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लाल हवेली: कहानी नए-पुराने रिश्तों की (लेखिका: शिवानी)

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
October 14, 2022
in क्लासिक कहानियां, ज़रूर पढ़ें, बुक क्लब
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Shivani_Stories
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यह कहानी सुधा की है, जो विभाजन के दंगों में ताहिरा बन गई थी. क्या होता है, जब वह सालों बाद अपने पाकिस्तानी पति के साथ भारत लौटती है. उसे यह पता चलता है कि उसके पूर्व पति ने अभी तक शादी नहीं की है. पढ़ें ताहिरा उर्फ़ सुधा के मन की दुविधा और कशमकश.

ताहिरा ने पास के बर्थ पर सोए अपने पति को देखा और एक लंबी सांस खींचकर करवट बदल ली.
कंबल से ढकी रहमान अली की ऊंची तोंद गाड़ी के झकोलों से रह-रहकर कांप रही थी. अभी तीन घंटे और थे. ताहिरा ने अपनी नाजुक कलाई में बंधी हीरे की जगमगाती घड़ी को कोसा, कमबख़्त कितनी देर में घंटी बजा रही थी. रात-भर एक आंख भी नहीं लगी थी उसकी.
पास के बर्थ में उसका पति और नीचे के बर्थ में उसकी बेटी सलमा दोनों नींद में बेखबर बेहोश पड़े थे. ताहिरा घबरा कर बैठ गई. क्यों आ गई थी वह पति के कहने में, सौ बहाने बना सकती थी! जो घाव समय और विस्मृति ने पूरा कर दिया था, उसी पर उसने स्वयं ही नश्तर रख दिया, अब भुगतने के सिवा और चारा ही क्या था!
स्टेशन आ ही गया था. ताहिरा ने काला रेशमी बुर्क़ा खींच लिया. दामी सूटकेस, नए बिस्तरबंद, एयर बैग, चांदी की सुराही उतरवाकर रहमान अली ने हाथ पकड़कर ताहिरा को ऐसे संभलकर अंदाज़ से उतारा जैसे वह कांच की गुड़िया हो, तनिक-सा धक्का लगने पर टूटकर बिखर जाएगी. सलमा पहले ही कूदकर उतर चुकी थी.
दूर से भागते, हांफते हाथ में काली टोपी पकड़े एक नाटे से आदमी ने लपककर रहमान अली को गले से लगाया और गोद में लेकर हवा में उठा लिया. उन दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे. ‘तो यही मामू बित्ते हैं.’ ताहिरा ने मन ही मन सोचा और थे भी बित्ते ही भर के. बिटिया को देखकर मामू ने झट गले से लगा लिया,‘बिल्कुल इस्मत है, रहमान.’ वे सलमा का माथा चूम-चूमकर कहे जा रहे थे,‘वही चेहरा मोहरा, वही नैन-नक्श. इस्मत नहीं रही तो ख़ुदा ने दूसरी इस्मत भेज दी.’
ताहिरा पत्थर की-सी मूरत बनी चुप खड़ी थी. उसके दिल पर जो दहकते अंगारे दहक रहे थे उन्हें कौन देख सकता था? वही स्टेशन, वही कनेर का पेड़, पंद्रह साल में इस छोटे से स्टेशन को भी क्या कोई नहीं बदल सका!
‘चलो बेटी.’ मामू बोले, बाहर कार खड़ी है. ज़िला तो छोटा है, पर अल्ताफ़ की पहली पोस्टिंग यही हुई. इन्शाअल्ला अब कोई बड़ा शहर मिलेगा.’
मामू के इकलौते बेटे अल्ताफ़ की शादी में रहमान अली पाकिस्तान से आया था, अल्ताफ़ को पुलिस-कप्तान बनकर भी क्या इसी शहर में आना था. ताहिरा फिर मन-ही-मन कुढ़ी.
घर पहुंचे तो बूढ़ी नानी ख़ुशी से पागल-सी हो गई. बार-बार रहमान अली को गले लगा कर चूमती थीं और सलमा को देखकर ताहिरा को देखना भूल गई,‘या अल्लाह, यह क्या तेरी क़ुदरत. इस्मत को ही फिर भेज दिया.’ दोनों बहुएं भी बोल उठीं,‘सच अम्मी जान, बिल्कुल इस्मत आपा हैं पर बहू का मुंह भी तो देखिए. लीजिए ये रही अशरफ़ी.’ और झट अशरफ़ी थमा कर ननिया सास ने ताहिरा का बुर्क़ा उतार दिया,‘अल्लाह, चांद का टुकड़ा है, नन्हीं नज़मा देखो सोने का दिया जला धरा है.’
