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बौड़म: कहानी एक पागल की (लेखक: मुंशी प्रेमचंद)

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
June 26, 2022
in क्लासिक कहानियां, बुक क्लब
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Munshi-Premchand_Kahani
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क्या दुनिया जिसे बौड़म यानी पागल कहती है, वह सचमुच पागल होता है?

मुझे देवीपुर गए पांच दिन हो चुके थे, पर ऐसा एक दिन भी न होगा कि बौड़म की चर्चा न हुई हो. मेरे पास सुबह से शाम तक गांव के लोग बैठे रहते थे. मुझे अपनी बहुज्ञता को प्रदर्शित करने का न कभी ऐसा अवसर ही मिला था और न प्रलोभन ही. मैं बैठा-बैठा इधर-उधर की गप्पें उड़ाया करता. बड़े लाट ने गांधी बाबा से यह कहा और गांधी बाबा ने यह जवाब दिया. अभी आप लोग क्या देखते हैं, आगे देखिएगा क्या-क्या गुल खिलते हैं. पूरे 50 हजार जवान जेल जाने को तैयार बैठे हुए हैं. गांधी जी ने आज्ञा दी है कि हिन्दुओं में छूत-छात का भेद न रहे, नहीं तो देश को और भी अदिन देखने पड़ेंगे. अस्तु! लोग मेरी बातों को तन्मय हो कर सुनते. उनके मुख फूल की तरह खिल जाते. आत्माभिमान की आभा मुख पर दिखायी देती. गद्‍गद कंठ से कहते, अब तो महात्मा जी ही का भरोसा है. न हुआ बौड़म नहीं आपका गला न छोड़ता. आपको खाना-पीना कठिन हो जाता. कोई उससे ऐसी बातें किया करे तो रात की रात बैठा रहे. मैंने एक दिन पूछा, आखिर यह बौड़म है कौन? कोई पागल है क्या? एक सज्जन ने कहा, ‘महाशय, पागल क्या है, बस बौड़म है. घर में लाखों की सम्पत्ति है, शक्कर की एक मिल सिवान में है, दो कारखाने छपरे में हैं, तीन-तीन, चार-चार सौ के तलबवाले आदमी नौकर हैं, पर इसे देखिए, फटेहाल घूमा करता है. घरवालों ने सिवान भेज दिया था कि जा कर वहां निगरानी करे. दो ही महीने में मैनेजर से लड़ बैठा, उसने यहां लिखा, मेरा इस्तीफा लीजिए. आपका लड़का मजदूरों को सिर चढ़ाए रहता है, वे मन से काम नहीं करते. आखिर घरवालों ने बुला लिया. नौकर-चाकर लूटते खाते हैं उसकी तो जरा भी चिन्ता नहीं, पर जो सामने आम का बाग है उसकी रात-दिन रखवाली किया करता है, क्या मजाल कि कोई एक पत्थर भी फेंक सके.’ एक मियां जी बोले, ‘बाबू जी, घर में तरह-तरह के खाने पकते हैं, मगर इसकी तकदीर में वही रोटी और दाल लिखी है और कुछ नहीं. बाप अच्छे-अच्छे कपड़े खरीदते हैं, लेकिन वह उनकी तरफ निगाह भी नहीं उठाता. बस, वही मोटा कुरता, गाढ़े की तहमत बांधे मारा-मारा फिरता है. आपसे उसकी सिफत कहां तक कहें, बस पूरा बौड़म है.’
ये बातें सुन कर भी इस विचित्र व्यक्ति से मिलने की उत्कंठा हुई. सहसा एक आदमी ने कहा ‘वह देखिए, बौड़म आ रहा है.’ मैने कुतूहल से उसकी ओर देखा. एक 20-21 वर्ष का हृष्ट-पुष्ट युवक था. नंगे सिर, एक गाढ़े का कुरता पहने, गाढ़े का ढीला पाजामा पहने चला आता था! पैरों में जूते थे. पहले मेरी ही ओर आया. मैंने कहा, ‘आइए बैठिए.’ उसने मंडली की ओर अवहेलना की दृष्टि से देखा और बोला, ‘अभी नहीं, फिर आऊंगा.’ यह कहकर चला गया.
जब संध्या हो गयी और सभा विसर्जित हुई तो वह आम के बाग की ओर से धीरे-धीरे आकर मेरे पास बैठ गया और बोला, ‘इन लोगों ने तो मेरी खूब बुराइयां की होंगी. मुझे यह बौड़म का लकब मिला है.’
