सुधा कंठा कहे जाने वाले भूपेन हजारिका की समाधि पर सिर झुकाते हुए अमरेंद्र किशोर ने उनकी और कल्पना लाजमी की मोहब्बत को याद करते हुए महसूस किया कि जब रूह, रूह को छू ले—तो इश्क़ फ़ना नहीं होता, वह अमर हो जाता है. यहां पेश है उस अमर मोहब्बत की दिल को छूने वाली दास्तां
रूह की हमनवाज़ी, रूहानी रवायत का इश्क़ और तारों की बस्ती में लिखा एक अमर अफ़साना—यह दास्तान उसी मोहब्बत की है जहां इश्क़ ने आज़ादी का दामन थामा और दो रूहों ने हमसफ़र होने को रस्मों से ऊपर रखकर जिया. यह कहानी सुरों की भी है और सुकूत की भी; यह तख़्लीक़ की भी है और तड़प की भी. यहां मोहब्बत इल्ज़ाम नहीं, इबादत है; और स्त्री की आज़ादी बग़ावत नहीं, उसकी शख़्सियत का ऐलान है. तारों की बस्ती में दर्ज यह हमनवाज़ी हमें याद दिलाती है कि जब रूह, रूह को छू ले—तो इश्क़ फ़ना नहीं होता, वह अमर हो जाता है.
कहते हैं, जब इंसान सच्ची मोहब्बत और गहरे पश्चाताप के बीच खड़ा होता है तो उसे किसी दरगाह, किसी समाधि, किसी ख़ामोश रूह की पनाह चाहिए होती है. भूपेन हजारिका की समाधि पर सिर झुकाना ऐसा ही एक रूहानी लम्हा है—जहां रिश्तों की थकान धुल जाती है, जज़्बात की गर्द बैठ जाती है और दिल पर लगे इल्ज़ाम फीके पड़ जाते हैं. वहां खड़े होकर लगता है कि इश्क़ गुनाह नहीं, एक मुक़द्दस अमानत है; और आज़ादी कोई बग़ावत नहीं, बल्कि रूह की ज़रूरत है.
दो बरस पहले जब उस पावन स्मृति-स्थल तक पहुंचने का मौक़ा मिला, तो हवा में एक अजीब-सी तासीर थी. जैसे हर झोंका उनके नग़्मों का पैग़ाम लेकर आता हो. “दिल हूम हूम करे” की वह कंपकंपाती सदा—जो सीने में उतरकर धड़कनों को रेशमी बना देती है—आज भी कानों में गूंजती है. और “ओ गंगा तू बहती है क्यों” सुनते ही ज़िंदगी किसी दरिया की मानिंद बहने लगती है—रुक-रुककर, मचल-मचलकर, मगर अपने मुक़ाम की तरफ़ रवां. उनके सुरों में सिर्फ़ संगीत नहीं था; वह इश्क़ का इक़रार था, इंसानियत का ऐलान था और रूह की सदाओं का बयान था.
उनकी ज़िंदगी रंगों, रागों, रंजिशों और रहमतों का अजीब संगम थी. उसी संगम में दाख़िल हुईं कल्पना लाजमी—ललिता लाजमी की बेटी, गुरुदत्त की भांजी, और अपने फ़ैसलों की मालिक एक बेबाक फ़नकारा. सत्रह बरस की उम्र, सेंट जेवियर्स का अहाता और सामने एक ऐसी आवाज़ जो सीधे दिल के आलिंद में उतर जाए—यह मुलाक़ात किसी साधारण आकर्षण की कहानी नहीं थी; यह तक़दीर का लिखा हुआ एक सफ़्हा था.

उम्र का फ़ासला तीस बरस का था. समाज की नज़र में यह रिश्ता सवालों का पुलिंदा था. मगर इश्क़ की दुनिया में हिसाब-किताब नहीं चलता. वहां सिर्फ़ एहसास का सिक्का चलता है. कल्पना के लिए वह आवाज़ महज़ एक सुर नहीं थी; वह एक सरोकार था, एक खिंचाव था, एक ऐसी रूहानी पुकार थी जिसने उन्हें बाँध लिया. और भूपेन के लिए कल्पना सिर्फ़ एक नौजवान प्रशंसक नहीं थीं; वह उनके बिखरे हुए जीवन में एक तरतीब, एक ठहराव, एक तामीर की शुरुआत थीं.
उनकी सहजीवी ज़िंदगी किसी दस्तावेज़ की मोहताज नहीं थी. न निकाह, न फेरे, न कोई सामाजिक ऐलान—फिर भी तीन दशकों की हमनवाज़ी. यह रिश्ता तकरार से गुज़रा, तन्हाई से गुज़रा, शराब और शोहरत की धुंध से गुज़रा, मगर टूटा नहीं. भूपेन की दुनिया में सुर थे, सियासत थी, शराब थी, और एक अजीब-सा बिखराव था. कल्पना ने उस बिखराव को अपने सब्र से, अपने जज़्बे से, अपने स्त्री-संकल्प से संभाला. उन्होंने उन्हें व्यवस्थित किया, उनकी रचनात्मकता को दिशा दी, और उनकी गिरती हुई सेहत के बीच भी एक सहारा बनकर रहीं.
