आज महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर हम आपके साथ साझा कर रहे हैं कि लॉर्ड माउंटबेटन, जिन्होंने महात्मा गांधी के साथ हमारी स्वतंत्रता को लेकर कई बार बातचीत की थी, ने गांधी जी की 100वीं जयंति के अवसर पर उन्हें किन शब्दों में अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की थी. लॉर्ड माउंटबेटन की ओर से दिया गया ये वक्तव्य अपने आप ही आपको बता देगा कि गांधी जी भारत के विभाजन से बिल्कुल सहमत नहीं थे और बावजूद इसके आख़िर क्यों वे देश का बंटवारा रोक नहीं सकते थे?
‘‘यहां हम जिस व्यक्ति को उसकी शताब्दी श्रद्धांजलि देने के लिए इकट्ठा हुए हैं, वह छोटे शारीरिक कद का था. गंदे कपड़े पहने हुए, नंगे पैर या सैंडल पहने हुए, उसकी सस्ती-सी जेब घड़ी, डोरी के एक टुकड़े पर लटकी होती थी और यह तस्वीर पूरी होती थी स्टील-रिम वाले चश्मे की एक जोड़ी के साथ. वास्तव में कुछ लोगों को वह एक अजीब-सा, छोटा-सा व्यक्ति लगा होगा. लेकिन उनके शरीर के छोटे ढांचे के भीतर, एक इतना बड़ा दिल था कि इसमें सभी गरीबों और पीड़ितों को शामिल किया जा सकता था. उसके दिल का एक हिस्सा उन लोगों को क्षमा करने और इसके लिए बहाने खोजने के लिए तैयार था, जो उसके दुश्मन थे. उन्हें इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता था कि बिना सोचे-समझे लोग उनके रूप-रंग को लेकर उपहासपूर्ण टिप्पणियाँ करते थे.
‘‘उस समय यहां भीख मांगने वाले निकरबॉकर (बैगी जैसे ढीले-ढाले पतलून, जो घुटने से करीब 4 इंच नीचे तक लटकते हैं) लोकप्रिय थे. उन्होंने अपनी लंगोटी से उसकी तुलना करके ये कहकर सभी की बोलती बंद कर कि दूसरे ‘प्लस फ़ोर’ पहनते हैं, मैं ‘माइनस फ़ोर’ पहनता हूं. उन्हें केवल इस बात की परवाह थी कि लोग उनके उपदेशों और अहिंसा के उनके व्यक्तिगत उदाहरण का अनुसरण करें. उनके कपड़ों की तरह ही उनका संदेश भी सरल था. यह यीशु की शिक्षा का पालन करना था, “अपने पड़ोसी से भी अपने जितना ही प्रेम करो.”
‘‘जैसा कि मैंने पुस्तक की प्रस्तावना में कहा है, गांधी शताब्दी समारोहों से भारत के प्रति जो सद्भावना पैदा हुई है, उसे मापना असंभव है. मुझे इस बात की विशेष खुशी है, क्योंकि मैं ब्रिटिश और भारतीय लोगों के बीच निरंतर सद्भावना को अत्यधिक महत्व देता रहा हूं. फिर भी, कुछ ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जो इन अच्छे संबंधों को नुकसान पहुंचा सकते हैं, ख़ास तौर पर यदि उनका खंडन किए बिना उन्हें भारत में रिपोर्ट किया जाए या पुनर्प्रकाशित किया जाए.
‘‘एक लेखक का कहना है कि गांधीवादी विरासत के बिना, भारत आज बेहतर और मानसिक रूप से स्वस्थ होता. वह विशेष रूप से इस तथ्य का उल्लेख कर रहे थे कि गांधी के चरखे कारखानों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते हैं और देश के सूखे खेतों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है- बड़े आधुनिक सिंचाई बांधों का पानी. लेकिन ये ऐसे तथ्य हैं, जिन पर गांधी ने कभी विवाद नहीं किया होगा. कोई भी व्यापक सिंचाई के प्रति उत्सुक नहीं था और चरखा तो बेरोज़गार ग्रामीणों को उपयोगी काम देने और सभी को यह महसूस कराने का प्रतीक मात्र था कि वे अपने देश के कल्याण में फ़ौरी तौर पर कुछ योगदान दे सकते हैं.
