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दिलीप साहब ख़फ़ा नहीं, बहुत ख़फ़ा हुए, पर आगे चलकर बात आई-गई हो गई

विनोद तिवारी by विनोद तिवारी
July 8, 2021
in चेहरे, ज़रूर पढ़ें, सुर्ख़ियों में
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दिलीप साहब ख़फ़ा नहीं, बहुत ख़फ़ा हुए, पर आगे चलकर बात आई-गई हो गई
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दिलीप कुमार का चुम्बकीय व्यक्तित्व कुछ ऐसा था कि फ़िल्मी दुनिया से जुड़ा हर व्यक्ति उनसे एक बार तो मिलना ही चाहता था. जब वे फ़िल्मों की चकाचौंध से दूर हो गए, तब भी उनका यह चार्म बरक़रार रहा. आज चाहे फ़िल्मी कलाकार हों या फ़िल्म पत्रकार, उसके पास दिलीप कुमार की अपनी यादें हैं. आख़िर वे हर किसी से बड़े ही स्नेह से मिला करते थे. अपने दौर की लोकप्रिय हिंदी फ़िल्म पत्रिका माधुरी के संपादक रहे विनोद तिवारी ने दिलीप साहब से जुड़ी अपनी एक नितांत निजी याद साझा की.

पिछले कुछ सालों से दिलीप कुमार की जो फ़ोटोएं छपती थीं, उन्हें देख कर दुख होता था. अदाओं के बादशाह हुआ करते थे वे लेकिन उनके हालिया चित्र देख कर इस बात का अनुमान लगा पाना मुश्क़िल नहीं होता था कि उनके आसपास जो कुछ घट रहा था, वे उससे विरक्त थे. 98 वर्ष की आयु में वे कितनों को पहचान पाते थे, पत्नी सायरा के निरंतर चलते प्रयासों के बावजूद कितना कुछ समझ पाते थे, क्या कुछ में उनकी रुचि बनी हुई थी, इस सबका सिर्फ़ अनुमान ही लगाया जा सकता था. चित्रों से झलकती उनकी बेबसी अंदर तक हिला देती थी. ख़ैर अब दिलीप साहब दूसरी दुनिया की सैर पर निकल गए हैं. हर किसी के साथ एक न एक दिन यही होना है, उम्र किसी को बख्शेगी नहीं. आदमी के जाने के बाद उसकी यादें रह जाती हैं. बतौर फ़िल्म पत्रकार मेरा भी दिलीप साहब से कई दफ़ा मिलना हुआ. इंटरव्यू ही नहीं उनका स्नेह भी मिला. आज मुझे वह वाक़या याद आ रहा था, जो उनके वैवाहिक जीवन के एकमात्र बड़े विवाद से जुड़ा है.

