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Home ज़रूर पढ़ें

हसरतें: डॉ संगीता झा की कहानी

डॉ संगीता झा by डॉ संगीता झा
April 14, 2023
in ज़रूर पढ़ें, नई कहानियां, बुक क्लब
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Dr-Sangeeta-Jha_Kahani
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वो प्यार ही क्या जिसमें दर्द ना हो? वो हसरतें ही क्या, जो आसानी से पूरी हो जाएं? वह जीवन ही क्या, जिसकी कहानी सीधी रेखा में चले? डॉ संगीता झा की नई कहानी हसरतें, इन्हीं विसंगतियों को समेटती है.

मैं रोज़ दोपहर के साढ़े तीन बजे तक घर के सारे कामों से फ़ारिग हो छत पर पहुंच जाती थी.
घर के ठीक सामने मस्जिद थी जहां वो असर की नमाज़ पढ़ने रोज़ आता था. शायद उसका ऑफ़िस वहीं था. मेरे लिए भी जब लोग आराम करते हैं उस समय सजना संवरना आसान नहीं था. पर इस दिल का क्या किया जाए ,दिल है कि मानता नहीं. वो समय भी ऐसा था कि घर पर सब सोए रहते थे कि कोई सोच भी नहीं सकता था कि इस वक़्त भी कोई प्यार की पतंग लड़ा सकता है. थी तो मैं इस घर की मुलाजिम पर मैं पैदाइश से ही इस घर में रह रही थी. मेरी अम्मा ने इसी घर में अपना दम तोड़ा था, तब से मालकिन साजिदा और मालिक परवेज़ क़ुरैशी साहेब ने मुझे अपनी बेटी की तरह पाला था. ख़ैर ये अलग बात है कि उनकी बेटी शहरीश कॉन्वेंट में पढ़ती थी और मैं पास के नगर निगम के स्कूल में. दूसरे मुलाजिमों से अलग मुझे एक स्पेशल कमरा, पढ़ने की मेज़ दी गई थी. शहरीश अपने कपड़े दो-तीन बार से ज़्यादा नहीं पहनती थी. इससे मेरे पास उतरन का अंबार था, लेकिन मैं इसे उतरन नहीं मानती थी. उन्हें ख़ूब अच्छी तरह साफ़ कर ख़ुशबू डाल लगभग नए की तरह कर लेती थी. इन सब कामों में मेरी मदद शन्नो खाला करती थी, जो मेरी अम्मा की तरह इस घर की मुलाजिमा थी. उन्होंने घर से बग़ावत कर अपने पसंद के लड़के को अपना शरीके हयात बनाया था, लेकिन उनके उसी आशिक़ ने बच्चे ना होने पर दूसरा निकाह कर लिया था. और उसके बच्चों की आया बनने के बदले वो घर छोड़ यहां आ गई और मेरी प्यारी खाला बन गई. कुल मिला कर मैं क़ुरैशी परिवार की बेटी ही लगती थी. मालिक और मालकिन को मैं अब्बू-अम्मी ही पुकारती थी. मेरा रंग रूप देख मालकिन ने मेरा नाम रखा था कहकशा जिसका मतलब था स्टार गैलेक्सी.
शहरीश के कपड़े पहन उसकी कहानियां सुन मेरी हसरतें भी ऊंची उड़ानें भरने लगी थीं.
