राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा मुंबई के पु. ल. देशपांडे महाराष्ट्र कला अकादमी में आयोजित पांच दिवसीय किताब उत्सव का अंतिम दिन साहित्य, संगीत और रंगमंच की विविध प्रस्तुतियों से सराबोर रहा.
कार्यक्रम की शुरुआत काव्य-पाठ से हुई जिसमें विजय कुमार, अनूप सेठी, विनोद दास, राकेश शर्मा, संजय भिसे, हृदयेश मयंक और हरि मृदुल ने अपनी कविताएं प्रस्तुत कीं. सत्र का संचालन रमन मिश्र ने किया.
दूसरे सत्र में ‘कहानी-चर्चा’ में ममता सिंह ने धीरेन्द्र अस्थाना, मनोज रूपड़ा और मिथिलेश प्रियदर्शी से उनकी रचना-प्रक्रिया, लेखकीय दृष्टि और समकालीन कथा साहित्य पर संवाद किया. इस दौरान धीरेन्द्र अस्थाना ने कहा, मैं अपनी पसंद के लेखकों को खोज-खोजकर पढ़ता हूं. उन्होंने लेखन को सतत सीखने की प्रक्रिया बताया. मनोज रूपड़ा ने कहा कि कहानीकार का सबसे बड़ा दायित्व अपने समय और समाज के यथार्थ को ईमानदारी से दर्ज करना है. मिथिलेश प्रियदर्शी ने कहा कि आज की कहानियों को केवल तकनीक नहीं, बल्कि संवेदना और मानवीय सरोकारों से भी जुड़ा होना चाहिए.
अगला सत्र ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’ भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लेखक विनोद कुमार शुक्ल को समर्पित रहा, जिसमें उनकी कविताओं का पाठ टी.जे. भानू, रोहित उपाध्याय और भूमिका दुबे ने किया.
इसके बाद मधु कांकरिया के यात्रा-संस्मरण ‘मेरी ढाका डायरी’ पर आधारित सत्र हुआ, जिसमें मधुबाला शुक्ल और गंगाशरण सिंह ने लेखक से संवाद किया. सत्र में ढाका में बढ़ते धार्मिक प्रभाव और सामाजिक बदलावों पर चर्चा हुई.
अगले सत्र में पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का लोकार्पण हुआ. जिसके बाद यूनुस खान से संवाद करते हुए पंकज राग ने बताया कि हिन्दी सिनेमा में गीतों की परम्परा की जड़ें पारसी थिएटर और कोठों के संगीत में मिलती हैं और किस तरह हिंदुस्तानी फ़िल्म संगीत ने समय के साथ स्वयं को रूपांतरित किया.

इसके बाद पतरस बुख़ारी के हास्य-व्यंग्य की पाठ प्रस्तुति तारिक हमीद ने दी. फिर बहुभाषी काव्य-पाठ हुआ, जिसमें नरेश सक्सेना, प्रबोध पारिख, हेमंत दिवटे, अंजली पुरोहित, कमल गोरा, बीना सरकार और बोधिसत्व शामिल रहे. सत्र के सूत्रधार अश्विनी कुमार रहे. दिन का समापन कुर्रतुल ऐन हैदर के उपन्यास ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ की नाट्य प्रस्तुति के साथ हुआ, जिसे रशिका अगाशे और उनकी टीम ने मंचित किया.