ताहिरा ने लज्जा से सिर झुका लिया. पंद्रह साल में वह पहली बार ससुराल आई थी. बड़ी मुश्क़िल से वीसा मिला था, तीन दिन रहकर फिर पाकिस्तान चली जाएगी, पर कैसे कटेंगे ये तीन दिन?
‘चलो बहू, ऊपर के कमरे में चलकर आराम करो. मैं चाय भिजवाती हूं.’ कहकर नन्हीं मामी उसे ऊपर पहुंचा आई. रहमान नीचे ही बैठकर मामू से बातों में लग गया और सलमा को तो बड़ी अम्मी ने गोद में ही खींच लिया. बार-बार उसके माथे पर हाथ फेरतीं, और हिचकियां बंध जाती,‘मेरी इस्मत, मेरी बच्ची.’
ताहिरा ने एकांत कमरे में आकर बुर्क़ा फेंक दिया. बन्द खिड़की को खोला तो कलेजा धक हो गया. सामने लाल हवेली खड़ी थी. चटपट खिड़की बंद कर तख्त पर गिरती-पड़ती बैठ गई,‘ख़ुदाया-तू मुझे क्यों सता रहा हैं?’ वह मुंह ढांपकर सिसक उठी. पर क्यों दोष दे वह किसी को. वह तो जान गई थी कि हिन्दुस्तान के जिस शहर में उसे जाना है, वहां का एक-एक कंकड़ उस पर पहाड़-सा टूटकर बरसेगा. उसके नेक पति को क्या पता? भोला रहमान अली, जिसकी पवित्र आंखों में ताहिरा के प्रति प्रेम की गंगा छलकती, जिसने उसे पालतू हिरनी-सा बनाकर अपनी बेड़ियों से बांध लिया था, उस रहमान अली से क्या कहती?
पाकिस्तान के बंटवारे में कितने पिसे, उसी में से एक थी ताहिरा! तब थी वह सोलह वर्ष की कनक छड़ी-सी सुन्दरी सुधा! सुधा अपने मामा के साथ ममेरी बहन के ब्याह में मुल्तान आई. दंगे की ज्वाला ने उसे फूंक दिया. मुस्लिम गुंडों की भीड़ जब भूखे कुत्तों की भांति उसे बोटी-सी चिचोड़ने को थी तब ही आ गया फ़रिश्ता बनकर रहमान अली. नहीं, वे नहीं छोड़ेंगे, हिंदुओं ने उनकी बहू-बेटियों को छोड़ दिया था क्या? पर रहमान अली की आवाज़ की मीठी डोर ने उन्हें बांध लिया. सांवला दुबला-पतला रहमान सहसा कठोर मेघ बनकर उस पर छा गया. सुधा बच गई पर ताहिरा बनकर. रहमान की जवान बीवी को भी देहली में ऐसे ही पीस दिया था, वह जान बचाकर भाग आया था, बुझा और घायल दिल लेकर. सुधा ने बहुत सोचा समझा और रहमान ने भी दलीलें कीं पर पशेमान हो गया. हारकर किसी ने एक-दूसरे पर बीती बिना सुने ही मजबूरियों से समझौता कर लिया. ताहिरा उदास होती तो रहमान अली आसमान से तारे तोड़ लाता, वह हंसती तो वह क़ुर्बान हो जाता.
एक साल बाद बेटी पैदा हुई तो रहा-सहा मैल भी धुलकर रह गया. अब ताहिरा उसकी बेटी की मां थी, उसकी क़िस्मत का बुलन्द सितारा. पहले कराची में छोटी-सी बजाजी की दुकान थी, अब वह सबसे बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर का मालिक था. दस-दस सुन्दरी एंग्लो इंडियन छोकरियां उसके इशारों पर नाचती, धड़ाधड़ अमरीकी नायलॉन और डेकरॉन बेचतीं. दुबला-पतला रहमान हवा-भरे रबर के खिलौने-सा फूलने लगा. तोंद बढ़ गई. गर्दन ऐंठकर शानदार अकड़ से ऊंची उठ गई, सीना तन गया, आवाज़ में ख़ुद-ब-ख़ुद एक अमरीकी डौल आ गया.
