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Home सुर्ख़ियों में

मुम्बई में 10 फ़रवरी तक चलेगा राजकमल प्रकाशन समूह का किताब उत्सव

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
February 7, 2026
in सुर्ख़ियों में, ख़बरें
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मुम्बई में 10 फ़रवरी तक चलेगा राजकमल प्रकाशन समूह का किताब उत्सव
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मुंबई के प्रभादेवी स्थित पु. ल. देशपांडे महाराष्ट्र कला अकादमी में राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा आयोजित पांच दिवसीय किताब उत्सव का उद्घाटन शुक्रवार को हुआ. यह आयोजन 10 फ़रवरी 2026 तक चलेगा.

उद्घाटन सत्र में गुलज़ार, जावेद अख़्तर, पुरुषोत्तम अग्रवाल और सुनील कुमार लवटे से अतुल तिवारी ने ‘भारत : निरन्तर विचार परम्पराएँ’ विषय पर संवाद किया. इस दौरान गुलज़ार ने परंपरा पर बात करते हुए कहा, अगर परंपरा की बात करूँ, तो असली परंपरा कहानी और कविता की है, जो हमें दादी–नानी, माँ–पिता और घर–परिवार से किस्सों और लोरियों के रूप में मिली है. इस अवसर पर उन्होंने अपनी कुछ नज़्में भी सुनाईं. जावेद अख़्तर ने कहा कि कई बार संस्कृति को धर्म का हिस्सा मान लिया जाता है, जबकि वास्तव में धर्म संस्कृति का एक छोटा सा अंश है. संस्कृति कहीं अधिक व्यापक, निर्णायक और समावेशी होती है.

सुनील कुमार लवटे ने कहा कि वे स्वयं को ऐसी परंपरा से जोड़ते हैं जो मुख्यधारा की कथित परंपरा से अलग है—जिसकी जड़ें उन लोगों और विचारों में हैं जो परंपरा की जड़ता से लगातार संघर्ष करते रहे हैं और उसे बदलने का प्रयास करते रहे हैं, जहाँ सब कुछ केवल जाति या धर्म से निर्धारित नहीं होता. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कबीर, रहीम, जायसी और नज़ीर के हवाले से अपनी बात रखते हुए कहा कि हम इन्हीं की परंपरा से आते हैं. परंपरा हमें जीवन की तरह मिलती है. यदि हमें सही परंपरा तक पहुँचना है तो हमें उन देशी भाषाओं और बोलियों के पास जाना होगा जिनमें जन-साधारण के श्रम और संस्कृति से निर्मित ज्ञान समाहित है. भक्ति कविता में लोक और शास्त्र के बीच का संवाद और प्रतिरोध स्पष्ट रूप से दिखाई देता है.

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इससे पहले सत्र का संचालन करते हुए अतुल तिवारी ने कहा कि यह एक विशेष अवसर है, जहाँ ऐसे रचनाकार एक मंच पर हैं जिनका काम अतुलनीय है और जो परंपरा को अपने-अपने ढंग से न केवल परिभाषित करते हैं, बल्कि उसे नया अर्थ भी देते हैं.

अगले सत्र में जावेद अख़्तर की किताब ‘सीपियाँ के संदर्भ में मशहूर दास्तानगो हिमांशु बाजपेयी ने उनसे संवाद किया. इस दौरान जावेद अख़्तर ने कबीर और रहीम के अनेक दोहों की गहरी व्याख्या करते हुए कहा कि शब्द और कथन की अपनी एक तहज़ीब होती है. उनके सही अर्थ तक पहुँचने के लिए न केवल उपयुक्त शब्दों की समझ आवश्यक है, बल्कि उन सांस्कृतिक अवधारणाओं से संवाद भी ज़रूरी है जो अर्थ की निरंतरता को आगे बढ़ाती हैं.

इसके बाद प्रख्यात मराठी लेखक मलिका अमरशेख की आत्मकथा के हिन्दी अनुवाद ‘मैं बर्बाद होना चाहती हूँ’ का लोकार्पण हुआ. इस अवसर पर आत्मकथा की हिन्दी अनुवादक सुनीता डागा और लेखक व संस्कृति कर्मी विभा रानी मंच पर उपस्थित रहीं. कार्यक्रम में मल्लिका अमरशेख का एक ऑडियो संदेश भी प्रस्तुत किया गया.

पहले दिन के कार्यक्रम का समापन ‘काव्यराग’ की सांगीतिक प्रस्तुति से हुआ, जिसमें चिन्मयी त्रिपाठी और जोएल मुखर्जी ने चर्चित हिन्दी कविताओं का संगीतमय और भावपूर्ण गायन कर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया.

अपने स्वागत वक्तव्य में राजकमल प्रकाशन समूह के अध्यक्ष अशोक महेश्वरी ने कहा कि किताब उत्सव शृंखला में यह 14वाँ और मुम्बई में दूसरा आयोजन है. यहाँ के साहित्यप्रेमियों ने जिस उत्साह से इसका स्वागत किया है, उसने हमारा हौसला और बढ़ाया है. उन्होंने आगे कहा कि हिन्दी में व्यापक स्तर पर साहित्य रचा जा रहा है और नए-नए विषयों व विमर्शों पर उत्कृष्ट रचनाएँ सामने आ रही हैं. उन्होंने सिनेमा जगत से अनुरोध किया कि वे इन कहानियों को बड़े पर्दे के माध्यम से व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुँचाएँ, ताकि हिन्दी लेखन को भी नया विस्तार मिल सके.

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