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जब मुझे झेलनी पड़ी दिलीप कुमार की नाराज़गी
उस वाक़ये की पृषठभूमि यह है कि लेजेंडरी माने जाने वाले दिलीप कुमार की जब तक शादी नहीं हुई थी, तब तक उनके रोमांस के किस्से और शादी के अनुमान चर्चा का विषय रहते. दिलीप का नाम तब ‘उड़ें जब जब जुलफें तेरी, कुवारियों का दिल धड़के …’ को साकार किया करता था. उस समय तक दैनिक अख़बार फ़िल्म जगत की घटनाओं को उस तरह सुर्खियां नहीं बनाया करते थे जैसा अब होने लगा है. लेकिन दिलीप कुमार इसके अपवाद ही थे. उन के रोमांसों की चर्चा अख़बारों में भी चला करती थी और एक समय के बाद यह माना जाने लगा कि दिलीप कुमार रोमांस में भले ही विश्वास रखते हों, शादी में उनका विश्वास नहीं है. तो फिर ऐसा क्या हुआ कि 44 वर्ष के दिलीप ने रातों रात, चट मंगनी पट ब्याह करके, उम्र में अपने से आधी सायरा बानो को जीवन संगिनी बना लिया?
विवाद और अफ़वाह दबी जबान से जो प्रचारित करते पाए गये उसके अनुसार इस विवाह की वजह उस दौर के एक अत्यंत सफल हीरो के साथ सायरा की फ़िल्में हिट होना बताया गया. जो कहा गया उसके अनुसार, डर यह व्याप्त होने लगा था कि कहीं पर्दे की यह सफल जोड़ी इस सफलता को वास्तविक जीवन में उतारने की न सोचने लगे. हीरो शादीशुदा था और धर्म भी आड़े आ सकता था. इस स्थिति में सायरा जी का बार बार दोहराया यह कथन स्थिति को सम्हाल ले गया कि वे सदा से ही दिलीप कुमार को चाहती आई हैं. इसमें कुछ ग़लत भी नहीं था क्योंकि उस दौर की भला कौन सी अभिनेत्री थी जो दिलीप कुमार के सपने नहीं देखा करती थी?
सिर्फ एक वाक़ये को छोड़ दें तो यह जोड़ी पति पत्नी के दीर्घकालीन, मधुर संबंधों की मिसाल बनी रही. विवादों में आ जाने वाले दिलीप कुमार ने सायरा से शादी के बाद हैदराबाद में गुपचुप एक शादीशुदा महिला से एक शादी और कर ली थी. वे उनके साथ रहने मुंबई आ गईं तो जैसा कि स्वाभाविक ही था, हंगामा मच गया. इसकी भनक लगने पर जब मैं दिलीप कुमार से इस बारे में बात करने पहुंचा तो वे एक प्रेस नोट पर काम कर रहे थे जिसे वे जल्दी ही रिलीज़ करके अपनी स्थिति साफ़ करना चाहते थे. मुझे उन्होंने वही कुछ बताया जो नोट में लिखा जाना था. यह सोच कर कि उनके उस प्रेस नोट के पहले, जिसमें उन्होंने दूसरी शादी और तलाक़ की बात स्वीकारते हुए अपना पक्ष रखा था, यह समाचार ‘माधुरी’ पत्रिका के संवाददाता के हवाले से छपे, मैंने वह सब उन दिनों टाइम्स ऑफ इंडिया से प्रकाशित होने वाले सांध्य दैनिक ईवनिंग न्यूज़ को दे दिया और इस तरह उनकी रिलीज़ आने के पहले उनका क़बूलनामा समाचार बन गया. इस बात पर वे बहुत ख़फ़ा हुए लेकिन बाद में बात आई गई हो गई. बाद में लोग उस विवाह प्रसंग को भूल गए और दिलीप कुमार के तमाम प्रशंसक बस यही याद रखेंगे कि सायरा और दिलीप सच्चे अर्थों में ‘मेड फ़ॉर ईच अदर’ थे जिनकी जोड़ी स्वर्ग से बन कर आई थी.

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विनोद तिवारी

विनोद तिवारी

पत्रकारिता के हर क्षेत्र, अख़बार, पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविज़न और फ़िल्मों का सघन अनुभव रखने वाले विनोद तिवारी लंबे समय तक टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप की पत्रिका माधुरी के संपादक रहे. वे सोनी एंटरटेन्मेंट टेलीविज़न के सीनियर मैनेजर के पद से सेवानिवृत हुए और मुंबई यूनिवर्सिटी में 20 वर्षों तक पत्रकारिता पढ़ाते रहे. उनकी लिखी किताबें कई विश्वविद्यालयों के मीडिया के पाठ्यक्रम में शामिल हैं. फ़िलहाल वे श्री राजस्थानी सेवा संघ, मुंबई, की एकेडमी ऑफ़ ऑडियो विशुअल आर्ट्स ऐंड जर्नलिज़्म (आवाज) के निदेशक हैं.

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