पर नीलम-पुखराज से जड़ी, हीरे से चमकती-दमकती ताहिरा, शीशम के हाथी दांत जड़े छपर-खट पर अब भी बेचैन करवटें ही बदलती. मार्च की जाड़े से दामन छुड़वाती हल्की गर्मी की उमस लिए पाकिस्तानी दोपहरिया में पानी से निकली मछली-सी तड़फड़ा उठती. मस्ती-भरे होली के दिन जो अब उसकी पाकिस्तानी ज़िन्दगी में कभी नहीं आएंगे गुलाबी मलमल की वह चुनरी उसे अभी भी याद है, अम्मा ने हल्का-सा गोटा टांक दिया था. हाथ में मोटी-सी पुस्तक लिए उसका तरुण पति कुछ पढ़ रहा था. घुंघराली लटों का गुच्छा चौड़े माथे पर झुक गया था, हाथ की अधजली सिगरेट हाथ में ही बुझ गई थी. गुलाबी चुनरी के गोटे की चमक देखते ही उसने और भी सिर झुका दिया था, चुलबुली सुन्दरी बालिका नववधू से झेंपझेंपकर रह जाता था, बेचारा. पीछे से चुपचाप आ कर सुधा ने दोनों गालों पर अबीर मल दिया था और झट चौके में घुसकर अम्मा के साथ गुझिया बनाने में जुट गई थी. वहीं से सास की नज़र बचाकर भोली चितवन से पति की ओर देख चट से छोटी-सी गुलाबी जीभ निकालकर चिढ़ा भी दिया था, उसने. जब वह मुल्तान जाने को हुई तो कितना कहा था उन्होंने,‘सुधा मुल्तान मत जाओ.’ पर वह क्या जानती थी कि दुर्भाग्य का मेघ उस पर मंडरा रहा है? स्टेशन पर छोड़ने आए थे, इसी स्टेशन पर. यही कनेर का पेड़ था, यही जंगला. मामाजी के साथ गठरी-सी बनी सुधा को घूंघट उठाने का अवकाश नहीं मिला. गाड़ी चली तो साहस कर उसने घूंघट ज़रा-सा खिसकाकर अंतिम बार उन्हें देखा था. वही अमृत की अंतिम घूंट थी.
सुधा तो मर गई थी, अब ताहिरा थी. उसने फिर कांपते हाथों से खिड़की खोली, वही लाल हवेली थी उसके श्वसुर वक़ील साहब की. वही छत पर चढ़ी रात की रानी की बेल, तीसरा कमरा जहां उसके जीवन की कितनी रस-भरी रातें बीती थीं, न जाने क्या कर रहे होंगे, शादी कर ली होगी, क्या पता बच्चों से खेल रहें हों! आंखें फिर बरसने लगीं और एक अनजाने मोह से वह जूझ उठी.
‘ताहिरा, अरे कहां हो?’ रहमान अली का स्वर आया और हडबड़ाकर आंखे पोंछ ताहिरा बिस्तरबंद खोलने लगी. रहमान अली ने गीली आंखें देखीं तो घुटना टेक कर उसके पास बैठ गया,‘बीवी, क्या बात हो गई? सिर तो नहीं दुख रहा है. चलो-चलो, लेटो चलकर. कितनी बार समझाया है कि यह सब काम मत किया करो, पर सुनता कौन है! बैठो कुर्सी पर, मैं बिस्तर खोलता हूं.’ मखमली गद्दे पर रेशमी चादर बिछाकर रहमान अली ने ताहिरा को लिटा दिया और शरबत लेने चला गया. सलमा आकर सिर दबाने लगी, बड़ी अम्मा ने आकर कहा, ‘नज़र लग गई है, और क्या.’ नहीं नज़मा ने दहकते अंगारों पर चून और मिर्च से नज़र उतारी. किसी ने कहा,‘दिल का दौरा पड़ गया, आंवले का मुरब्बा चटाकर देखो.’