‘‘गांधी पर प्रसारित एक प्रशंसनीय टीवी कार्यक्रम के बाद एक टीवी चर्चा में एक उत्साही युवा भारतीय कम्युनिस्ट ने दावा किया कि गांधी की अहिंसा विनाशकारी थी, क्योंकि इसने उस रक्तपात को रोका था, जिसके बिना भारत कभी भी पूंजीवादी वर्गों से छुटकारा नहीं पा सकता था. उन्होंने गांधी पर भारत के विनाशकारी विभाजन में एक पक्ष होने का भी आरोप लगाया. शांति और अहिंसा में विश्वास रखने वाला कोई भी व्यक्ति उनकी पहली आलोचना को स्वीकार नहीं करेगा, लेकिन दूसरी बात अधिक कपटपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने कुछ इस तरह बात की जैसे उन्हें गांधी के दिमाग के बारे में कुछ अंदरूनी जानकारी हो. स्पष्ट तथ्य यह है कि महात्मा गांधी के संघर्ष के दो मुख्य उद्देश्य थे, पहला भारत के लिए स्वतंत्रता हासिल करना और ऐसा करने में ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के साथ संबंध बनाए रखना. और दूसरी बात, वह भारत की एकता को बनाए रखना चाहते थे, जिसके बारे में उन्होंने मुझसे स्वीकार किया था कि यह भारत के लिए ब्रिटेन की सबसे बेहतरीन विरासत होगी.
एक लेखक का कहना है कि गांधीवादी विरासत के बिना, भारत आज बेहतर और मानसिक रूप से स्वस्थ होता. वह विशेष रूप से इस तथ्य का उल्लेख कर रहे थे कि गांधी के चरखे कारखानों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते हैं और देश के सूखे खेतों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है- बड़े आधुनिक सिंचाई बांधों का पानी. लेकिन ये ऐसे तथ्य हैं, जिन पर गांधी ने कभी विवाद नहीं किया होगा और चरखा तो बेरोज़गार ग्रामीणों को उपयोगी काम देने और सभी को यह महसूस कराने का प्रतीक मात्र था कि वे अपने देश के कल्याण में फ़ौरी तौर पर कुछ योगदान दे सकते हैं.
’’1947 तक, यह बिल्कुल स्पष्ट हो गया था कि उनके दोनों लक्ष्य हासिल नहीं हो सकते. जिस तरह से वह चाहते थे, भारत उस तरह से एकीकृत केवल तभी रह सकता था, जबकि ब्रिटिश शासन कायम रहे. जिस आज़ादी की वह इतनी शिद्दत से इच्छा रखते थे, वह शक्तिशाली मुस्लिम लीग को तभी स्वीकार होती, जब मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी अलग होकर पाकिस्तान बना सके. अपनी हताशा में, उन्होंने कई तरक़ीबें आज़माईं, यहां तक कि उन्होंने मुझे यह सुझाव भी दिया कि मुझे उनके शक्तिशाली नेता श्री जिन्ना को बुलाना चाहिए और उन्हें मुस्लिम लीग के सदस्यों और उनके द्वारा चुने गए किसी अन्य व्यक्ति के साथ केंद्र में अंतरिम सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना चाहिए. सत्ता उन्हें सौंप दी जाएगी और वे उसका जो चाहे उपयोग करेंगे. मैंने कहा कि उन्हें पहले कांग्रेस पार्टी के नेताओं की सहमति लेनी होगी, जो पाने में वे निश्चित रूप से विफल रहे. इन सब का वर्णन, हेनरी हॉजसन के सत्ता हस्तांतरण के अद्भुत इतिहास, जिसे “द ग्रेट डिवाइड” कहा जाता है, में मौजूद है.
