्किल अभी सिखानी होगी.

अब सरकार से मैं क्या कहूं? हमारी सरकार में, सत्ता में सभी लोग ख़राब हैं ऐसा नहीं है. कुछ लोग ऐसे हैं जो ख़ुद सत्ता में बने रहने के लिए लोगों को लड़ाते रहते हैं. ये आज से नहीं है, हमेशा से ऐसा ही होता आया है. राजा-महाराजाओं के ज़माने से भी ऐसा ही होता आया है. लेकिन जब हम यानी इस देश का हर व्यक्ति अपने बच्चों को अच्छे तौर-तरीक़े सिखाए, अच्छी नैतिक शिक्षा दे, अच्छी फ़ैमिली वैल्यूज़ दे तो मुझे नहीं लगता कि सत्ता का कोई भी ग़लत व्यक्ति या घृणा फैलाने वाले लोग उन बच्चों के दिलो-दिमाग़ में नफ़रत भर सकेंगे. यहां पे अब हर घर के लोगों को, हर एक मां को खड़े होना पड़ेगा, चाहे वो मां हिंदू, मुस्लिम या किसी भी धर्म को मानने वाली क्यों हो, उसे अपने बच्चों को सिखाना होगा कि देखो बेटा हमको सबके साथ मिल कर रहना है. किसी का कुछ छीनना नहीं है. हर धर्म की अपनी वैल्यूज़ हैं, सिविलाइज़्ड सोसाइटी की अपनी वैल्यूज़ होती हैं और हमें हर धर्म की हर वैल्यू का आदर करना होगा. क्योंकि कोई धर्म किसी का छीनने, काटने या मारने की इजाज़त नहीं देता है.

हमारी सोसाइटी में धर्म मानने वाले लोग भी हैं और नास्तिक लोग भी हैं. वे भी हमारे परिवार का हिस्सा हैं. हमें उनको भी साथ लेकर चलना है. ज़िंदगी केवल धर्म ही नहीं है, यह तो मिलजुल कर साथ रहने, साथ सर्वाइव करने के लिए है, ताकि हम चिंतामुक्त हो कर रहें. यह डर न हो कि कल कोई आकर हमारे घरों को आग लगा देगा या कोई हमारी बेटी के साथ छेड़खानी न कर जाएगा. हम मांओं को अब अपने बच्चों की परवरिश इस तरह करनी होगी, ताकि जब कल वो बड़े हों तो उन्हें कोई भटका न सके. जैसे आज के बच्चे, जो भटक गए हैं वो दंगे कर रहे हैं. चंद पैसों के लिए वो दूसरों के घरों में आग लगा रहे हैं, लेकिन वो ये भूल जाते हैं कि कल को उनका भी घर इस आग की चपेट में आ सकता है. इससे अच्छा है कि हम ऐसी आग लगाएं ही नहीं. कोई बुरा काम दूसरों के साथ न करें, क्योंकि फिर अगला नंबर आपका भी हो सकता है, क्योंकि आपको भी तो इसी समाज में रहना है.

फ़ोटो: गूगल

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शिल्पा शर्मा

शिल्पा शर्मा

पत्रकारिता का लंबा, सघन अनुभव, जिसमें से अधिकांशत: महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर कामकाज. उनके खाते में कविताओं से जुड़े पुरस्कार और कहानियों से जुड़ी पहचान भी शामिल है. ओए अफ़लातून की नींव का रखा जाना उनके विज्ञान में पोस्ट ग्रैजुएशन, पत्रकारिता के अनुभव, दोस्तों के साथ और संवेदनशील मन का अमैल्गमेशन है.

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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