लाड और दुलार की थपकियां देकर सब चले गए. पास में लेटा रहमान अली खर्राटे भरने लगा. तो दबे पैरों वह फिर खिड़की पर जा खड़ी हुई. बहुत दिन से प्यासे को जैसे ठंडे पानी की झील मिल गई थी, पानी पी-पीकर भी प्यास नहीं बुझ रही थी. तीसरी मंज़िल पर रौशनी जल रही थी. उस घर में रात का खाना देर से ही निबटता था. फिर खाने के बाद दूध पीने की भी तो उन्हें आदत थी. इतने साल गुज़र गए, फिर भी उनकी एक-एक आदत उसे दो के पहाड़े की तरह जुबानी याद थी. सुधा, सुधा कहां है तू? उसका हृदय उसे स्वयं धिक्कार उठा, तूने अपना गला क्यों नहीं घोंट दिया? तू मर क्यों नहीं गई, कुएं में कूदकर? क्या पाकिस्तान के कुएं सूख गए थे? तूने धर्म छोड़ा पर संस्कार रह गए, प्रेम की धारा मोड़ दी, पर बेड़ी नहीं कटी, हर तीज, होली, दीवाली तेरे कलेजे पर भाला भोंककर निकल जाती है. हर ईद तुझे ख़ुशी से क्यों नहीं भर देती? आज सामने तेरे ससुराल की हवेली है, जा उनके चरणों में गिरकर अपने पाप धो ले. ताहिरा ने सिसकियां रोकने को दुपट्टा मुंह में दबा लिया.
रहमान अली ने करवट बदली और पलंग चरमराया. दबे पैर रखती ताहिरा फिर लेट गई. सुबह उठी तो शहनाइयां बज रही थीं, रेशमी रंग-बिरंगी गरारा-कमीज अबरखी चमकते दुपट्टे, हिना और मोतिया की गमक से पूरा घर मह-महकर रहा था. पुलिस बैंड तैयार था, खाकी वर्दियां और लाल तुर्रम के साफ़े सूरज की किरनों से चमक रहे थे. बारात में घर की सब औरतें भी जाएंगी. एक बस में रेशमी चादर तानकर पर्दा खींच दिया गया था. लड़कियां बड़ी-बड़ी सुर्मेदार आंखों से नशा-सा बिखेरती एक दुसरे पर गिरती-पड़ती बस पर चढ़ रही थीं. बड़ी-बूढ़ियां पानदान समेटकर बड़े इत्मीनान से बैठने जा रही थीं और पीछे-पीछे ताहिरा काला बुर्क़ा ओढ़कर ऐसी गुमसुम चली जा रही थी जैसे सुध-बुध खो बैठी हो. ऐसी ही एक सांझ को वह भी दुल्हन बनकर इसी शहर आई थी, बस में सिमटी-सिमटाई लाल चुनर से ढकी. आज था स्याह बुर्क़ा, जिसने उसका चेहरा ही नहीं, पूरी पिछली जिन्दगी अंधेरे में डुबाकर रख दी थी.
‘अरे किसी ने वक़ील साहब के यहां बुलौआ भेजा या नहीं?’
बड़ी अम्मी बोलीं ओर ताहिरा के दिल पर नश्तर फिरा.
‘दे दिया अम्मी.’ मामूजान बोले,‘उनकी तबीयत ठीक नहीं है, इसी से नहीं आए.’
‘बड़े नेक आदमी हैं’ बड़ी अम्मी ने डिबिया खोलकर पान मुंह में भरा,
फिर छाली की चुटकी निकाली और बोली,‘शहर के सबसे नामी वक़ील के बेटे हैं पर आस न औलाद. सुना एक बीवी दंगे में मर गई तो फिर घर ही नहीं बसाया.’
बड़ी धूमधाम से ब्याह हुआ, चांद-सी दुल्हन आई. शाम को पिक्चर का प्रोग्राम बना. नया जोड़ा, बड़ी अम्मी, लड़कियां, यहां तक कि घर की नौकरानियां भी बन-ठनकर तैयार हो गई. पर ताहिरा नहीं गई, उसका सिर दुख रहा था. बे सिर-पैर के मुहब्बत के गाने सुनने की ताक़त उसमें नहीं थी. अकेले अंधेरे कमरे में वह चुपचाप पड़ी रहना चाहती थी-हिन्दुस्तान, प्यारे हिन्दुस्तान की आख़िरी सांझ.