मैंने सुकचाते हुए कहा, ‘हां, आपकी चर्चा लोग रोज करते थे. मेरी आपसे मिलने की बड़ी इच्छा थी. आपका नाम क्या है?’
बौड़म ने कहा, ‘नाम तो मेरा मुहम्मद खलील है, पर आस-पास के दस-पांच गांवों में मुझे लोग उर्फ के नाम से ज़्यादा जानते हैं. मेरा उर्फ बौड़म है.’
मैं, ‘आखिर लोग आपको बौड़म क्यों कहते हैं?’
खलील,‘उनकी खुशी और क्या कहूं? मैं ज़िंदगी को कुछ और समझता हूं, पर मुझे इजाजत नहीं है कि पांचों वक़्त की नमाज पढ़ सकूं. मेरे वालिद हैं, चचा हैं. दोनों साहब पहर रात से पहर रात तक काम में मसरूफ रहते हैं. रात-दिन हिसाब-किताब, नफा-नुकसान, मंदी-तेजी के सिवाय और कोई जिक्र ही नहीं होता, गोया खुदा के बन्दे न हुए इस दौलत के बन्दे हुए. चचा साहब हैं, वह पहर रात तक शीरे के पीपों के पास खड़े हो कर उन्हें गाड़ी पर लदवाते हैं. वालिद साहब अक्सर अपने हाथों से शक्कर का वज़न करते हैं. दोपहर का खाना शाम को और शाम का खाना आधी रात को खाते हैं. किसी को नमाज पढ़ने की फुर्सत नहीं. मैं कहता हूं, आप लोग इतना सिर-मगजन क्यों करते हैं. बड़े कारबार में सारा काम एतबार पर होता है. मालिक को कुछ न कुछ बल खाना ही पड़ता है. अपने बलबूते पर छोटे कारोबार ही चल सकते हैं. मेरा उसूल किसी को पसन्द नहीं, इसलिए मैं बौड़म हूं.’
मैं, ‘मेरे ख़याल में तो आपका उसूल ठीक है.’
खलील, ‘ऐसा भूल कर भी न कहिएगा, वरना एक ही जगह दो बौड़म हो जाएंगे. लोगों को कारोबार के सिवा न दीन से गरज है न दुनिया से. न मुल्क से, न कौम से. मैं अखबार मंगाता हूं, स्मर्ना फंड में कुछ रुपए भेजना चाहता हूं. खिलाफत-फंड को मदद करना भी अपना फर्ज समझता हूं. सबसे बड़ा सितम है कि खिलाफत का रज़ाकार भी हूं. क्यों साहब, जब कौम पर, मुल्क पर और दीन पर चारों तरफ से दुश्मनों का हमला हो रहा है तो क्या मेरा फर्ज नहीं है कि जाति के फायदे को कौम पर कुर्बान कर दूं. इसीलिए घर और बाहर मुझे बौड़म का लकब दिया गया है.’
मैं, ‘आप तो वह कर रहे हैं जिसकी इस वक़्त कौम को जरूरत है.’
खलील, ‘मुझे खौफ है कि इस चौपट नगरी से आप बदनाम हो कर जाएंगे. जब मेरे हजारों भाई जेल में पड़े हुए हैं, उन्हें गजी का गाढ़ा तक पहनने को मयस्सर नहीं तो मेरी ग़ैरत गवारा नहीं करती कि मैं मीठे लुकमें उड़ाऊं और चिकन के कुर्त्ते पहनूं, जिनकी कलाइयों और मुड्ढों पर सीजनकारी की गयी हो.’
मैं, ‘आप यह बहुत ही मुनासिब कहते हैं. अफसोस है कि और लोग आपका-सा त्याग करने के काबिल नहीं.’
खलील,‘मैं इसे त्याग नहीं समझता, न दुनिया को दिखाने के लिए यह भेष बना के घूमता हूं. मेरा जी ही लज्जत और शौक से फिर गया है. थोड़े दिन होते हैं वालिद ने मुझे सिवान के मिल में निगरानी के लिए भेजा, मैंने वहां जा कर देखा तो इंजीनियर साहब के खानसामे, बैरे, मेहतर, धोबी, माली, चौकीदार, सभी मजदूरों की जेल में लिखे हुए थे. काम साहब का करते थे, मजदूरी कारखाने से पाते थे. साहब बहादुर खुद तो बेउसूल हैं, पर मजदूरों पर इतनी सख्ती थी कि अगर पांच मिनट की देर हो जाए तो उनकी आधे दिन की मजदूरी कट जाती थी. मैंने साहब की मिजाजपुरसी करनी चाही. मजदूरों के साथ रियायत करनी शुरू की. फिर क्या था? साहब बिगड़ गए, इस्तीफे की धमकी दी. घरवालों को उनके सब हालात मालूम हैं. पल्ले दरजे का हरामखोर आदमी है. लेकिन उसकी धमकी पाते ही सबके होश उड़ गए. मैं तार से वापस बुला लिया गया और घर पर मेरी खूब ले-दे हुई. पहले बौड़म होने में कुछ कोर-कसर थी, वह पूरी हो गयी. न जाने साहब से लोग क्यों इतना डरते हैं?’
