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Home बुक क्लब नई कहानियां

बेमतलब की बेवफ़ाई: मीनाक्षी विजयवर्गीय की कहानी

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
January 17, 2023
in नई कहानियां, बुक क्लब
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Meenakshi-Vijayvargeeya_Kahani
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प्यार करने से भी ज़्यादा ज़रूरी है, प्यार को बरकरार रखना. भरोसे की उस डोर को टूटने और छूटने न देना, जिससे आप दोनों जुड़े हों. ज़रूरी नहीं प्यार में बेवफ़ाई का मतलब प्रेमी या प्रेमिका को धोखा देना ही हो. भरोसे की डोर को छोड़ देना भी वेबफ़ाई ही है. और वह भी बेमतलब की बेवफ़ाई.

दोस्त की शादी में नाच रहे थे, अचानक से किसी ने मेरा हाथ खींचा. मैंने देखा तो कुछ जाना-पहचाना सा चेहरा दिखा, फिर उसने मुझे और थोड़ा खींचा फिर एक ज़ोरदार थप्पड़ लगा दिया, मैं हक्का-बक्का रह गया, पर चेहरा पूरी तरह से याद आ गया. मेरे दोस्तों का नाचना बंद हो गया.
अचानक एक औरत आई और लड़की का हाथ पकड़कर खींच कर ले जाने लगी. मेरी तरफ़ देखकर बोली,‘‘माफ़ करना बेटा बिल्कुल पागल हो गई है ये.’’
दूसरी तरफ़ से दोस्त की मम्मी आ गई,‘‘बेटा माफ़ करना लड़की को कोई ऊपरी हवा लगती है, पागल है. बिल्कुल भी बुरा मत मानना सब कहा सुना माफ़ करो.’’
नाच गाने का माहौल थोड़ी देर के लिए एकदम सन्नाटे में बदल गया. मैंने मौक़े की नज़ाकत को देखते हुए आंटी से कहा,‘‘मैं ठीक हूं. आई एम फ़ाइन, चिंता मत करें.’’ दोस्त के पास गया, उसने मेरे चेहरे पर प्रश्नचिन्ह देखा. मुझसे बोला,‘‘ना तो पागल है, ना ही कोई ऊपरी हवा वाली चुड़ैल. बस प्यार में धोखा खाई है.’’ मेरा मन अंदर ही अंदर कटता जा रहा था. ना खाने में मन लग रहा था ना शादी की रस्मों में.
थोड़ी देर बाद में मौक़ा पाकर उस लड़की के घर पहुंच गया. उसकी मां दरवाज़े पर ही मिल गईं, मुझे देखते ही हाथ जोड़कर माफ़ी मांगने लगीं. मेरे पीछे-पीछे मेरा दोस्त भी चला आया. उसको देखते आंटी बोली,‘‘मैंने उसे दवाई दे दी है, बस सोती रहेगी. तुम्हारी शादी में ज़रा भी दिक़्क़त नहीं आएगी और जाग भी गई तो मैं उसे कमरे में बंद करके रखूंगी.’’
मेरे मुंह से एक शब्द निकला,‘‘क्यों?’’
आंटी बोलीं,‘‘क्या बताएं बेटा, अंदर आओ फिर बताती हूं.’’
हमें बैठाकर आंटी अंदर जाकर पानी लेने चली गईं. मैंने कहा,‘‘आप मुझे सच बताइए बाक़ी ये सब रहने दीजिए.’’
वह बोली,‘‘माफ़ करना बेटा, अंजली पहले ऐसी नहीं थी. दो साल पहले व शहर से बाहर गई थी, अपने ऑफ़िस के काम से. वहां से आने के बाद उदास गुमसुम रहने लगी. दिनभर कमरे में ही रहने लगी. एक दिन बहुत ज़ोर से चीखने की आवाज़ आई. मोबाइल फेंक दिया. बहुत रोई. पर उस दिन के बाद से बोली नहीं. नौकरी छोड़ दी,अजीब हरक़तें करने लगी. सब इलाज करा लिए. डॉक्टर का कहना था कोई बीमारी भी नहीं है, शायद कोई गहरा सदमा लगा है. अभी पिछले कुछ महीनों से बहुत कुछ पहले जैसी हो गई थी. हम तो ख़ुश थे कि अंजली ठीक होने लगी है, पता नहीं आज इसे क्या हुआ?’’
ये सब सुनकर लगा कि कह दूं कि आज आपकी बेटी बिल्कुल ठीक हो गई है. तीन साल पहले की एक-एक बात याद आती जा रही थी. सोशल साइट्स पर एक चेहरा नज़र आया इतना आकर्षक, साथ में प्यारी नहीं, बहुत प्यारी मुस्कान. बस मन उसकी तरफ़ खिंचता चला गया. फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी कुछ समय बाद तो एक्सेप्ट भी हो गई. मैंने मैसेज किया वेरी ब्यूटीफ़ुल यू आर, ऐंड स्पेशली स्माइल. उधर से केवल ख़ुशनुमा चेहरे का इमोजी आया. मेरे लिए यही काफ़ी था. मेरी वैसे भी नई नौकरी लगी थी, इसलिए ज़्यादा टाइम सोशल मीडिया चला नहीं पाता था, पर जो भी टाइम मिलता मैं उसको मैसेज करता.
