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एक ज़ब्तशुदा किताब: दास्तां, एक शादीशुदा आदमी की प्रेमिका की (लेखिका: अमृता प्रीतम)

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
December 29, 2022
in क्लासिक कहानियां, ज़रूर पढ़ें, बुक क्लब
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Amrita-Preetam_Kahani
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पति की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी और प्रेमिका के बीच हुई दिलचस्प मुलाक़ात, ज़िंदगी की कई सच्चाईयों पर से पर्दा हटाती है. कई बंधी हुई गांठों को धीरे-धीरे खोलती है.

वे दोनों एक-दूसरे को आमने-सामने देखकर नीचे धरती की ओर देखने लग पड़ीं.
नीचे कुछ भी नहीं था, पर दोनों को पता था कि दोनों के बीच एक लाश है…
‘सब लोग चले गए?’
‘सब लोग जा सकते थे इसलिए चले गए. मां दूसरे बेटे के पास रहने के लिए, दोनों बच्चे होस्टल में. अब सिर्फ़ मैं हूं, अकेली….’
‘बच्चे छुट्टियों में आएंगे, कभी-कभी मां भी आएगी.’
‘हां, कभी-कभी.’
‘पर मेरे पास कभी कोई नहीं आएगा.’
‘आज तू ज़िंदगी में पहली बार घर के अगले दरवाज़े से आई है.’
‘यह दरवाज़ा तो तेरा था, कभी भी मेरा नहीं था इसलिए.’
‘पर जब तू पिछले दरवाज़े से आती थी, मुझे पता चल जाता था. उस दिन एक मर्द अपने घर में ही चोर होता था.’
‘घर में नहीं, सिर्फ़ बागीचे वाली अपनी लायब्रेरी में… वहां मैं उसकी एक किताब की तरह हुआ करती थी.’
‘पर औरत एक किताब नहीं होती.’
‘होती है, पर ज़ब्तशुदा….’
‘क्या मतलब?’
‘यही कि तू शादीशुदा थी, मैं नहीं.’
एक औरत ज़ोर से हंस पड़ी. शायद उसका सारा रुदन हंसी की योनि में पड़ गया. वह उस दूसरी औरत को कहने लगी,‘इसलिए आज मैं विधवा हूं, तू नहीं….’
‘मेरा हक़ न पहले लफ्ज़ पर था, न दूजे पर.’
‘तूने मुझसे बस ये दो लफ्ज़ नहीं छीने, बाकी सब कुछ छीन लिया.’
‘एक और भी है तीसरा लफ्ज़ जो सिर्फ़ तेरे पास है, मेरे पास नहीं.’
‘कौन सा ?’
‘उसके बच्चे की मां होने का.’
‘तीन लफ्ज़, सिर्फ़ तीन लफ्ज़… पर वह ख़ुद इन तीन लफ्ज़ों से बाहर था.’
‘इसीलिए ख़ाली हाथ था.’
‘पर इन लफ्ज़ों के सिवा उसके पास मुहब्बत के सारे लफ्ज़ थे.’
‘हां, पर जब ये तीन लफ्ज़ ज़ोर से हंसते थे, ज़िन्दगी के बाकी लफ्ज़ रो पड़ते थे.’
‘तूने ये भी उससे मांगे थे?’
‘नहीं, क्योंकि मांगने पर मिल नहीं सकते थे.’
‘अगर मिल जाते, तू आज मेरी तरह विधवा होती…’
‘अब भी हूं.’
‘पर सबकी नज़र में कुंआरी.’
‘छाती में पड़ी हुई लाश किसी को नज़र नहीं आती.’
‘पर मेरी छाती में उस वक़्त भी उसकी लाश थी, जब वह जीवित था.’
‘हां, समझती हूं.’
‘मैं तब भी एक क़ब्र की तरह ख़ामोश थी.’
‘शायद, हम तीनों ही क़ब्रों के समान थे. एक दूसरे की लाश को अपनी-अपनी मिट्टी में संभाल कर बैठी हुई क़ब्रें….’
‘शायद. पर अगर तू उसकी ज़िन्दगी में न आती…’
‘कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.’
‘कैसे?’
‘फिर वह ख़ाली क़ब्र की तरह जीता.’
‘शायद, शायद नहीं.’
‘उसने अन्तिम समय कुछ कहा था?’
‘कुछ नहीं, सिर्फ़….’
