राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा आयोजित पांचच दिवसीय किताब उत्सव के दूसरे दिन नौ सत्रों में कार्यक्रम आयोजित हुआ. इस दौरान गिरीश कारनाड की आत्मकथा के हिन्दी संस्करण ‘खेल-खेल में बीता जीवन’, दुष्यंत के नए उपन्यास ‘दालचीनी’ और असग़र वजाहत के नए उपन्यास ‘बानुसनामा’ का लोकार्पण हुआ. वहीं, पुरुषोत्तम अग्रवाल की नई किताब ‘मजबूती का नाम महात्मा गांधी’, सीमा कपूर की आत्मकथा ‘यूं गुज़री है अब तलक’ और पद्मजा की डायरी ‘मैं कोई और’ पर चर्चा हुई. साथ ही नरेन्द्र दाभोलकर के लेखन और जीवन और लेखन की विधाओं के सन्दर्भ में संवाद सत्र आयोजित हुए. कल के सत्रों की हाइलाट्स और 8 फ़रवरी के सत्रों की जानकारी के लिए पढ़ते रहें…
कार्यक्रम की शुरुआत दुष्यंत के उपन्यास दालचीनी के लोकार्पण के साथ हुई. इस दौरान रहमान अब्बास ने उपन्यास की विषयवस्तु पर अपनी बातें रखीं और इला जोशी ने उपन्यास के संदर्भ में लेखक से संवाद किया. पहले सत्र का शीर्षक ‘महानगर में प्रेम और नई स्त्री’ था. इला जोशी के सवाल ‘नई स्त्री कौन है?’ के जवाब में दुष्यंत ने कहा कि नई स्त्री वह है जो अपने फैसले खुद लेती है. चर्चा के दौरान प्रेम के अर्थ और उसके महत्व पर भी विस्तार से बात हुई, जिसमें दुष्यंत ने प्रेम को ‘नित नूतन और प्राचीन’ बताया. वहीं रहमान अब्बास ने इंसान की सबसे बड़ी लालसा मोहब्बत को माना, उनके अनुसार मोहब्बत एक ऐसी चीज़ है, जिसे पूरी तरह समझ पाना मुमकिन नहीं है.
दूसरे सत्र में ‘मजबूती का नाम महात्मा गांधी’ में पुस्तक पर केंद्रित संवाद हुआ, जिसमें सुशांत सिंह ने लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल से इस रोचक शीर्षक के पीछे की सोच पर सवाल किया. उत्तर में पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि महात्मा गांधी को मजबूरी का नहीं, बल्कि दृढ़ता का प्रतीक माना जाना चाहिए और इसी भाव से इस किताब का शीर्षक रखा गया है.
अगले सत्र में गिरीश कारनाड की आत्मकथा ‘खेल-खेल में बीता जीवन’ पर रामगोपाल बजाज और उषारानी राव के बीच संवाद हुआ. इस अवसर पर दोनों वक्ताओं ने गिरीश कारनाड के जीवन से जुड़े कई रोचक प्रसंग साझा किए. सत्र का समापन रामगोपाल बजाज द्वारा आत्मकथा के एक अंश-पाठ के साथ हुआ.
इसके बाद सीमा कपूर की आत्मकथा ‘यूं गुज़री है अब तलक’ पर रघुबीर यादव, रूमी ज़ाफ़री और स्वयं लेखक के साथ अजय ब्रह्मात्मज ने संवाद किया.
पाँचवें सत्र में गौरव सोलंकी और हिमांशु वाजपेयी के बीच ‘शहर-यारियाँ: कुछ क़िस्से, कुछ यादें’ विषय पर संवाद हुआ. बातचीत के दौरान हिमांशु वाजपेयी ने कहा कि शहर से प्यार करना अपने भीतर की संवेदनाओं को बचाए रखने जैसा है. वहीं गौरव सोलंकी ने कहा, किसी शहर से आधा रिश्ता हमारे मन में होता है और आधा शहर में.