यहां स्त्री की आज़ादी का असली मफ़हूम सामने आता है. आज़ादी का अर्थ सिर्फ़ बग़ावत नहीं; आज़ादी का मतलब है—अपना फ़ैसला ख़ुद लेना, अपने इश्क़ को ख़ुद चुनना और उसके अंजाम की ज़िम्मेदारी भी ख़ुद उठाना. कल्पना ने यह रास्ता चुना. उन्होंने यह जानते हुए चुना कि यह रिश्ता सामाजिक स्वीकृति से परे रहेगा. उन्होंने यह समझते हुए चुना कि भूपेन एक मुकम्मल शौहर नहीं बन पाएंगे. मगर उन्होंने यह भी जाना कि मोहब्बत मुकम्मल होने के लिए क़ानूनी मुहर की मोहताज नहीं होती.
भूपेन पहले ही अपनी पत्नी प्रियम्वदा पटेल से अलग हो चुके थे. उनके अतीत में कड़वाहटें थीं, वसीयतों के विवाद थे और एक गहरी थकान थी. शायद शादी जैसी संस्था से उनका मोहभंग हो चुका था. मगर कल्पना के साथ उन्होंने एक ऐसी हमसफ़री जी, जिसमें रूहानी नाता ज़्यादा अहम था. उन्होंने पहले उन्हें अपना मैनेजर बताया, फिर पार्टनर. शब्द बदलते रहे, मगर रिश्ता अपनी ख़ामोश गहराई में कायम रहा.

समय बीतता गया. जवानी की कुलांचें धीरे-धीरे परिपक्वता में बदलती गईं. लिव-इन की यह ज़िंदगी आसान नहीं थी. समाज की फुसफुसाहटें थीं, आलोचनाओं की साज़िशें थीं, मगर उनके बीच एक अडिग विश्वास भी था. भूपेन की सेहत गिरने लगी. दोनों गुर्दों ने जवाब दे दिया. मौत की परछाईं करीब आने लगी. ऐसे में उन्होंने कल्पना से शादी कर लेने की सलाह दी—शायद यह उनकी आख़िरी फ़िक्र थी, आख़िरी मोहब्बत. मगर कल्पना ने साथ छोड़ने का ख़याल तक न आने दिया. यह इश्क़ का वह मरहला था, जहां जिस्म पीछे छूट जाता है और रूह आगे बढ़ जाती है.
अंतिम विदाई का दृश्य किसी अनहद पीड़ा से कम न था. आग की लपटों में एक फ़नकार जा रहा था, और हवा में सिर्फ़ धुआं नहीं था—वह अधूरी रुबाइयों का धुआं था, अधूरे अल्फ़ाज़ का, मगर मुकम्मल इश्क़ का. कल्पना की आंखों में जो अश्क थे, वह सिर्फ़ शोक के नहीं थे; वह एक लंबी दास्तान का समापन था.
आज न भूपेन हैं, न कल्पना. मगर उनकी कहानी एक पैग़ाम है—कि मोहब्बत अगर सच्ची हो तो वह समाज की वर्जनाओं से बड़ी हो जाती है. लिव-इन अगर सिर्फ़ देह-राग रह जाए तो वह विनाश है, मगर अगर वह सृजन बन जाए, तख़लीक़ बन जाए तो वह इंसानियत के लिए मिसाल है. बिखरे मर्द को संभालने वाली कोई कल्पना हो और अपनी कमज़ोरियों को स्वीकार करने वाला कोई भूपेन—तब इश्क़ फ़ना नहीं होता, फ़लसफ़ा बनता है.
ब्रह्मपुत्र के किनारे पला वह लोकगायक जब गंगा की स्तुति में अपना कंठ खोलता है तो वह सिर्फ़ नदी की नहीं, भारत की रूह की वंदना करता है. उनकी आवाज़ आज भी नार्थ ईस्ट से लेकर पूरे मुल्क तक गूंजती है—एक ऐसे इश्क़ की गूंज, जो बंधन से परे है, मगर ज़िम्मेदारी से भरा है.
और आख़िर में दिल यही कहता है—मोहब्बत लाज़िमी है, मगर उससे भी ज़्यादा लाज़िमी है स्त्री की आज़ादी. क्योंकि जब औरत अपने इश्क़ का फ़ैसला ख़ुद करती है, तब वह किसी की परछाई नहीं रहती; वह अपनी दास्तान की ख़ुद तख़्लीक़-कार बन जाती है.
यही कल्पना की विरासत है. यही भूपेन का नग़्मा है. और यही अमर प्रेम का अस्ल मानी है—जहां हर शब्द एक संवाद है, हर आह एक शेर और हर ख़ामोशी एक मुकम्मल इक़रार.