शन्नो खाला मुझे सुबह दूध का गिलास हाथ में पकड़ाती और मेरी पढ़ाई पर बड़ी तव्वजू देती. अपनी कोई संतान ना होने से मैं उनकी लख्तेजिगर थी. रोज़ रात मुझे कहानियां सुनाती, वो सब जो उन्होंने अपने बड़ों या सहेलियों से सुनी थी. बाक़ी हसरतें शहरीश की सिंडरेला, थंबलीना और रफेंजेल वाली स्टोरीज़ सुन कर जगी थी. हर कहानी के अंत में एक शहज़ादा आता था और अपने प्यार को साथ ले जाता था. मेरे हर सपने अपनी ज़िंदगी को सुधारने से ज़्यादा उस राजकुमार के इंतज़ार में थे. सिवाय शहरीश की कॉन्वेंट की पढ़ाई और कान के हीरों के बुंदों के अलावा मुझमें और उसमें कोई फ़र्क़ ना था. उसकी कमी शन्नो खाला मुझे घर पर ही थोड़ी बहुत अंग्रेज़ी शहरीश और घर के ड्राइवर अब्दुल्ला से पढ़वा कर पूरी करती थीं. अब्दुल्ला दुबई में दस साल नौकरी कर के आया था, इससे टूटी-फूटी इंगलिश बोलता भी था और लिखना भी जानता था. जब भी कभी मैं अपनी हसरतों का ज़िक्र खाला से करती वो मेरे कान उमेंठती और कहती,“केहूं (मेरा निक नेम) उल्टी सीधी हसरतें ना पालो बेटा. जिन्हें हम राजकुमार समझते हैं, समय पाते ही हमारा दामन छोड़ हैवान बन जाते हैं. मैंने भी सबको छोड़ अपने शहजादे का हाथ थामा था. देखो क्या हाल हुआ है मेरा. काश… मैंने सपनों के बदले हक़ीक़त का हाथ थामा होता.’’
मैं चुप हो जाती कुछ ना कहती पर मन ही मन सोचती इतनी सारी कहानियां कोई झूठी थोड़ी ना हैं. मेरे सपनों का शहज़ादा एक दिन ज़रूर आएगा. इस शहज़ादे के चक्कर में मेरी तालीम पिछड़ती जा रही थी. इधर शहरीश इन परिकथाओं को काल्पनिक मान अपनी तालीम को तव्वजू दे रही थी. बारहवीं का इम्तिहान में जहां शहरीश ने डिस्टिंक्शन ले कर झंडे गाड़ दिए, वहीं मैं किसी तरह पास हुई. उसी दिन अब्बू साहेब ने फ़रमान सुनाया,“शहरीश कॉलेज साइंस की पढ़ाई करने जाएगी और केहूं घर पर शन्नो की मदद करेगी और प्राइवेट बीए काच इम्तिहान देगी.’’ उनका फ़रमान सुन मैं तो ख़ुश हो गई कि चलो रोज़-रोज़ की स्कूल और कॉलेज की चकल्लस से छुट्टी. पर क्या मालूम था कि जब स्कूल जाती थी तब घर के कामों से पूरी तरह छुट्टी थी और अब शन्नों खाला और घर की दूसरी मुलाजिमों के साथ घर के काम भी करने पड़ते थे. लेकिन अभी भी मैं घर पर सबकी चहेती थी. जल्दी-जल्दी घर के कामों से फ़ारिग हो छत पर जा पहुंचती, वहीं जुबेर की नज़रों से मुलाक़ात हुई. कपड़े शहरीश के थे और गोरा रंग ख़ुदा की देन था. किसी को भी धोखा हो सकता था कि मैं इस घर की बेटी ही हूं. रोज़ नज़रों की नज़रों से मुलाक़ात होती थी. तभी पता चला कि प्यार तो गूंगों को भी होता है और ये भाषा का मुहताज़ नहीं है. हमारी आंखों की मुलाक़ात मुश्किल से एक मिनिट की भी नहीं होती थी. कुछ दिनों बाद वो वहां कुछ देर और रुक अपनी मोटर साइकिल के कांच साफ़ करता कभी अपना गॉगल पोंछता. मेरी हसरतों में मैं उसकी बाइक के पीछे उसके कंधे पकड़ एक दूसरी दुनिया में घूम आती. बारिश, धूप और ठंड भी उसे नमाज़ पढ़ने से ना रोक पाई. मुझे लगता शायद उसकी इबादत में एक मांग थी ख़ुदा के सामने जो मुझे लेकर थी.