8 फ़रवरी के सत्रों में…
किताब उत्सव में 8 फ़रवरी रविवार को कार्यक्रम की शुरुआत चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फ़िल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ की पटकथा के लोकार्पण और इस पर बातचीत के साथ होगी. इसके बाद छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन पर केंद्रित विश्वास पाटील की उपन्यास शृंखला ‘महासम्राट शिवाजी’ के दूसरे खंड का लोकार्पण होगा. अगले सत्र में ‘दलित लेखन : नये दौर के नये सवाल’ विषय पर लक्ष्मण गायकवाड़, शरण कुमार लिम्बाले, सुलभा कोरे और पराग पावन से अविनाश दास की बातचीत होगी. अगला सत्र राजकमल प्रकाशन द्वारा मनाए जा रहे ‘हिन्दी उपन्यास का स्त्री-वर्ष’ पर केंद्रित होगा. इसके बाद ‘जो मैं पढ़ता हूँ’ विषय पर इला अरुण, कृष्ण कुमार रैना और धीरेंद्र अस्थाना से ममता सिंह की बातचीत होगी. अगले सत्र में ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’ पर दास्तानगोई बैठक होगी जिसमें राणा प्रताप सेंगर और आशीष रावत अपनी प्रस्तुति देंगे. दिन का समापन धूमिल की बहुचर्चित कविता ‘पटकथा’ की एकल प्रस्तुति के साथ होगा जिसके निर्देशक आर.एस. विकल हैं और प्रस्तुति राजेन्द्र गुप्ता देंगे.
ज्ञात हो कि यह किताब उत्सव पु. ल. देशपांडे महाराष्ट्र कला अकादमी में 10 फ़रवरी तक चलेगा.
इसके बाद नरेंद्र दाभोलकर के लेखन और जीवन के संदर्भ में ‘अंधविश्वास से मुक्ति: विचार और व्यवहार’ विषय पर सुनील कुमार लवटे और मुक्ता दाभोलकर से अविनाश दास ने संवाद किया. चर्चा के दौरान वक्ताओं ने कहा कि पाखंड दुनियाभर में बढ़ता जा रहा है और यह प्रगतिशील तथा विवेकशील समाज के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है.
सातवें सत्र में पद्मजा की डायरी ‘मैं कोई और’ पर रोहित उपाध्याय ने उनसे बातचीत की. इस दौरान पद्मजा के बचपन की स्मृतियों से कई किस्सों को दर्शकों के सामने रखा. इसके साथ ही स्मृति खोने और बीस सालों से अधिक की उम्र में फिर से नई शुरुआत करने और हर चीज़ को फिर से सीखने के अनुभवों को साझा किया.
अगले सत्र में ‘परस्पर: विधाओं के आर-पार’ विषय पर मकरंद साठे और असग़र वजाहत के साथ अविनाश मिश्र ने संवाद किया. इस अवसर पर असग़र वजाहत के नए उपन्यास ‘बानुसनामा’ का लोकार्पण हुआ. सत्र में साहित्य और रंगमंच की आपसी यात्रा, भाषा, शिल्प और रचनात्मक प्रक्रिया पर गहन चर्चा हुई.
इसके बाद ‘कथा-पटकथा: कितने दूर कितने पास’ विषय पर समकालीन कथाकारों के बीच संवाद हुआ. इस सत्र में अनिमेष मुखर्जी, मनोज कुमार पांडेय, रामकुमार सिंह, राहुल श्रीवास्तव, विमलचंद्र पांडेय, सत्य व्यास और शिवेन्द्र बतौर वक्ता उपस्थित रहे. चर्चा के दौरान वक्ताओं ने कहा कि कहानी और पटकथा की दुनिया मूल रूप से अलग है. कहानी पढ़े जाने के लिए लिखी जाती है, जबकि फिल्म देखने के लिए. इसी अंतर से दोनों की रचनात्मक ज़रूरतों और कहानी कहने की संरचना में फ़र्क़ पैदा होता है.
अंतिम सत्र ‘पाठसुख’ में दिनेश शाकुल हरिशंकर परसाई के व्यंग्य और विजय देव नारायण साही की कविताओं का पाठ किया. वहीं हिमानी शिवपुरी ने नेहा नरुका के कविता संग्रह ‘फटी हथेलियाँ’ से एक लंबी कविता ‘तीन लड़कियाँ’ का पाठ किया. साथ ही उन्होंने पलायन पर आधारित अपनी कविता ‘पहाड़’ और छोटे शहरों के जन-जीवन पर केंद्रित कविता ‘छोटा शहर’ पढ़ी.