मैं, ‘आपने वही किया जो इस हालत में मैं भी करता बल्कि मैं तो पहले साहब पर ग़बन का मुकदमा दायर करता, बदमाशों से पिटवाता, तब बात करता. ऐसे हरामखोरों की यही सजाएं हैं.’
खलील, ‘फिर तो एक और, दो हो गए. अफसोस यही है कि आपका यहां कयाम न रहेगा. मेरा जी चाहता है, कि चंद रोज आपके साथ रहूं. मुद्दत के बाद आप ऐसे आदमी मिले हैं जिससे मैं अपने दिल की बातें कह सकता हूं. इन गंवारों से मैं बोलता भी नहीं. मेरे चाचा साहब को जवानी में एक चमारिन से ताल्लुक हो गया था. उससे दो बच्चे, एक लड़का और एक लड़की पैदा हुए. चमारिन लड़की को गोद में छोड़कर मर गयी. तब से इन दोनों बच्चों की मेरे यहां वही हालत थी जो यतीमों की होती है. कोई बात न पूछता था. उनको खाने-पहनने को भी न मिलता. बेचारे नौकरों के साथ खाते और बाहर झोपड़े में पड़े रहते थे. जनाब, मुझसे यह न देखा गया. मैंने उन्हें अपने दस्तरखान पर खिलाया और अब भी खिलाता हूं. घर में कुहराम मच गया. जिसे देखिए मुझ पर त्योरियां बदल रहा है, मगर मैंने परवाह न की. आखिर है वह भी तो हमारा ही खून. इसलिए मैं बौड़म कहलाता हूं.’
मैं, ‘जो लोग आपको बौड़म कहते हैं, वे खुद बौड़म हैं.’
खलील, ‘जनाब, इनके साथ रहना अजीब है. शाह काबुल ने कुर्बानी की मुमानियत कर दी है. हिंदुस्तान के उलमा ने भी यही फतवा दिया, पर यहां खास मेरे घर कुर्बानी हुई. मैंने हरचंद बावैला मचाया, पर मेरी कौन सुनता है? उसका कफारा (प्रायश्चित) मैंने यह अदा किया कि अपनी सवारी का घोड़ा बेच कर 300 फकीरों को खाना खिलाया और तब से कसाइयों को गाएं लिए जाते देखता हूं तो कीमत दे कर खरीद लेता हूं. इस वक़्त तक दस गायों की जान बचा चुका हूं. वे सब यहां हिंदुओं के घरों में हैं, पर मजा यह है कि जिन्हें मैंने गाएं दी हैं, वे भी मुझे बौड़म कहते हैं. मैं भी इस नाम का इतना आदी हो गया हूं कि अब मुझे इससे मुहब्बत हो गयी है.’
मैं, ‘आप ऐसे बौड़म काश मुल्क में और ज़्यादा होते.’
खलील, ‘लीजिए आपने भी बनाना शुरू कर दिया. यह देखिए आम का बाग है. मैं उसकी रखवाली करता हूं. लोग कहते हैं जहां हजारों का नुकसान हो रहा है वहां तो देखभाल करता नहीं, जरा-सी बगिया की रखवाली में इतना मुस्तैद. जनाब, यहां लड़कों का यह हाल है कि एक आम तो खाते हैं और पचीस आम गिराते हैं. कितने ही पेड़ चोट खा जाते हैं और फिर किसी काम के नहीं रहते. मैं चाहता हूं कि आम पक जाएं, टपकने लगें तब जिसका जी चाहे चुन ले जाए. कच्चे आम खराब करने से क्या फायदा? यह भी मेरे बौड़मपन में दाखिल है.’
