क्या आपको मालूम है कि वर्ष 1959 में सिंगापुर को सेल्फ़ गवर्नेंस मिला और वर्ष 1965 में सिंगापुर एक आज़ाद देश बना था? तब एक नौजवान लीडर ली कुआन यू ने इस देश की बागडोर संभाली. भगवान दास बता रहे हैं कि कैसे इतने कम समय में सिंगापुर जीवन गुणवत्ता में कैसे पश्चिमी देशों से भी आगे निकल गया कि सिंगापुर की प्रति व्यक्ति आय आज अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय से ज़्यादा है. और वहां के नागरिक आज फ़र्स्ट वर्ल्ड के नागरिक हैं. एक देश की सफलता की ये अद्भुत कहानी हमें ज़रूर जाननी चाहिए।
सिंगापुर दक्षिण पूर्व एशिया में स्थित एक आइलैंड देश है, दशकों पहले इसके निर्माण की शुरुआत हुई. द्वितीय विश्व युद्ध तक यह एक ब्रिटिश कॉलोनी थी. द्वितीय युद्ध के समय थोड़े समय के लिए इस पर जापान का कब्ज़ा हो गया था, लेकिन युद्ध में मित्र देशों की जीत और जापान की हार के बाद इसका कब्ज़ा वापिस ब्रिटिश सरकार के पास चला गया. उस समय सिंगापुर का इन्फ्रास्ट्रक्चर बुरी तरह टूटा हुआ था, हाउसिंग, सेनिटेशन की भारी कमी थी, मज़दूरों की हालत ख़राब थी, देश में एक तरह की अराजकता मौजूद थी.
उन्नीस सौ चालीस और पचास के दशक में फ़ैक्ट्री हड़ताल वहां आम बात थी. वर्ष 1959 में सिंगापुर को सेल्फ़ गवर्नेंस मिला और फिर कई वर्षों के संघर्ष के बाद वर्ष 1965 में सिंगापुर एक आज़ाद देश बन गया और एक नौजवान लीडर ली कुआन यू ने इस देश की बागडोर संभाली. उसके बाद शुरू हुआ सिंगापुर के नव निर्माण का दौर, उसके आर्थिक पहलू की कहानी काफ़ी लंबी है. लेकिन आज जिस पहलू पर मैं बात करना चाहता हूं, वो है सामाजिक पहलू.
ली कुआन ने कहा की विकास के लिए सबसे पहले सामाजिक सौहार्द ज़रूरी है. जिस देश में सामाजिक सौहार्द नहीं है, वहां किसी भी प्रकार का विकास संभव ही नहीं है.
सिंगापुर में मूलतः 3-4 प्रकार के एथनिक समूह रहते थे. चाइनीज़ बौद्ध, मुस्लिम मलय और तमिल हिंदू भारतीय. ली कुआन ने सबसे पहले सब प्रकार के एथनिक समूहों के इतिहास और परंपराओं को स्कूल पाठ्यक्रमों में शामिल कराया, ताकि बच्चों को शुरू से ही अपने देश के दूसरे एथनिक और धार्मिक समूहों के इतिहास और परंपराओं के बारे में ज्ञान हो है और वो एक-दूसरे की इज़्ज़त करें. इसके अलावा उन्होंने एक परम्परा डाली कि स्कूल में साल के एक दिन सब बच्चे किसी दूसरे धर्म से संबंधित पोशाक पहनकर आएंगे. इन चीज़ों से बच्चों को सही उम्र में ही दूसरे धर्मों के बारे में सही जानकारों हुई, जो देश के विभिन्न समुदायों के बीच सद्भावना पैदा करने के लिए मील का पत्थर साबित हुई.
इसके अलावा सिंगापुर सरकार ने यह नियम भी बनाया कि हर हाउसिंग सोसाइटी में सारे धर्मों और एथनिक समूहों का प्रतिनिधित्व होगा यानी किसी भी हाउसिंग सोसाइटी में हर धर्म के लोगों का समावेश होगा. कल्पना कीजिए कि बच्चे बड़े होते समय हर धर्म और एथनिक समूहों के बच्चों के साथ बड़े हों रहे है तो उनमें जो सद्भावना पैदा होगी, वो ताउम्र रहेगी. इसीलिए हमने आज तक कभी ये सुना ही नहीं कि सिंगापुर में कभी किसी तरह की कोई हिंसा हुई हो. ली कुआन यू ने शुरुआत से ही एक मज़बूत देश की नींव रख दी थी. इसके बाद उन्होंने आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, लेकिन ये कहानी फिर कभी.
भारत भी कुछ इसी रास्ते पर चला था. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भी सामाजिक सौहार्द पर ज़ोर दिया था लेकिन नेहरू अकेले नहीं थे, उस दौर के हर नेता चाहे सुभाष चंद्र बोस हो या सरदार पटेल या फिर लाल बहादुर शास्त्री. सबने इस पर ज़ोर दिया कि भारत में सारे धर्मों के मानने वालों में सौहार्द रहना चाहिए ताकि देश आगे बढ़े. ली कुआन यू तो ख़ुद भी नेहरू से प्रेरित थे.
लेकिन आज भारत में हालात क्या हैं? सरकार में बैठे शीर्ष के लोग आज एक समुदाय विशेष को निशाना बना रहे है. कई राज्यों में मुख्यमंत्री मंत्री खुले आम चुनावों के दौरान नफ़रत से भरे भाषण देते हैं, ताकि समुदायों के बीच खाई और बढ़े. सांसदों और विधायकों की बात तो न ही की जाए तो बेहतर है. हर मुमकिन कोशिश की जा रही है कि देश के लोगों को रेडिकलाइज़ किया जा सके. हर 6 महीनों में ऐसी प्रोपगंडा फ़िल्म रिलीज़ की जा रही है, जिससे पुराने घावों को फिर कुरेदा का सके और लोगों के बीच नफ़रत फैलाकर कर उन्हें बांटा जा सके, अलग किया जा सके.
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इतिहास में शायद काफ़ी कुछ गलत हुआ होगा और हल्का-सा ग़ौर करेंगे तो आप पाएंगे कि ये सभी समुदायों के साथ हुआ. याद कीजिए, वो 80-90 के दशक का दौर जब कौमी दंगे अक्सर हुआ करते थे. इन सब को छोड़ के देश आगे आया और आर्थिक तरक़्की ने रफ़्तार पकड़ी.
जिन देशों ने भारत के नेताओं से प्रेरणा ली और सामाजिक सौहार्द को अपनाया, आज वो ज़बरदस्त आर्थिक तरक़्क़ी करके विकसित देश बन चुके है. आज जीवन की गुणवत्ता में सिंगापुर किसी भी पश्चिमी देश से पीछे नहीं है. सिंगापुर की प्रति व्यक्ति आय आज 90,000 डॉलर के आसपास है और अमेरिका से ज़्यादा है. वहां के नागरिक आज फ़र्स्ट वर्ल्ड के नागरिक हैं.
भारत जो कि सिंगापुर का प्रेरणा स्रोत हुआ करता था, आज कहीं पीछे छूट गया है. राजनीति करने वालों से तो मुझे कोई उम्मीद नहीं है, लेकिन आम जनता को यह समझना होगा कि सामाजिक सौहार्द और शांति के बिना कोई मुल्क़ तरक़्क़ी नहीं कर सकता.
फ़ोटो साभार: फ्रीपिक