वो नमाज़ पढ़ने मस्जिद के अन्दर जाता और मैं छत पर जानमाज़ बिछा ख़ुद भी नमाज़ पढ़ती. प्यार भी तो भी ख़ुदा की ही दी हुई नेमत है सो वो भी मेरी दुआओं में रहता. घर वाले भी बड़े ख़ुश कि लड़की को इतनी अक्ल तो आई. शन्नो खाला को ज़रूर मेरे रंग-ठंग ठीक नहीं लगते थे. वो हर वक़्त मुझे समझाती कि हमारे सपने टूटने के लिए बने होते हैं सो हसरतें ना पालूं. काश… मैं समझ पाती. मैं अपने उस आशिक़ की तरक़्क़ी की भी दुआ करती. मेरी दुआ भी क़बूल हुई और मोटरसाइकिल कार में तब्दील हो गई. कार के पीछे बड़ा-बड़ा लिखा हुआ था दुर्रानी. ओह तो मियां दुर्रानी ख़ानदान से हैं. बड़ी ख़ुशी और एक डर सा भी हुआ. कही मेरी हसरतें पूरी होने के पहले तो बिखर ना जाएं. कहीं वो भी तो मुझे क़ुरैशी खानदान की बेटी तो नहीं समझ रहा. फिर लगा उसने मुझसे दिल लगाया है ,फिर सिंडरेला भी तो राजकुमार के साथ गई थी. कई सारी फ़िक्शन नॉवेल पढ़ी, जो शहरीश की मेज़ पर रखी थी. ज़्यादातर कहानियों में साजन अमीर सजनी ग़रीब यानी फ़र्श से अर्श तक पहुंचने के क़िस्से थे. इससे मेरी हसरतों को काफ़ी बल मिलता था.
हमारा ये बिना कोई बात किए नज़रें लड़ाने का सिलसिला दो वर्षों तक चलता रहा. शहरीश ने फ़र्स्ट क्लास में बीएससी और मैंने किसी तरह घसीटते हुए बीए पास कर लिया. अब घर में एक ही बात होती थी कि किसी तरह दोनों के हाथ पीले कर दिए जाएं.
मेरी हसरतें तो कुलांचे मार रही थीं. अब्बू अम्मी ने शहरीश को बुला कर पूछा कि उसे कोई पसंद तो नहीं है? शहरीश ने सर झुका ना में जवाब दिया. घर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई कि बेटी अभी भी फ़रमाबदार है. मुझसे पूछने का तो सवाल ही ना था, क्योंकि मैं तो कहीं आती जाती नहीं थी और भले ही वो लोग मुझे अपना मानते थे लेकिन थी तो मैं मुलाजिमा की बेटी ही. शहरीश को थोड़े घर के काम सिखाए जाने लगे. मैं जब भी ऊपर जाती शहरीश मुझे रोकती कि ऊपर जाने की क्या ज़रूरत है? मेरे पास तो फ़ोन भी नहीं था कि मैं अपने आशिक़ को अपना नंबर देती. एक दो बार उसने अपना फ़ोन दिखा इशारे से मुझसे नंबर मांगा. मैंने सर झुका लिया. इसी तरह मेरी हसरतें और गहरी होती जा रही थीं.
एक दिन सुबह घर पर बड़ी हलचल थी. शन्नो खाला ने मुझे ताकीद दी कि मैं अपने कमरे से ना निकलूं क्योंकि शहरीश का एक बड़े घर से पैग़ाम आया था और वो लोग आकर शहरीश को अंगूठी पहनाने वाले थे. मेरे अंदर एक शंका ने जन्म लिया. मैंने खाला से पूछा,“दूल्हे राजा भी आ रहे हैं क्या?”