एक बार एक पोस्ट पर हम दोनों की कमेंट एक जैसी रही. लगा विचार भी मिलते हैं हमारे. फिर एक दूसरे से बात करते-करते आदत हो गई. एक-दूसरे को पसंद करने लगे, बात यहां तक हो गई कि एक-दूसरे से मिलने का मन बनाने लगे. पर हमें मौक़ा नहीं मिल रहा था. एक बार उसने मुझसे कहा,‘‘मैं आती हूं आपके शहर.’’
मैंने पूछा,‘‘कैसे होगा?’’
‘‘मैं अपने ऑफ़िस के काम से बाहर जाती रहती हूं. इस बार आपके शहर आ जाती हूं.’’
फिर बस क्या था, हम दोनों ने दिन तय किया और तय दिन वह अपने शहर से मेरे शहर की ओर आने के लिए ट्रेन में सवार हो गई. दो बजे के क़रीब मिलने वाले थे हम. उस दिन मैं सुबह जल्दी उठ गया. या यूं कहूं कि रात को सोया ही नहीं. मिलने की बेचैनी इतनी ज़्यादा थी. उसी दिन मेरे ख़ास दोस्त का फ़ोन आया, उसने मुझसे पूछा कि कैसा क्या चल रहा है. मैंने उसे अपनी ख़ुशी बता दी. वह सुनकर चिल्लाया,‘‘पागल हो गया है, सोशल मीडिया वाला प्यार कब सच्चा हो गया? बेवकूफ कहीं का, उस लड़की पर भरोसा कर लिया जो साल छह महीने में ही मिलने को तैयार हो गई. इतने केस हो रहे हैं, धोखाधड़ी के. तुम कहां घोड़े बेच कर सो रहे हो? यह बता कितना पैसा ख़र्च कर दिया अब तक उस पर?’’
मैंने कहा,‘‘एक भी रुपया नहीं.’’
‘‘कोई रिचार्ज वगैरह?’’ उसने फिर पूछा.
‘‘नहीं, कभी भी नहीं.’’
‘‘फिर अच्छा एक ही बार में बड़ा हाथ साफ़ करना चाहती है वो.’’
मैं बहुत दुविधा में पड़ गया. मैं कुछ कह नहीं पा रहा था और वह अपनी बात पर बात कहे जा रहा था. फिर उसने कहा,‘‘अभी के अभी उसको ब्लॉक करो.’’
मैंने बोला,‘‘यह क्या कह रहे हो, सालभर से उसके साथ रिश्ते में हूं.’’
दोस्त बोला,‘‘उसको मैसेज कर हम नहीं मिल सकते.’’
मेरा मन दुविधा में फंस गया. मन तो उससे मिलना चाहता था. पर दोस्त की बातें दिमाग़ में इस तरीक़े से घर करके और पूरी तरह से हावी हो गई थीं, मैंने ठीक वैसा ही किया जैसा दोस्त बोल रहा था. उसे मैसेज किया,‘आज नहीं मिल सकते.’
उसने पूछा,‘कोई परेशानी हो गई है क्या?’
मैंने कहा,‘हां भी नहीं भी. बस आज पॉसिबल नहीं है.’
‘चलो ठीक है,’ कहा उसने.
फिर मैंने अपना फ़ोन बंद कर दिया कि कहीं उसका फ़ोन ना आ जाए. फिर एक-दो दिन बाद उसका फिर मैसेज आया,‘गुड मॉर्निंग’
मैंने पढ़ कर भी रिप्लाई नहीं दिया. उसके मैसेज आते रहे, सुबह शाम, पर मैं इग्नोर करने लगा.
मन तो मानने को तैयार नहीं था यह. पिछले सालभर में कोई भी ऐसी बात नहीं थी, जिसके लिए वह मुझे ग़लत लगती. मुझको ख़ुद से ज़्यादा समझने वाला एक शख्स मिला था, जो मेरी हर बात में, एहसास में शामिल था. पर आज अचानक दिमाग़ उसे अजनबी बनाने के लिए लगा हुआ था. उसके मैसेज आने बंद हो गए.
एक दिन बात करते हुए दोस्त ने पूछताछ की. मैंने कहा,‘‘अब नहीं आते उसके मैसेज.’’
तो बोला,‘‘कोई नया ढूंढ़ लिया होगा, नई आईडी बना ली होगी, तुम नहीं फंसे तो कहीं ओर ट्राई कर रही होगी.’’
समय बीत गया लगभग तीन साल हो गए. अभी एक महीने पहले मेरा रिश्ता परिवार वालों की मर्ज़ी से हुआ.
अंजली की मां की बातें सुनकर मन ही मन पछतावा हो रहा था. कितना बड़ा धोखेबाज़ हूं मैं. उसकी हालत का ज़िम्मेदार हूं. मैंने सिर्फ़ एक मैसेज कर दिया कि नहीं मिल सकते, पर कभी यह भी नहीं सोचा कि अनजान शहर में कैसे दिन बिताया होगा, कैसे वह वापस गई होगी, कैसा-क्या, कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था. क्या कहूं, क्या करूं, मैं ख़ुद से नज़र नहीं मिला पा रहा था. मैं समझ गया था कि वह थप्पड़ मुझे किसलिए मारा गया था. उससे भी ज़्यादा सज़ा का हक़दार था मैं. किसी से दिल लगाना, फिर उसकी भावनाओं से इतना बड़ा खेल गया था. शायद मेरी बातें सुनकर अंजली मुझे माफ़ कर दे, पर मैं ख़ुद को कभी नहीं माफ़ कर पाऊंगा. जाने अनजाने ही सही, बहुत बड़ा धोखा दे दिया मैंने.

Illustration: Pinterest

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