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सेक्स को अधिक संतुष्टिप्रद और आनंददायक कैसे बनाया जाए?

कुछ प्रैक्टिकल टिप्स, जो आपकी सेक्स लाइफ़ को बेहतर बनाएंगे

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
August 28, 2023
in एक्सपर्ट सलाह, ज़रूर पढ़ें, रिलेशनशिप
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सेक्स को अधिक संतुष्टिप्रद और आनंददायक कैसे बनाया जाए?
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सेक्स के विषय जानकारों के पास अक्सर इस तरह के सवाल आते रहते हैं कि सेक्स को अधिक संतुष्टि देने वाला या आनंद देने वाला कैसे बनाया जा सकता है? सच तो यह है कि इस तरह के सवालों का कोई एक रेडिमेड जवाब नहीं हो सकता, पर इस बारे में क्या कुछ करके आप अपनी सेक्शुअल लाइफ़ को बेहतर बना सकते हैं, इसके बारे में अनुपमा गर्ग कुछ प्रैक्टिकल टिप्स दे रही हैं.

चलिए आज बात करते हैं सेक्स के एक प्रैक्टिकल मुद्दे के बारे में. मेरे पास कई प्रश्न आते रहते हैं, जहां पूछा जाता है कि साथी की इच्छा नहीं होती, क्या करूं? या फिर साथी को आनंद मिल जाता है, पर मेरी उत्तेजना पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पाती, क्या करूं? आदि. इन सवालों का दो शब्दों में तो उत्तर हो सकता है संवाद और एक्स्पेरिमेंट यानी प्रयोग. लेकिन मैं ये अच्छी तरह जानती हूं, व्यक्तिगत तौर पर भी और देख-सीख कर भी, कि ये हमेशा आसान नहीं होता.

ख़ुद को बहुत सुलझा हुआ समझने वाले लोग भी कभी-कभी पॉलिएमोरी (polyamory यानी एक से ज़्यादा साथियों के प्रति आकर्षण) को भटकन, BDSM (बॉन्डेज, डिसिप्लिन, सैडिज़्म और मैसकिज़्म जिसे सेक्शुअल वरीयता की ख़ुशनुमा रेंज में शामिल किया जाता है) को हिंसा और सेक्स के बारे में संवाद या बातचीत करने को बेशर्मी समझ सकते हैं. सुलझे हुए लोग भी अनाड़ी हो सकते है और यह भी ज़रूरी नहीं कि सुलझे हुए लोगों को नई चीज़ें ट्राय करना अच्छा लगता ही हो.

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कुछ लोगों को सिर्फ़ दाल रोटी चाहिए, कुछ को बिरयानी और कुछ को 56 भोग. ऐसे में मेरा साधारण सा दो शब्दों का उत्तर व्यावहारिक रूप से किसी काम का नहीं है, मैं यह भी समझती हूं इसलिए हम कई चीज़ों की बात करेंगे. इनमें से एक चीज़ है फ़ोरप्ले और आफ़्टरप्ले (foreplay and afterplay).

क्या है फ़ोरप्ले और आफ़्टरप्ले?
इंटरकोर्स या सम्भोग से पहले की जाने वाली कोई भी यौन क्रिया फ़ोरप्ले कहलाती है और उसके बाद की जाने वाली यौन क्रिया जैसे चुम्बन, आलिंगन, यहां तक कि बातें भी. कभी-कभी फ़ोरप्ले को ‘आउटरकोर्स’ (outercourse) भी कहा जाता है और आफ़्टरप्ले को ‘pillowtalk’ भी कह दिया जाता है.
लेकिन फ़ोरप्ले और आफ़्टरप्ले सिर्फ़ सेक्स और उत्तेजना के दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि रिश्ते में हर तरह से आत्मीयता बढ़ाने में भी सहायता करते हैं, फिर चाहे वो भावनात्मक सम्बन्ध हों या शारीरिक और यौन संबंध.