ये बातें हो ही रही थीं कि सहसा तीन-चार आदमी एक बनिए को पकड़े, घसीटते हुए आते दिखायी दिए. पूछा तो उन चारों आदमियों में से एक ने, जो सूरत से मौलवी मालूम होते थे, कहा, ‘यह बड़ा बेईमान है, इसके बांट कम हैं. अभी इसके यहां से सेर भर घी ले गया हूं. घर पर तौलता हूं तो आध पाव गायब. अब जो लौटाने आया हूं तो कहता है मैंने तो पूरा तौला था. पूछो अगर तूने पूरा तौला था तो क्या मैं रास्ते में खा गया. अब ले चलता हूं थाने पर, वहीं इसकी मरम्मत होगी.’
दूसरे महाशय, जो वहां डाकखाने के मुंशी थे बोले इसकी हमेशा की यही आदत है, कभी पूरा नहीं तौलता. आज ही दो आने की शक्कर मंगवायी. लड़का घर ले कर गया तो मुश्किल से एक आने की थी. लौटाने आया तो आंखें दिखाने लगा. इसके बांटों की आज जांच करानी चाहिए.
तीसरा आदमी अहीर था. अपने सिर पर से खली की गठरी उतार कर बोला, ‘साहब, यह 11 रु. की खली है. 6 सेर के भाव से दी थी. घर पर तौला तो 2 सेर हुई. लाया कि लौटा दूंगा, पर यह लेता ही नहीं!’ अब इसका निबटारा थाने ही में होगा. इस पर कई आदमियों ने कहा यह सचमुच बेईमान आदमी है.
बनिए ने कहा, ‘अगर मेरे बांट रत्ती भर कम निकलें तो हजार रुपए डांड़ दूं.’
मौलवी साहब ने कहा, ‘तो कमबख्त, टांकी मारता होगा.’
मुंशी जी बोले, ‘टांकी मार देता है, यही बात है.’
अहीर ने कहा, ‘दोहरे बांट रखे हैं. दिखाने के और, बेचने के और. इसके घर की पुलिस तलाशी ले.’
बनिए ने फिर प्रतिवाद किया, पकड़नेवालों ने फिर आक्रमण किया, इसी तरह कोई आध घंटा तक तकरार होती रही. मेरी समझ में न आता था कि क्या करूं. बनिए को छुड़ाने के लिए जोर दूं या जाने दूं. बनिए से सभी जले हुए मालूम होते थे. खलील को देखा तो गायब? न जाने कब उठकर चला गया? बनिया किसी तरह न दबता था, यहां तक कि थाने जाने से भी न डरता था.
ये लोग थाने जाना ही चाहते थे कि बौड़म सामने आता दिखायी दिया. उसके एक हाथ में एक टोकरा था, दूसरे हाथ में एक कटोरा और पीछे एक 7-8 बरस का लड़का. उसने आते ही मौलवी साहब से कहा, ‘यह कटोरा आप ही का है काजी जी?’
मौलवी (चौंककर), ‘हां है तो, फिर? तुम मेरे घर से इसे क्यों लाए?’
बौड़म, ‘इसलिए कि कटोरे में वही आधा पाव घी है जिसके विषय में आप कहते हैं कि बनिए ने कम तौला. घी वही है. वजन वही है. बेईमानी गरीब बनिए की नहीं है, बल्कि काजी हाजी मौलवी जहूर अहमद की.’
मौलवी, ‘तुम अपना बौड़मपना यहां न दिखाना नहीं तो मैं किसी से डरने वाला नहीं हूं. तुम लखपती होगे तो अपने घर के होगे. तुम्हें क्या मजाल था मेरे घर में जाने का!’
बौड़म, ‘वही जो आपको बनिए को थाने में ले जाने का है. अब यह घी भी थाने जाएगा.’
मौलवी (सिटपिटा कर), ‘सबके घर में थोड़ी-बहुत चीज रखी ही रहती है. कसम कुरान शरीफ की, मैं अभी तुम्हारे वालिद के पास जाता हूं, आज तक गांव भर में किसी ने मुझ पर ऐसा इलजाम नहीं लगाया था.’
बनिया, ‘मौलवी साहब, आप जाते कहां हैं? चलिए हमारा-आपका फैसला थाने में होगा. मैं एक न मानूंगा. कहलाने को मौलवी, दीनदार, ऐसे बनते हैं कि देवता ही हैं. पर घर में चीज रख कर दूसरों को बेईमान बनाते हैं. यह लम्बी दाढ़ी धोखा देने के लिए बढ़ायी है?’
