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Home ज़रूर पढ़ें

रंगीन भेलपुरी का रंगीला इतिहास

कनुप्रिया गुप्ता by कनुप्रिया गुप्ता
July 10, 2021
in ज़रूर पढ़ें, ज़ायका, फ़ूड प्लस
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ये है बम्बई नगरिया तू देख बबुआ… साहिबान कदरदान! ईमानदार, बेईमान, समझदार हो या शैतान… बम्बई गए हैं तो नगरिया को देखकर मन ख़ुश न हुआ हो ऐसा होना तो बड़ा मुश्क़िल है. बम्बई की लोकल ट्रेन पहली बार जानेवालों के लिए बड़ा कौतूहल-सा होती है, लोग पानी के रेले के जैसे एक जगह से दूसरी जगह बहते चले जाते हैं. कोई कहीं जा रहा है, कोई कहीं से लौट आया है. किसी बबलू ने हाथ में किताबें थामी हैं तो कोई मुन्नी बैडमिन्टन रैकेट थामे चली जा रही है. सब के सब लोकल ट्रेन के भरोसे सपनों में रंग भर रहे हैं. बम्बई की बात इसलिए कि आज का व्यंजन भी तो बम्बई का है!

वो देखिए न पवार साहब घर से भूखे ही निकल गए, अब जब निकल ही गए तो क्या वान्दा? स्टेशन से एक वडा पाव लेंगे और नाश्ता हुआ समझिए. और दूसरी तरफ़ देखिए वो कविता जी, जो काम से थक-हार कर जा रही हैं वापस घर. अब घर जाने में लगेगा एक घंटा और पेट में लगी है छोटी, छोटी-सी भूख. पर बात ये है कि उन्हें तला हुआ कुछ भी खाने का मन नहीं, सोचिए तो ज़रा वो क्या करेंगी? वो करेंगी इंतज़ार भेल वाले भैया का जो कविता जी की पसंद के हिसाब से सूखा या गीला जो भेल वो चाहेंगी उन्हें थमा देंगे और साथ में देंगे एक चपटी पूरी जिससे ये भेल खाई जाएगी…
मुंबई में आपको ये दृश्य आपको कहीं भी दिख जाएगा. और देशभर के चाट प्रेमियों के मुंह से आपको भेलपूरी की तारीफ़ भी सुनने ज़रूर मिलेगी, क्योंकि जब भी भूख लगी हो और कुछ तीखा, चटपटा और हेल्दी खाना हो तो भेलपुरी का नाम ज़रूर ज़ुबां पर आता है. अब ये मत कहिएगा फ्रूट चाट भी होती या काबुली चना चाट भी, क्योंकि मन को बहलाने के लिए ग़ालिब हर ख़याल अच्छा है, पर भेलपुरी तो भेलपुरी है! वो जितनी आसानी से कागज़ के बने कोन में लेकर खाई जा सकती है, उसका अपने आप में एक मज़ा है.
जैसे शायरी की दुनिया में ग़ालिब का नाम अदब से लिया जाता है, वैसे ही चटोरों की दुनिया में भेलपुरी ने अपनी अलग दुनिया बनाई है. कैरी के मौसम में सेव, परमल (मुरमुरा) में कटा प्याज़, बारीक़ कटी कैरी, उबले आलू के टुकड़े, ज़रा-सा जीरावन, नमक, निम्बू और कुछ मसालों को मिलाकर खाने जो परम आनंद प्राप्त होता है… आहाहाहा ! पूछिए ही मत. अब आप कहेंगे ये तो सेव-परमल ही हुई, पर मैं कहती हूं नहीं जनाब ये है भेल का मालवा वाला रूप. भरी गर्मी में लू चल रही हो उस गर्मी में ये ज़बर्दस्त कॉम्बिनेशन खाने मिल जाए यक़ीन मानिए मालवा का आदमी खाए और जहां बैठा है, वहीं लुढ़क जाए. 
मुंबई की भेल पूरी हालांकि काफ़ी अलग होती है और ये सिर्फ़ मुंबई में नहीं बनाई जाती, बल्कि पूरे देश में अलग-अलग ढंग से कुछ बदलावों के साथ बनाई जाती है, जैसे- मुंबई में इसे भेल कहा जाता है और पश्चिम बंगाल में झाल मुड़ी. कहीं इसमें सिकी हुई चना दाल डाली जाती है और कहीं नायलोन सेव पर इसके चाहने वाले आपको सब जगह मिल जाएंगे. और सबसे मज़ेदार बात ये है कि ये जंक फ़ूड बिलकुल भी नहीं है, क्योंकि इसमें ककड़ी, टमाटर, प्याज़, आलू जैसी सब्ज़ियां डाली जाती हैं, जो इसको हेल्दी नाश्ता बनाती हैं. और क्योंकि परमल स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है तो उससे बनी भेल काफ़ी हद तक सेहतमंद नाश्ते का ही एक रूप है.