जब सब चले गए तो तेज़ बत्ती जलाकर वह आदमकद आईने के सामने खड़ी हो गई. समय और भाग्य का अत्याचार भी उसका अलौकिक सौंदर्य नहीं लूट सका. वह बड़ी-बड़ी आंखें, गोरा रंग और संगमरमर-सी सफ़ेद देह. कौन कहेगा वह एक जवान बेटी की मां है? कहीं पर भी उसके पुष्ट यौवन ने समय से मुंह की नहीं खाई थी. कल वह सुबह चार बजे चली जाएगी. जिस देवता ने उसके लिए सर्वस्व त्याग कर वैरागी का वेश धर लिया है, क्या एक बार भी उसके दर्शन नहीं मिलेंगे? किसी शैतान-नटखट बालक की भांति उसकी आंखें चमकने लगीं.
झटपट बुर्क़ा ओढ़, वह बाहर निकल आई, पैरों में बिजली की गति आ गई, पर हवेली के पास आकर वह पसीना-पसीना हो गई. पिछवाड़े की सीढ़ियां उसे याद थीं जो ठीक उनके कमरे की छोटी खिड़की के पास अकर ही रुकती थीं. एक-एक पैर दस मन का हो गया, कलेजा फट-फट कर मुंह को आ गया, पर अब वह ताहिरा नहीं थी, वह सोलह वर्ष पूर्व की चंचल बालिका नववधू सुधा थी जो सास की नज़र बचाकर तरुण पति के गालों पर अबीर मलने जा रही थी. मिलन के उन अमूल्य क्षणों में सैयद वंश के रहमान अली का अस्तित्व मिट गया था. आख़िरी सीढ़ी आई, सांस रोककर, आंखे मूंद वह मनाने लगी,‘हे बिल्वेश्वर महादेव, तुम्हारे चरणों में यह हीरे की अंगूठी चढ़ाऊंगी, एक बार उन्हें दिखा दो पर वे मुझे न देखें.’
बहुत दिन बाद भक्त भगवान का स्मरण किया था, कैसे न सुनते? आंसुओं से अंधी ने देवता को देख लिया. वही गंभीर मुद्रा, वही लट्ठे का इकबर्रा पाजामा और मलमल का कुर्ता. मेज़ पर अभागिन सुधा की तस्वीर थी जो गौने पर बड़े भय्या ने खींची थी.
‘जी भरकर देख पगली और भाग जा, भाग ताहिरा, भाग!’ उसके कानों में जैसे स्वयं भोलानाथ गरजे.
सुधा फिर डूब गई, ताहिरा जगी. सब सिनेमा से लौटने को होंगे. अंतिम बार आंखों ही आंखों में देवता की चरण-धूलि लेकर वह लौटी और बिल्वेश्वर महादेव के निर्जन देवालय की ओर भागी. न जाने कितनी मनौतियां मांगी थीं, इसी देहरी पर. सिर पटककर वह लौट गई, आंचल पसारकर उसने आखिरी मनौती मांगी,‘हे भोलेनाथ, उन्हें सुखी रखना. उनके पैरों में कांटा भी न गड़े.’ हीरे की अंगूठी उतारकर चढ़ा दी और भागती-हांफती घर पहुंची.
रहमान अली ने आते ही उसका पीला चेहरा देखा तो नब्ज़ पकड़ ली,‘देखूं, बुखार तो नहीं है, अरे अंगूठी कहां गई?’ वह अंगूठी रहमान ने उसे इसी साल शादी के दिन यादगार में पहनाई थी.
‘न जाने कहां गिर गई?’ थके स्वर में ताहिरा ने कहा.
‘कोई बात नहीं’ रहमान ने झुककर ठंडी बर्फ़-सी लंबी अंगुलियों को चूमकर कहा,‘ये अंगुलियां आबाद रहें. इन्शाअल्ला अब के तेहरान से चौकोर हीरा मंगवा लेंगे.’
ताहिरा की खोई दृष्टि खिड़की से बाहर अंधेरे में डूबती लाल हवेली पर थी, जिसके तीसरे कमरे की रौशनी दप-से-बुझ गई थी. ताहिरा ने एक सर्द सांस खींचकर खिड़की बन्द कर दी.
लाल हवेली अंधेरे में गले तक डूब चुकी थी.

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