फ़ोरप्ले और आफ़्टरप्ले दोनों की अलग अलग योगदान है. फ़ोरप्ले उत्तेजना बढ़ाने में सहायक है, जिसके कारण सेक्स ज़्यादा आनंददायी हो सकता है. फ़ोरप्ले एक दूसरे के शरीर की समझ भी बढ़ाता है. फ़ोरप्ले से आप ये समझ पाते हैं कि आपके साथी को कैसा स्पर्श आनंद देता है, कैसा स्पर्श उत्तेजित करता है, और कैसा स्पर्श उन्हें असुविधा महसूस करवाता है, जैसे- कुछ लोगों को हल्के स्पर्श अच्छे लगते हैं, कुछ लोगों को हल्के स्पर्श से बेचैनी हो जाती है. कुछ लोगों को अपने साथी की मज़बूत पकड़ उत्तेजित कर सकती है, वहीं दूसरों को उसके कारण भय या कोई पुराना ट्रॉमा (कई बार अवचेतन भी) ट्रिगर हो सकता है.

लेकिन अगर फ़ोरप्ले कभी हुआ ही नहीं तो इन बातों के बारे में कभी कुछ पता भी नहीं चलेगा. और ऐसे में सेक्स का मतलब बस इतना ही रह जाता है कि लाइट बंद करके मैथुन/इंटरकोर्स कर लो, पुरुष का स्खलन हो जाए और करवट बदल के सो जाओ. लेकिन ऐसे सेक्स में आत्मीयता कहां हुई?

यह पूरे अनुभव को आनंदमय बनाता है
यही नहीं, फ़ोरप्ले से शारीरिक बदलाव भी आते हैं. पुरुष का उत्तेजित होना, पीनिस का इरेक्ट होना, महिला की योनि में स्त्राव… ये सब ऐसे बदलाव हैं, जो सेक्स को कम तकलीफ़देह या अधिक आनंदप्रद बनाते हैं. पर आपको इन सब चीज़ों के लिए फ़ुर्सत निकालनी पड़ेगी. अपने साथी के बारे में सोचना पड़ेगा. हड़बड़ी में सेक्स करना वैसे ही है जैसे दाल-भात ठूंसकर भकोस लेना. वहीं फ़ोरप्ले और आफ़्टरप्ले ऐसे है जैसे आपको खाने से पहले कोई एक ग्लास जलजीरा पिलाए, फिर थोड़ा सलाद दे, उसके बाद आप दाल-चावल आराम से अचार पापड़ वगैरह के साथ खाएं. और खाना खाकर एक ग्लास आम पना या छाछ या फिर कोई मिठाई खाएं.

फ़ोरप्ले और आफ़्टरप्ले से एक और जो महत्त्वपूर्ण बात होती है, वो है एक दूसरे के शरीर के प्रति असहजता ख़त्म होना. सच तो ये है कि वक्ष का साइज़, लिंग का साइज़ और ऐसी अनेक भ्रांतियां सिर्फ़ इसलिए फैली होती हैं, क्योंकि हम में से अधिकतर लोग, रोमैंस या सेक्स के सन्दर्भ में नग्न मानव शरीर सिर्फ़ पोर्न में देखते हैं. और हम सबको पता है कि हम में से अधिकतर ने किसी मॉडल, पोर्नस्टार, या परफ़ेक्ट 36 – 24 – 36 साइज़ की महिला या 9 इंच लम्बे लिंग वाले पुरुष को अपना साथी नहीं चुना होता है.

