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डायबिटीज़ और हाइपरटेंशन है? दातून की ओर वापसी कीजिए, तुरंत!

डॉक्टर दीपक आचार्य by डॉक्टर दीपक आचार्य
November 25, 2021
in ज़रूर पढ़ें, फ़िटनेस, हेल्थ
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डायबिटीज़ और हाइपरटेंशन है? दातून की ओर वापसी कीजिए, तुरंत!
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तो आप भी उन लोगों में से हैं, जिनको डायबिटीज़ या ब्लडप्रेशर या दोनों की ही समस्या है? इसका श्रेय हमारे खानपान में बदलाव को तो जाता ही है, पर एक और चीज़ है, जिसका इसमें योगदान है और वो है दातों को साफ़ करने के तरीक़े में आया बदलाव. हम सभी ने 90’ का दशक बीतते न बीतते ब्रश और टूथ पेस्ट का इस्तेमाल तो शुरू कर दिया. यहां डॉक्टर दीपक आचार्य बता रहे हैं कि क्यों हमें और ख़ासतौर पर उन्हें, जिन्हें हाइपरटेंशन और डायबिटीज़ की समस्या है, दांतों को साफ़ रखने के लिए दातून का इस्तेमाल करना चाहिए.

तो भई बताइए कि वर्ष 1990 से पहले कितने लोगों को डायबिटीज़ होता था? कितने लोग हाइपरटेंशन से त्रस्त थे? नब्बे के दशक के साथ-साथ हर घर में एक डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर का रोगी आ गया, क्यों? बहुत सारी वजहें होंगी, जिनमें हमारे खानपान में बदलाव को सबसे ख़ास माना जा सकता है.
बदलाव के उस दौर में एक चीज़ बहुत ख़ास थी, जो खो गई, पता है ना क्या है वो? दातून! गांव-देहात में आज भी लोग दातून इस्तमाल करते दिख जाएंगे, लेकिन शहरों में दातून पिछड़ेपन का संकेत बन चुका है. गांव-देहात में डायबिटीज़ और हाइपरटेंशन के रोगी यदाकदा ही दिखेंगे या ना के बराबर ही होंगे. वजह साफ़ है: ज़्यादातर लोग आज भी दातून करते हैं. तो भई, डायबिटीज़ और हाइ ब्लड प्रेशर के साथ दातून का क्या संबंध? यही सोच रहे हो ना? तो आज आपका दिमार्ग हिल जाएगा… और फिर इत्मीनान से सोचिएगा, हमने क्या खोया, क्या पाया?

टूथपेस्ट और माउथवॉश का दावा सही है!
ये जो बाज़ार में टूथपेस्ट और माउथवॉश आ रहे हैं ना, 99.9% सूक्ष्मजीवों का नाश करने का दावा करने वाले, उनका दावा तो बिल्कुल सही है, पर उन्हीं ने सारा बंटाधार कर दिया है. ये माउथवॉश और टूथपेस्ट बेहद स्ट्रॉन्ग ऐंटीमाइक्रोबियल होते हैं और हमारे मुंह के 99% से ज़्यादा सूक्ष्मजीवों को वाक़ई मार गिराते हैं. इनकी मारक क्षमता इतनी ज़बर्दस्त होती है कि ये मुंह के उन बैक्टिरिया का भी ख़ात्मा कर देते हैं, जो हमारी लार (सलाइवा) में होते हैं और ये वही बैक्टिरिया हैं, जो हमारे शरीर के नाइट्रेट (NO3-) को नाइट्राइट (NO2-) और बाद में नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) में बदलने में मदद करते हैं. जैसे ही हमारे शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड की कमी होती है, ब्लड प्रेशर बढ़ता है. ये मैं नहीं कह रहा, दुनियाभर की रिसर्च स्ट्डीज़ बताती हैं कि नाइट्रिक ऑक्साइड का कम होना ब्लड प्रेशर को बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदार है.