खाला ने बताया कि नहीं वो नहीं आ रहा है, शायद उसने शहरी (शहरीश को प्यार से पुकारे जाने वाला नाम) को बाहर कहीं देखा है, शायद किसी शादी में. मैंने मन ही मन बड़ी राहत की सांस ली कि अब मेरा पैग़ाम भी आएगा वो भी बड़े घर से. पूरा घर शहरी की शादी में व्यस्त था. मुझे भी बहुत काम थे. एक बार मैं शहरी के साथ उसके जोड़े लेने मार्केट भी गई, वहां भी मुझे मेरे आशिक़ दिखे लेकिन मैंने तो मुंह पर हिजाब ओढ़ रखा था, पता नहीं उसने ग़ौर किया या नहीं. शहरी की शादी पूरे घर के लिए बड़े उत्साह का विषय थी. मेरे लिए भी एक जड़ाऊ सेट और एक महंगा सलवार कुर्ता लिया गया था. शन्नो खाला ने उस दिन मुझे अपनी छाती से लगा कर कहा,“मेरी जान तुम शहरी के निकाह पर ये न पहनना, लड़के वाले शहरी को छोड़ तुम्हें ही ले जाएंगे.’’
आख़िर शहरी मायूं में बैठ ही गई. हम सबने मिलकर ख़ूब धूम मचाया, गाने गाए. शायद ज़िंदगी में पहली बार शन्नो खाला नाची थी और मेरी पेशानी चूमते हुए बोली,“ये तो अभी शुरुआत है, देखना तेरी शादी में कैसे नाचूंगी?’’ सांचक में लड़के वाले जब कपड़े और गहने लेकर आए तो मुझे दौड़-दौड़ कर काम करते देख दूल्हे की मां ने पूछा भी कि कहीं मैं शहरीश की छोटी बहन तो नहीं. घर पर इतनी मसरूफ़ियत थी कि मैं छत पर जाना ही भूल गई थी. सोचा करे वो इंतज़ार, अब शहरी की रुख़सती के बाद ही सीधे दीदारे यार करूंगी. तड़पे वो भी कुछ दिन ऐसे ही ना थोड़ी आशिक़ी होती है. हर बार सजने के बाद ख़ुद को आइने में देखती और फिर एक रंगीन हसरत जन्म लेती काश…वो भी मुझे इस जोड़े में देखता. क्या करती उसका ना तो मुझे नाम ना ख़ानदान मालूम था. मालूम था तो केवल कार के पीछे लिखा हुआ दुर्रानी. दुल्हन के साथ ही मैं भी निकाह के दिन तैयार हुई. ख़ुद दुल्हन मुझे देख ख़ुशी से कूदने लगी और बोली,“मुझसे ज़्यादा तो तुम प्यारी लग रही हो. मैंने तो दूल्हे की फ़ोटो भी नहीं देखी है. मेरा शादी में कोई इंटरेस्ट भी नहीं है. तुम क्यों नहीं बैठ जाती मेरी जगह निकाह के लिए.”
मैंने भी शर्म से लाल लाल होते हुए जवाब दिया,“ना बाबा ना अल्लाह मियां ने मेरा भी जोड़ा आसमान में बनाया होगा, उसका क्या होगा?’’
शहरी हंसने लगी,“लगता है कहीं दिल दे बैठी हो.’’
अचानक नीचे शोर मचा,“बारात आ गई, बारात आ गई.”
मैं दौड़ कर खिड़की तक गई कि शहरीश के दूल्हे को तो देखूं जो उसी समय कार से बाहर उतारा गया. दूल्हे का चेहरा पूरा सेहरे से ढंका हुआ था. लेकिन अगर मेरी आंखें धोखा ना खा रही हों तो क़द काठी पहचानी सी लग रही थी. दूल्हे की सजी हुई कार के पीछे दर्जनों कार और सब पर एक स्टीकर ‘दुर्रानी’.
