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ये उन दिनों की बात है, जब पेड़ चला करते थे!

अंडमान की एक ख़ूबसूरत लोक कथा

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
June 6, 2023
in ज़रूर पढ़ें, ट्रैवल, लाइफ़स्टाइल
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क्या आप अंडमान जाने का मन बना रहे हैं? क्या आप यात्रा के शौक़ीन हैं और कथाओं/ लोक कथाओं के भी? तो आपको अंडमान की इस लोक कथा के बारे में बता रहे हैं ग़ालिब मुसाफ़िर, जिसमें उस समय का ज़िक्र है, जब पेड़ चला करते थे. यह कथा बतौर पर्यटक अंडमान से  आपका नाता जोड़ने में सहायक होगी. अक्सर तो लोक कथाएं या किंवदंतियां हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण सबक सिखलाने के लिए ही बनाई जाती रही हैं और यह लोक कथा भी इस बात की तस्दीक करती है यानी यह कथा आपको जीवन की सीख भी देगी.

 

बेशक़ वे बड़े सुनहरे दिन थे. उन दिनों आदमी जंगलों में भटकता फिरता था. आदमी की तरह ही पेड़ भी घूमते-फिरते थे. आदमी उनसे जो कुछ भी कहता, वे उसे सुनते-समझते थे. जो कुछ भी करने को कहता, वे उसे करते थे. कोई आदमी जब कहीं जाना चाहता था तो वह किसी पेड़ से उसे वहां तक ले चलने को कहता था. पेड़ उसकी बात मानता और उसे गंतव्य तक ले जाता था. जब भी कोई आदमी पेड़ को पुकारता, पेड़ आता और उसके साथ जाता. उन दिनों पेड़ केवल चल ही नहीं सकते थे, बल्कि आदमी की तरह दौड़ भी सकते थे. असलियत में, पेड़ वो सारे काम कर सकते थे, जो आदमी कर सकता है.

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तब वहां ‘इलपमन’ नाम की एक जगह थी. वास्तव में वह मनोरंजन की जगह थी. पेड़ और आदमी वहां नाचते थे, गाते थे, ख़ूब आनंद और मज़े करते थे. वहां वे भाइयों की तरह हंसते-खेलते थे. लेकिन समय बदला. इस बदलते समय में आदमी के भीतर शैतान ने प्रवेश किया. उसके भीतर . बुराइयां पनप उठीं.

एक दिन कुछ लोगों ने पेड़ों पर लादकर कुछ सामान ले जाना चाहा. लेकिन उन्होंने पेड़ों इतना अधिक बोझ लाद दिया कि पेड़ मुश्किल से ही क़दम बढ़ा सके. वे बड़ी मुश्किल से डगमगाते हुए चल पा रहे थे. पेड़ों की उस हालत पर उन लोगों ने उनकी कोई मदद नहीं की. वे उल्टे पेड़ों का मज़ाक उड़ाने लगे.

पेड़ों को बहुत बुरा लगा. वे मनुष्य के ऐसे मित्रताविहीन रवैये से खिन्न हो उठे. वे सोचने लगे कि मनुष्य के हित की इतनी चिन्ता करने और ऐसी सेवा करने का नतीजा उन्हें इस अपमान के रूप में मिल रहा है. बस, उसी दिन से पेड़ स्थिर हो गए. उन्होंने आदमी की तरह इधर-उधर घूमना और दौड़ना बन्द कर दिया.

अब आदमियों को अपनी ग़लती का एहसास हुआ. वे पेड़ के पास गए और उनसे पहले की तरह ही दोस्त बन जाने की प्रार्थना की. लेकिन पेड़ नहीं माने. वे अचल बने रहे.
इस तरह आदमी के भद्दे और अपमानजनक रवैये ने उससे उसका सबसे अच्छा मित्र और मददगार छीन लिया.

तो देखा न आपने कि इस लोक कथा में भी एक सीख छुपी हुई है कि मित्र के साथ कभी भी अपमानजनक व्यवहार न करें. इस कथा को जानने के बाद अब जब कभी आप किसी पर्यटन स्थल पर घूमने जाएंगे, आपको पेड़ों के प्रति और लगाव महसूस होगा.

फ़ोटो: फ्रीपिक

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टीम अफ़लातून

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