‘अब जो कुछ तुझसे गुम हुआ है, वह मुझसे भी गुम हो चुका है. इसलिए जो कुछ उसने कहा था, मुझे बता दे.’
‘कुछ नहीं कहा था. बस, जब कोई कमरे में आता था, वह आंखें खोल कर एक बार ज़रूर उसकी ओर देखता था, फिर चुपचाप आंखें मूंद लेता था.’
‘शायद, वह मेरी प्रतीक्षा कर रहा था.’
‘शायद….’
‘तूने मुझे बुलाया क्यों नहीं था?’
‘घर में उसकी मां थी, उसका छोटा भाई था, बच्चे भी… मैं सबकी नज़र में उसको बचाना चाहती थी.’
‘क्या खोया, क्या बचाया, इसका हिसाब लग सकेगा?’
‘मैंने जो खोना था, खो चुकी थी. मुझे अपना ख्याल नहीं था.’
‘तूने ठीक कहा था, अगर मैं उसकी ज़िन्दगी में न आती….’
‘मैं नफ़रत के दुख से बच जाती… और शायद दूसरे दुख से नहीं बच सकती थी.’
‘दूसरा दुख?’
‘ख़ालीपन का… शुरू से ही जानती थी, पाकर भी कुछ नहीं पाया. वह मेरे बिस्तर में भी मेरा नहीं होता था. ख़ाली-ख़ाली आंखों से शून्य में देखता रहता था.’
‘फिर तो तुझे तसल्ली होती होगी, अगर वह अन्तिम समय में भी सिर्फ़ शून्य में देखता?’
‘शायद होती… यह तसल्ली ज़रूर होती कि उसकी लाश पर सिर्फ़ मेरा हक है… पर अब…’
‘अब?’
‘लगता है, तूने उसकी लाश भी मुझसे छीन ली है.’
‘सिर्फ़ लाश…’
‘नहीं, उसे भी छीना था, जब वह ज़िन्दा था.’
‘वह अकेला कभी नहीं था. उसके अन्दर तू भी शामिल थी, बच्चे भी… मैंने जब भी उसे पाया, तेरे और तेरे बच्चों समेत पाया.’
‘पर जब तू उसके क़रीब होती होगी, उस वक़्त उसके ज़ेहन में न मैं होती होऊंगी, न बच्चे…’
‘कुछ चीज़ों को याद नहीं करना होता, वे होती हैं, चाहे दीवार से परे हों, पर इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता.’
‘उसने तुझे यह बताया था?’
‘यह कहने वाली या पूछने वाली बात नहीं थी. जब वह कभी अकेला होता तो शायद पूछ लेती.’
‘पर वहां लायब्रेरी में वह सदैव तेरे पास अकेला होता था.’
‘वहां उसकी बीवी एक खुली किताब-सी होती थी और बच्चे भी, किताब की तस्वीरों की तरह…’
‘और तू?’
‘मैं एक ख़ाली किताब थी जिस पर उसने जो इबारत लिखनी चाही, कुछ लिख ली…’
‘तन की इबारत भी?’
‘हां, तन की इबारत भी… पर वह बहुत देर बाद की बात है.’
‘बहुत देर बाद की? किससे बहुत देर बाद की?’
‘मन की इबारत लिखने से बहुत देर बाद की.’
‘क्या उस वक़्त भी मैं एक खुली किताब की तरह उसके सामने होती थी?’
‘हां, होती थी… इसलिए वह हमेशा एक कांपती हुई कलम की तरह होता था.’
‘वह बच्चों को बहुत प्यार करता था.’
‘हां, इसलिए उसने अपना दूसरा बच्चा दुनिया से लौटा दिया था.’
‘दूसरा बच्चा ?’
‘वह मेरी खाली किताब में एक फटी हुई तस्वीर जैसी बात है.’
दोनों गहरी चुप्पी में खो गईं. पहली खुली हुई किताब की भांति और दूसरी ख़ाली किताब की तरह… फिर पहली ने एक ठंडी सांस भरते हुए कहा, ‘पर आज तू मेरे पास क्यों आई है?’
‘क्यों? पता नहीं…’
‘मैं ही तो तेरे रास्ते की दीवार थी.’
वह दूसरी, पहली के कंधे पर सिर रख कर रो पड़ी, कहने लगी,‘शायद इसलिए कि जब कोई बहुत अकेला होता है, उसे किसी दीवार से सिर लगाकर रोने की ज़रूरत होती है.’

Illustration: Pinterest

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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