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आइए, कुछ जर्नल्स और रिपोर्ट्स पर नज़र डालें
जर्नल ऑफ़ क्लिनिकल हाइपरेटेंस (वर्ष 2004) में ‘नाइट्रिक ऑक्साइड इन हाइपरटेंशन’ टाइटल के साथ छपे एक रिव्यू आर्टिकल में सारी जानकारी विस्तार से छपी है. और नाइट्रिक ऑक्साइड की यही कमी इंसुलिन रेज़िस्टेंस के लिए भी ज़िम्मेदार है. समझ आया खेल? नाइट्रिक ऑक्साइड कैसे बढ़ेगा, जब इसे बनाने वाले बैक्टिरिया का ही काम तमाम कर दिया जा रहा है? ब्रिटिश डेंटल जर्नल में 2018 में तो बाक़ायदा एक स्टडी छपी थी, जिसका टाइटल ही ’माउथवॉश यूज़ और रिस्क ऑफ़ डायबिटीज़’ था. इस स्टडी में तीन साल तक उन लोगों पर अध्धयन किया गया, जो दिन में कम से कम 2 बार माउथवॉश का इस्तमाल करते थे और पाया गया कि 50% से ज़्यादा लोगों को प्री-डायबिटिक या डायबिटीज़ की कंडिशन का सामना करना पड़ा.

तो अब क्या करना है भाई?
अब आप ही बताओ करना क्या है? कितना माउथवॉश यूज़ करेंगे? कितने टूथपेस्ट लाएंगे सूक्ष्मजीवों को मार गिराने वाले? दांतों की फिक्र करने के चक्कर में आपके पूरे शरीर की बैंड बज रही है सरकार…! गांव-देहातों में तो दातून का भरपूर इस्तेमाल हो रहा है और ये दातून मुंह की दुर्गंध भी दूर कर देते हैं और सारे बैक्टिरिया का ख़ात्मा भी नहीं करते. मेरे पातालकोट में तो आदिवासी टूथपेस्ट, टूथब्रश क्या होते हैं, जानते तक नहीं. अब आप सोचेंगे कि दीपक आचार्य ने टूथपेस्ट और माउथवॉश को लेकर इतनी पंचायत कर ली तो दातून के प्रभाव को लेकर किसी क्लिनिकल स्टडी की बात क्यों नही की?

तो अब दातून से जुड़ी स्टडी की भी बात हो जाए
बबूल और नीम की दातून को लेकर एक क्लिनिकल स्टडी जर्नल ऑफ़ क्लिनिकल डायग्नोसिस ऐंड रिसर्च में छपी और बताया गया कि स्ट्रेप्टोकोकस म्यूटेंस की वृद्धि रोकने में ये दोनों ज़बर्दस्त तरीक़े से कारगर हैं. ये वही बैक्टिरिया है, जो दांतों को सड़ाता है और कैविटी का कारण भी बनता है. वो सूक्ष्मजीव जो नाइट्रिक ऑक्साइड बनाते हैं, जैसे- एक्टिनोमायसिटीज़, निसेरिया, शालिया, वीलोनेला आदि दातून के शिकार नहीं होते क्योंकि इनमें वो हार्ड केमिकल कंपाउंड नहीं होते, जो माउथवॉश और टूथपेस्ट में डाले जाते हैं.

सार यहां है!
चलते-चलते एक बात और बता दूं, आदिवासी दांतों पर दातून घुमाने के बाद एकाध बार ही थूकते हैं, बाद में दांतों पर दातून की घिसाई तो करते हैं और लार को निगलते जाते हैं? लिंक समझ आया? लार में ही तो असल खेल है! तो ये हिंदुस्तान का ठेठ देसी ज्ञान है बाबू. यहां तो इस ज्ञान को यूं समझा देते हैं तो लाइनों में:
बासी पानी जे पिये, ते नित हर्रा खाय।
मोटी दतुअन जे करे, ते घर बैद न जाय।।
तो अब आप फटाफट इस जानकारी को शेयर करें और गंगा नहा लें.

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट

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डॉक्टर दीपक आचार्य

डॉक्टर दीपक आचार्य, पेशे से एक साइंटिस्ट और माइक्रोबायोलॉजिस्ट हैं. इन्होंने मेडिसिनल प्लांट्स में पीएचडी और पोस्ट डॉक्टरेट किया है. पिछले 22 सालों से हिंदुस्तान के सुदूर आदिवासी इलाक़ों से आदिवासियों के हर्बल औषधीय ज्ञान को एकत्र कर उसपर वैज्ञानिक नज़रिए से शोध कर रहे हैं.

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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