अपने सेक्शुअल अनुभव की पोर्न से तुलना न करें
दरअसल, सच यह आपको मानना होगा कि पोर्न व्यावसायिक है और इसलिए पोर्न उतना ही अवास्तविक और कपोल कल्पित है, जितना आपका रोज़ हर बार खाने में चार-चार रस मलाई खाना. यथार्थ ये है, कि हम में से अधिकतर लोग कभी अपनी कपोल कल्पना के परे जा कर, अपने साथी का शरीर या अपना ख़ुद का शरीर एक्स्प्लोर ही नहीं करते. हमें फ़ुर्सत ही नहीं कि मूड बनाने के लिए हम अपनी बाक़ी इन्द्रियों को भी काम में लें. स्पर्श, सुगंध, स्वाद, संगीत, सब को छोड़कर हम सिर्फ़ और सिर्फ़ सामने क्या दिख रहा है इस बात पर फ़ोकस करने लगते हैं. ऐसे में सेक्स से संतुष्टि मिले भी कैसे?

जो लोग फ़ोरप्ले के बारे में समझते भी हैं, उन्हें भी कुछ ग़लतफ़हमियां सामान्य तौर पर रह जाती हैं, जैसे- हर किसी के लिए फ़ोरप्ले का मतलब अलग अलग हो सकता है. कुछ के लिए अपने साथी के साथ डर्टी टॉक्स उत्तेजनाप्रद होती हैं, कुछ के लिए कैंडल लाइट्स, कुछ के लिए चुंबन, डिनर, ड्रिंक्स, रोलप्ले, या कुछ और. ऐसे ही स्पर्श के कई तरीक़े हो सकते हैं. कोई मसाज देना चाह सकता है, किसी को मसाज करवाने में ज़्यादा रिलैक्स्ड महसूस होता है.

इन ग़लतफ़हमियों से भी पार पा लें
इसी तरह कुछ लोगों को ये ग़लतफ़हमी होती है कि फ़ोरप्ले हो तो सेक्स होना ही चाहिए, यह भी कोई ज़रूरी नहीं है. कई बार फ़ोरप्ले अपने आप में ही काफ़ी होता है. एक सामान्य भ्रान्ति यह भी है कि फ़ोरप्ले में टॉएज़ का इस्तेमाल करना मतलब साथी में कोई कमी है. ऐसे में मेरा मानना ये है कि पापड़ खाने का मतलब ये नहीं कि दाल चावल में स्वाद नहीं है. पापड़ सिर्फ़ एक और चीज़ है, जो आपकी स्वादेन्द्रिय को एक और स्वाद चखाती है.

यह भी जान लें कि सब लोग फ़ोरप्ले करने में कंफ़र्टेबल या सहज नहीं होते. अगर आपको या आपके साथी को फ़ोरप्ले या आफ़्टरप्ले में झिझक महसूस होती है तो आपको ये समझने की ज़रूरत है कि ये असहजता क्यों है. क्या यह इसलिए है कि आप आलसी हैं या आपको कॉन्फ़िडेंस नहीं है या आपको लगता है कि कहीं आप जज न किए जाएं या फिर इसलिए कि आपने कभी कर के देखा नहीं है?

चाहे जो भी कारण हों, सच यह है कि आपके और आपके साथी के आनंदप्राप्ति की ज़िम्मेदारी आप ही दोनों की है इसलिए जब तक कोशिश करके नहीं देखेंगे, तब तक पता चलेगा भी नहीं. सेक्शुअल एक्सपेरिमेंट की आदत न होने का बहाना वैसे ही है, जैसे कोई कहे कि बचपन में मेरी मां मेरा लंगोट बदलती थी इसलिए मुझे आदत नहीं अपना कच्छा खुद पहनने की.
फ़ोरप्ले या आफ़्टरप्ले के बारे में और भी बहुत कुछ लिखा जा सकता है, टिप्स भी दिए जा सकते हैं लेकिन, बात का सार सिर्फ़ इतना ही है कि धीरे-धीरे, प्यार से, अपने साथी की पसंद जानने की कोशिश करें, अपनी पसंद उन्हें बताएं, बिना थोपे बिना जज किए, जो चीज़ें दोनों को पसंद हों, उन्हें करके देखें और आपको अपनी सेक्स लाइफ़ में ख़ुद ही फ़र्क दिख जाएगा.

फ़ोटो: फ्रीपिक

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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