इतिहास के झरोखे से भेलपुरी: भेल को ज़्यादातर “बीच स्नैक” कहा जाता है. शायद इसलिए कि इसका जन्म मुंबई में हुआ और मुंबई की चौपाटियों और बीच (गिरगांव चौपाटी, जुहू बीच) पर जाने वाले लोग इसे बड़े चाव से खाते हैं. ऐसा माना जाता है कि भेलपुरी को सबसे पहले मुंबई के विक्टोरिया टर्मिनस के पास एक रेस्तरां “विट्ठल “ में बनाया गया. दूसरी कहानी कहती है कि इसे मुंबई की गुजराती महिलाओं ने अपने घरों में बनाना शुरू किया और फिर उसके बाद ये बाज़ारों में आई. जैसे-जैसे वक्त गुज़रा इसकी ख्याति फैलती गई और इसके बाद ही इसके सिन्धी और मैंगलोरी वर्शन बनाए गए.

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यादों में भेलपुरी: भेलपुरी कभी यादों में जा ही नहीं सकती, क्योंकि ये तो रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा है. आलम ये है कि घर में हरी चटनी बनी नहीं कि दिल में से आवाज़ आने लगती है- चटनी तो बना ही ली है तो शाम को बाक़ी का सामान जुगाड़कर भेल भी बना ही ली जाए. जब मुंबई में थी तो एक हिंदी पत्रिका के ऑफ़िस जाया करती थी, कुछ वक़्त के लिए. वापसी में दादर स्टेशन पर भेलपुरी खाने का अघोषित नियम-सा था. दिन में खाए लंच के बाद शाम के 5-6 बजे तक पेट में चूहे फुदकने लगते थे तो बस भेलपुरी याद आती थी. और उसके पहले या बाद कितनी ही बार भेलपुरी ने दिल को ललचाया है. सफ़र हो या बच्चों की छोटी-सी पार्टी भेल ने ज़िदगी के हर हिस्से में जगह बनाई है और भेल के मालवा वाले रूप का तो पूछिए ही मत, वो तो मेरे सारे बचपन का हिस्सा है.
मैं आपको रेसिपी नहीं बताउंगी भेलपुरी की. मैं तो आती ही क़िस्से सुनाने हूं, पर हां आपसे ज़रूर पूछूंगी कैसे बनाते हैं आप भेल? बताइएगा ज़रूर. मेरी फ़ेवरेट है कच्ची कैरी के टुकड़ों के साथ वाली और आपकी फ़ेवरेट कौन-सी है ये भी ज़रूर बताइएगा, इस ईमेल आईडी पर: oye.aflatoon@gmail.com.

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट

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कनुप्रिया गुप्ता

कनुप्रिया गुप्ता

ऐड्वर्टाइज़िंग में मास्टर्स और बैंकिंग में पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा लेने वाली कनुप्रिया बतौर पीआर मैनेजर, मार्केटिंग और डिजिटल मीडिया (सोशल मीडिया मैनेजमेंट) काम कर चुकी हैं. उन्होंने विज्ञापन एजेंसी में कॉपी राइटिंग भी की है और बैंकिंग सेक्टर में भी काम कर चुकी हैं. उनके कई आर्टिकल्स व कविताएं कई नामचीन पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके हैं. फ़िलहाल वे एक होमस्कूलर बेटे की मां हैं और पैरेंटिंग पर लिखती हैं. इन दिनों खानपान पर लिखी उनकी फ़ेसबुक पोस्ट्स बहुत पसंद की जा रही हैं. Email: guptakanu17@gmail.com

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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