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मुग़ालते में न रहिए, डायबिटीज़ वाले भी खा सकते हैं आम

डॉक्टर दीपक आचार्य by डॉक्टर दीपक आचार्य
May 19, 2022
in डायट, हेल्थ
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मुग़ालते में न रहिए, डायबिटीज़ वाले भी खा सकते हैं आम
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हर ख़ास-ओ-आम के पसंदीदा आमों का मौसम है. ऐसे में यदि हम एक कहावत को थोड़ा बदल कर आपसे ये कहें कि आम के आम और गुठलियों के ही नहीं, बल्कि छिलकों के भी दाम… तो आप क्या समझेंगे? अजी, कच्चे और पके आमों का यही ख़ास गणित तो हमको और आपको समझा रहे हैं डॉक्टर दीपक आचार्य.

 

कच्चे और पके आम का ख़ास गणित है, जिसे समझना बहुत ज़रूरी है!
तो सबसे पहले तो यह जान लें कि कच्चे हरे आम के छिलके फेंकना नहीं है. कच्चे आमों को साफ़ धो लीजिए, सूखे कपड़े से पोछ लीजिए, छिलके उतारकर इसके पल्प का आमचूर, अचार, मुरब्बा बगैरह बना सकते हैं, रही बात इसके छिलकों की तो इसके छिलकों को फेंकने की ग़लती ना कीजिएगा. छिलकों को धूप में 3-4 दिन उलट-पलटकर सुखा दीजिए और इन्हें ग्राइंड करके पाउडर बना लें. इस पाउडर की आधी चम्मच मात्रा हर दिन एक गिलास पानी के साथ पीना सेहत के हिसाब से बेहतरीन है.

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इन छिलकों में छुपी है सेहत
कच्चे आम के छिलकों में एंटीऑक्सिडेंट कंपाउंड मैंजीफेरीन पाया जाता है, छिलकों का 70-80% हिस्सा फ़ाइबर्स होता है और तो और इनमें पॉलीफ़िनॉल्स, कैरेटेनॉइड्स, विटामिन C, विटामिन E और कई अन्य महत्वपूर्ण प्लांट कंपाउंड्स पाए जाते हैं. हार्ट की समस्याओं के लिए इन नैचुरल कंपाउंड्स की ज़रूरतों को लेकर ढेरभर रिसर्च पेपर्स पढ़े जा सकते हैं. आपके बालों, स्किन और आंखों के लिए भी ये कंपाउंड्स बड़े काम के हैं. इसके अलावा कच्चे आम के छिलकों में ट्रायटर्पिन और ट्रायटर्पिनॉएड्स पाए जाते हैं जो कि एंटीकैंसर और एंटीडायबेटिक कंपाउंड्स हैं. इतना सब कुछ है इन छिलकों में फिर भी इन्हें डस्टबिन (दुष्टबीन!) का रास्ता दिखा देना मूर्खता है, फेंकिए मत इन्हें, कंज़्यूम कीजिए बाबा.

अब बात करते हैं पके आमों की
आपको पता है ना आपके दोस्त दीपक आचार्य तो स्वघोषित आम राजा हैं!
राज गद्दी पर बैठकर टोकरीभर देसी आम पेट में उड़ेल देते हैं राजा बाबू… ख़ैर…मुझे यक़ीन है कि आपके परिवार में कोई डायबेटिक है तो आम के नाम से ही दहशत मचे रहती होगी, क्यों? सही कहा ना? क्योंकि किन्ही डॉक्टर साहब ने बोल रखा है कि आम खाने से शुगर लेवल बढ़ जाएगा, आम डायबिटीज़ के रोगियों के लिए ज़हर है, ऐसा ही कुछ बोला गया ना? अरे दादा, अति करोगे तो सब ज़हर है…आम में बेशक़ नैचुरल शुगर होती है और ये नैचुरल शुगर बाक़ी अन्य फलों की तुलना में ज़्यादा ही होती है. क़रीब 150 ग्राम आम में 25 ग्राम तक नैचुरल शुगर. तो क्या ये किसी डायबेटिक के शुगर लेवल को बढ़ा देगी? कोई रिसर्च नहीं है, कोई प्रमाण नहीं है तो काहे इतना हो हल्ला? टेंटुआ मसक देने का मन करता है…! अरे साहब, 150 ग्राम पके आम से दिनभर का 70% तक विटामिन C मिल जाता है और रिसर्च बताती हैं कि विटामिन C और केरेटिनोइड्स (जो पके आम में ख़ूब होते हैं) डायबिटीज़ होने की संभावनाओं को कम कर देते हैं. तो कुलमिलाकर, कवि कहना चाहते हैं कि 150 ग्राम आम का पल्प बगैर चिंता के हर दिन खाया जा सकता है, 150 ग्राम पल्प यानी मध्यम आकार के 4 आम (गुठली और छिलके बगैर). शुगर- वुगर है, तो रहने दो, आप आम खाएं, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, बिंदास दबाएं आम.

कुछ और बातें दिमाग़ में डाल लें
ये बातें भी आम ख़रीदने से लेकर खाने तक आपके काम आएंगी.
• आम खरीदते समय सूंघकर चेक ना करें, केमिकल्स हो सकते हैं
• आम को इस्तमाल करने से पहले 20 मिनट तक पानी में डालकर रखें, ऐसिडिटी नहीं करेगा और केमिकल्स वगैरह इसकी स्किन पर हों तो निकल जाएंगे.
• पके आम का छिलका नहीं चबाना है वरना पेट दर्द कर सकता है.
• आम खाने के बाद आधा कप कच्चा या पका दूध पी लीजिएगा, जल्द पचेगा और गर्म नहीं करेगा.
• डायबिटीज़ वालों को आमरस, जूस या शेक नहीं पीना है, इसमें शक्कर डाली जाती है, जूस वैसे भी नहीं लेना चाहिए.
• डायबिटीज़ वालों को आम एक दिन में उतना ही खाना है जितना बताया, इतने आम खाकर शुगर शूट नहीं करेगी.
• डायबेटिक्स लोग आम खाकर रोस्टेड मूंगफली या रोस्टेड चने खाएंगे तो मूंगफली और चने के प्रोटीन शुगर स्पाइक कम करने में मदद करेंगे…
अभी इतना ही, फिर जब जैसा याद आएगा, पंचायत कर लूंगा…

फ़िलहाल अब बस, इतना कहकर कवि अपना स्थान ग्रहण करते हैं. और हां, आप फटाफट मारो शेयर और डायबिटीज़ वालों की दुआएं बटोर लो.

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट

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डॉक्टर दीपक आचार्य

डॉक्टर दीपक आचार्य

डॉक्टर दीपक आचार्य, पेशे से एक साइंटिस्ट और माइक्रोबायोलॉजिस्ट हैं. इन्होंने मेडिसिनल प्लांट्स में पीएचडी और पोस्ट डॉक्टरेट किया है. पिछले 22 सालों से हिंदुस्तान के सुदूर आदिवासी इलाक़ों से आदिवासियों के हर्बल औषधीय ज्ञान को एकत्र कर उसपर वैज्ञानिक नज़रिए से शोध कर रहे हैं.

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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