मैं तो मानो आसमान से नीचे गिर गई. मेरी मोहब्बत मुझे ही खा गई. मुझे तो मानो पाला मार गया. निकाह की जगह मैं एक लाश की तरह शहरीश के बग़ल में बैठी थी. दूल्हे के घर की सभी जनानियां शहरीश के मुंह से फूल उठा कह रही थीं “मुर्तज़र मियां इन्हीं के दीवाने थे. बार बार कहते थे दो मीनार की मस्जिद के सामने जो क़ुरैशी रहते है, उन्हीं की बेटी से शादी करना हैं. वो तो अच्छा है कि लड़की अच्छी है. नहीं तो मोहब्बत अंधी होती है. देखा नहीं बग़ल वाले अंसारी साहब का लड़का कहां फंस गया.”
इधर शहरीश ने तीन बार क़ुबूल है कहा और उधर अपनी हसरतों को यूं धू धू करते जलते देख मैं बेहोश हो गई. शन्नो खाला ने मुझे सम्भाला और अपने साथ कमरे में ले गई. दोनों गले लग फूट फूट कर रोए. शन्नो खाला को पहले ही मेरे रंग-ढंग से ही ये अंदाज़ा तो लग ही गया था कि कुछ तो मेरे अन्दर पक रहा है लेकिन मेरी हसरतें इस बेरहमी से दम तोड़ देंगी इसका उन्हें भी इल्म ना था.
शहरीश की रूखस्ती भी हो गई. मैं बाहर नहीं आयी, ना ही दूल्हे मियां का दीदारेयार किया. घर पर शन्नो खाला को छोड़ सबने इसे मेरी शहरी से बेपनाह मोहब्बत और अब जुदाई को ज़िम्मेदार ठहराया. वहां जुबेर मियां ने शहरी का जब घूंघट उठाया और वे भौंचक्के रह गए और उन्होंने तुरंत कहा,“तुम वो तो नहीं…’’ लेकिन शायद निकाह के वो तीन बार बोले गए दो बोल ‘क़ुबूल है’ में ग़ज़ब की ताक़त होती है कि उन्हें भी शहरी जैसी सुंदर लड़की को अपनाने में समझदारी लगी होगी. पहली बार जब शहरी वापस घर आयी उसने हंसते-हंसते मुझे, अम्मी और शन्नो खाला को बताया कि,“जुबेर ने तो मेरी जान ही निकाल दी थी कि तुम कौन? मैं तो डर गई पर फिर ख़ुद ख़ुद हंसने लगे कि वो मज़ाक़ कर रहे थे. घर पर सभी बड़े अच्छे हैं.’’
मुझे ख़ुद पर और अपनी दम तोड़ती मोहब्बत पर बड़ा तरस आया. लेकिन शन्नो खाला की मदद से मैं जल्दी ही संभल गई और अब्बाजी के पास जाकर कहा,“मैं फिर से कॉलेज जाना चाहती हूं. मुझे शादी नहीं करनी है. मेरी हसरत है कि मैं ख़ूब पढूं और सिविल सर्विस का इम्तिहान पास कर कलेक्टर बन आपका नाम रोशन करूं.’’
अब्बा जी का सीना चौड़ा हो गया और प्यार से उन्होंने मेरी पेशानी चूमी और कहा,“अल्लाह तुम्हारी हसरत पूरी करे. आमीन.”
मैंने एक लंबी सांस ली, पुरानी दर्द भरी यादों को दिल से निकाल नई हसरत को अंजाम देने में लग गई.

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डॉ संगीता झा

डॉ संगीता झा

डॉ संगीता झा हिंदी साहित्य में एक नया नाम हैं. पेशे से एंडोक्राइन सर्जन की तीन पुस्तकें रिले रेस, मिट्टी की गुल्लक और लम्हे प्रकाशित हो चुकी हैं. रायपुर में जन्मी, पली-पढ़ी डॉ संगीता लगभग तीन दशक से हैदराबाद की जानीमानी कंसल्टेंट एंडोक्राइन सर्जन हैं. संपर्क: 98480 27414/ sangeeta.jha63@gmail.com

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