‘‘जब मैं लंदन की बैठकों से वापस आया तो वह बहुत परेशान थे, जिसमें सरकार मेरी 3 जून की योजना पर सहमत हो गई थी, जिसके अनुसार भारतीय प्रांतों को स्वयं यह निर्णय लेना होगा कि स्वतंत्रता प्राप्त करने पर, देश को किसी प्रकार की केंद्रीय सरकार के तहत एकीकृत रहना है या विभाजित किया जाना है. उन्हें एहसास हो गया था कि इससे बंटवारा होगा. मैंने तुरंत ही इस योजना पर प्रमुख पार्टियों की सहमति प्राप्त कर ली, लेकिन मेरे संपर्कों ने मुझे चेतावनी दी कि गांधी अपनी अगली प्रार्थना सभा में इसकी निंदा करने के मूड में थे. इसलिए मैंने गांधीजी से, जैसा कि मैं उन्हें बुलाया करता था, आने और मुझसे मिलने के लिए कहा और एक बहुत ही पीड़ादायक मुलाक़ात की उम्मीद की. लेकिन जब उन्होंने वायसराय हाउस में मेरे अध्ययन कक्ष में प्रवेश किया तो उन्होंने अपनी उंगलियां अपने होठों पर रख लीं, यह संकेत देने के लिए कि यह मौन का दिन था. मैंने राहत की सांस ली. मैंने अपनी एकतरफ़ा बातचीत में उन्हें यह समझाने के लिए अपनी सारी चतुराई का इस्तेमाल किया कि नई योजना ही सत्ता का शीघ्र और शांतिपूर्ण हस्तांतरण हासिल करने का एकमात्र संभव तरीका है. मैंने उनसे प्रार्थना सभा में योजना के विरुद्ध न बोलने का आग्रह किया. उन्होंने कुछ इस्तेमाल किए जा चुके लिफाफों के पीछे एक कुंद पेंसिल से लिखकर मुझे उत्तर दिया, जिसे मैंने अपने अभिलेखागार में रखा है. अब मैंने पिछले सप्ताह उसे देखा और उन्होंने लिखा था:
‘‘मुझे खेद है कि मैं बोल नहीं सकता. जब मैंने सोमवार के मौन के बारे में निर्णय लिया था तो मैंने दो अपवाद रखे थे, अत्यावश्यक मामलों पर उच्च पदाधिकारियों से बात करना या बीमार लोगों की देखभाल करना. लेकिन मैं जानता हूं आप नहीं चाहते कि मैं अपनी चुप्पी तोड़ूं. क्या मैंने अपने भाषणों के दौरान आपके विरुद्ध एक शब्द भी कहा है? यदि आप स्वीकार करते हैं कि मैंने ऐसा नहीं किया है तो आपकी चेतावनी अनावश्यक है.’’
महात्मा गांधी के संघर्ष के दो मुख्य उद्देश्य थे, पहला भारत के लिए स्वतंत्रता हासिल करना और ऐसा करने में ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के साथ संबंध बनाए रखना. और दूसरी बात, वह भारत की एकता को बनाए रखना चाहते थे, जिसके बारे में उन्होंने मुझसे स्वीकार किया था कि यह भारत के लिए ब्रिटेन की सबसे बेहतरीन विरासत होगी.
‘‘उन्होंने इस योजना की निंदा नहीं की, क्योंकि वास्तव में उस अंतिम तिथि पर इसके सिवाय कोई अन्य रास्ता नहीं था, जिसके द्वारा भारत को सत्ता हस्तांतरित की जा सके. ये कहना कि वे भारत के विभाजन से सहमत हो गए थे, साफ़ तौर पर उनकी यादों के साथ सरासर अन्याय है.
मुझे लगता है कि बहुत कम लोग ही, ज़्यादातर वे जो भारत को आज़ादी मिलने से नाख़ुश थे, भारत में आई मुसीबतों और अराजकता को देखकर शाडनफ्रोएड (schadenfreude-किसी अन्य व्यक्ति के दुर्भाग्य से ख़ुद को मिलने वाली ख़ुशी) का लोभ संभाल नहीं पाए और गांधी जी पर उंगली उठाते रहे. एक लेखक का दावा है कि महात्मा गांधी की आत्मा उनके जन्म के 100 साल बाद आज भारत में समाप्त हो गई थी. वह बताते हैं कि गांधी के जन्मस्थान गुजरात में भी हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हिंसा और दंगे हुए, जो सालभर से बढ़ती जा रही हिंसा के चरमोत्कर्ष के रूप में हुआ. साथ ही, उनका कहना है कि भारत ने खुद को और दुनिया को यह समझाने के लिए इस साल लाखों रुपये खर्च किए हैं कि महात्मा की आत्मा अभी भी जीवित है.