मगर मौलवी साहब न रुके. बनिए को छोड़ कर खलील के बाप के पास चले गए, जो इस वक़्त शर्म से बचने का सहज बहाना था.
तब खलील ने अहीर से कहा, ‘क्यों बे, तू भी थाने जा रहा है? चल मैं भी चलता हूं. तेरे घर से यह सेर भर खली लेता आया हूं.’
अहीर ने मौलवी साहब की दुर्गति देखी तो चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं, बोला, ‘भैया जवानी की कसम है, मुझे मौलवी साहब ने सिखा दिया था.’
खलील, ‘दूसरे के सिखाने से तुम किसी के घर में आग लगा दोगे? खुद तो बच्चा दूध में आधा पानी मिला-मिला कर बेचते हो, मगर आज तुमको इतनी मुटमरदी सवार हो गयी कि एक भले आदमी को तबाह करने पर आमादा हो गए. खली उठा कर घर में रख ली, उस पर बनिए से कहते हो कि कम तौला.’
बनिया, ‘भैया, मेरी लाख रुपए की इज्जत बिगड़ गयी. मैं थाने में रपट किए बिना न मानूंगा.’
अहीर, ‘साहू जी, अबकी माफ करो, नहीं तो कहीं का न रहूंगा.’
तब खलील ने मुंशी जी से कहा, ‘कहिए जनाब, आपकी कलई खोलूं या चुपके से घर की राह लीजिएगा.’
मुंशी, ‘तुम बेचारे मेरी कलई क्या खोलोगे. मुझे भी अहीर समझ लिया है कि तुम्हारी भपकियों में आऊंगा?’
खलील (लड़के से), ‘क्यों बेटा, तुम शक्कर ले कर सीधे घर चले गए थे?’
लड़का (मुंशी जी को सशंक नेत्रों से देख कर), ‘बताऊं!’
मुंशी, ‘लड़कों को जैसा सिखा दोगे वैसा कहेंगे.’
खलील, ‘बेटा, अभी तुमने मुझसे जो कहा था, वही फिर कह दो.’
लड़का, ‘दादा मारेंगे.’
मुंशी, ‘क्या तूने रास्ते में शक्कर फांक ली थी.’
लड़का, ‘रोने लगा.’
खलील, ‘जी हां, इसने मुझसे खुद कहा, पर आपने उससे तो पूछा नहीं बनिए के सिर हो गए. यही शराफत है.’
मुंशी, ‘मुझे क्या मालूम था कि उसने रास्ते में यह शरारत की?’
खलील, ‘तो ऐसे कमजोर सबूत पर आप थाने क्योंकर चले थे? आप गंवारों को मनीआर्डर के रुपए देते हैं तो उस रुपए पर दो आने अपनी दस्तूरी काट लेते हैं. टके के पोस्टकार्ड आने में बेचते हैं, जब कहिए तब साबित कर दूं. उसे क्या आप बेईमानी नहीं समझते हैं?’
मुंशी जी ने बौड़म के मुंह लगना मुनासिब न समझा. लड़के को मारते हुए घर ले गए. बनिए ने बौड़म को खूब आशीर्वाद दिया. दर्शक लोग भी धीरे-धीरे चले गए. तब मैंने खलील से कहा आपने इस बनिए की जान बचा ली नहीं तो बेचारा बेगुनाह पुलिस के पंजे में फंस जाता.
खलील, ‘आप जानते हैं कि मुझे क्या सिला (इनाम) मिलेगा. थानेदार मेरे दुश्मन हो जाएंगे. कहेंगे यह मेरे शिकारों को भगा दिया करता है. वालिद साहब पुलिस से थर-थर कांपते हैं. मुझे हाथों लेंगे कि तू दूसरों के बीच में क्यों दखल देता है? यहां यह भी बौड़मपन में दाखिल है. एक बनिए के पीछे मुझे भले आदमियों की कलई खोलनी मुनासिब न थी. ऐसी हरकत बौड़म लोग किया करते हैं.’
मैंने श्रद्धापूर्ण शब्दों में कहा, ‘अब मैं आपको इसी नाम से पुकारूंगा. आज मुझे मालूम हुआ कि बौड़म देवताओं को कहा जाता है! जो स्वार्थ पर आत्मा की भेंट कर देता है वह चतुर है, बुद्धिमान है. जो आत्मा के सामने, सच्चे सिद्धांत के सामने, सत्य के सामने, स्वार्थ की, निंदा की परवाह नहीं करता वह बौड़म है, निर्बुद्धि है.’

Illustration: Pinterest

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