‘‘एक ब्रिटिश संवाददाता की हिम्मत कैसे हुई कि वह महात्मा गांधी की भावना के प्रचार-प्रसार और अहिंसा की नीति को सचमुच जीवित रखने की अनिवार्य आवश्यकता को दर्शाने के प्रयासों पर खर्च किए गए धन की आलोचना करे? आख़िरकार, भारत में दंगे दो बिल्कुल अलग-अलग धर्मों के समुदायों के बीच होते हैं, जो बिल्कुल अलग-अलग देवताओं की पूजा करते हैं. यहां यूनाइटेड किंगडम में, हम अभी भी उन लोगों के बीच दंगे और हिंसा देख रहे हैं, जो ईसाई हैं और एक ही भगवान की पूजा करते हैं, हालांकि अलग-अलग चर्चों में. हम शिक्षित होने का दावा करते हैं. भारतीय अभी भी बड़े पैमाने पर निरक्षर हैं. लेकिन दोनों सरकारें अपने लोगों के बीच शांति और सद्भाव वापस लाने का प्रयास कर रही हैं.
मुझे लगता है कि बहुत कम लोग ही, ज़्यादातर वे जो भारत को आज़ादी मिलने से नाख़ुश थे, भारत में आई मुसीबतों और अराजकता को देखकर शाडनफ्रोएड (schadenfreude-किसी अन्य व्यक्ति के दुर्भाग्य से ख़ुद को मिलने वाली ख़ुशी) का लोभ संभाल नहीं पाए और गांधी जी पर उंगली उठाते रहे.
‘‘गांधीजी के अहिंसा और शांति के सिद्धांत को फैलाने पर खर्च होने वाली राशि पर यह आलोचना कि बहुत ज़्यादा पैसा ख़र्च हो रहा है, ग़लत है, जबकि जायज़ आलोचना यह है कि इसे व्यावहारिक रूप से लागू करने के लिए उठाए जा रहे कदम पर्याप्त रूप से प्रभावी नहीं हैं. और समुदाय के कुछ वर्ग ऐसे भी हैं, जो आग बुझाने की कोशिश करने के बजाय उसे भड़काते हुए दिखाई दे रहे हैं. गांधी शताब्दी समारोह का मुख्य उद्देश्य निश्चित रूप से दुनियाभर के लोगों को यह दिखाना होना चाहिए कि अहिंसा ही किसी भी समस्या से निपटने का एकमात्र सभ्य तरीका है, चाहे वह राष्ट्रों के बीच युद्ध का ख़तरा हो या स्थानीय धार्मिक विवाद हो.
‘‘प्रिंस ऑफ़ वेल्स अभी 21 वर्ष के नहीं हैं. वह युवाओं के लिए बोलते हैं और युवाओं को ही अहिंसा के दर्शन को अपनाना चाहिए. पुरानी पीढ़ियों ने दो बार चीज़ों को गड़बड़ कर दिया और दो विश्व युद्ध हुए. तीसरा विश्व युद्ध, जो अनिवार्य रूप से संपूर्ण परमाणु हमले तक बढ़ जाएगा, पूरी सभ्यता को नष्ट कर देगा. आइए, आशा करें कि महामहिम (प्रिंस ऑफ़ वेल्स) की पीढ़ी बेहतर करेगी और दुनियाभर के छात्रों के रूप में, अपने स्वयं के मामलों में हिंसा से बचने का निर्णय लेगी. इस प्रकार, जब वे उच्च ज़िम्मेदारी के पद प्राप्त करेंगे तो सभी विवादों के लिए उन सभी के दिल में शांतिपूर्ण समाधान की महत्वपूर्ण आवश्यकता की समझ होगी.
‘‘मैं गांधी जी की जन्म शताब्दी पर भारत के राष्ट्रपति श्री गिरि के अपने राष्ट्र के नाम दिए गए संदेश को उद्धृत करके अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा. वह (महात्मा गांधी) सदैव नफ़रत के बीच प्रेम, प्रतिशोध के बीच क्षमा, बुराई के बीच अच्छाई और संकट के बीच दृढ़ता के लिए खड़े रहे.’’







