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दुल्हन वही जो पिया मन भाए: मिडल क्लास वैल्यूज़ से भरी फ़िल्म

जयंती रंगनाथन by जयंती रंगनाथन
April 23, 2021
in ओए एंटरटेन्मेंट, रिव्यूज़
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दुल्हन वही जो पिया मन भाए: मिडल क्लास वैल्यूज़ से भरी फ़िल्म
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पलट कर देखती हूं तो सत्तर के दशक में फ़िल्मों की दो तरह की धाराएं साथ-साथ तेजी से उभर कर आई. एंग्री यंग मैन जो अन्याय और निरकुंश खलनायकों से लड़-लड़ा कर कॉमन आदमी को न्याय देता था. दूसरी तरफ सोशल वैल्यूज से भरपूर ऐसी फ़िल्में जो हमें हंसाती-गुदगुदाती और नेकी की जय-जयकार वाला संदेश देती थी. राजश्री फ़िल्म्स एक ऐसा बैनर था, जो लगभग हर साल ऐसी एक फ़िल्म ले कर आता था. सत्तर के दशक में उपहार, गीत गाता चल, चितचोर, दुल्हन वही जो पिया मन भाए, अंखियों के झरोखों से, सावन को आने दो, नदिया के पार, मनोकामना ऐसी ही कुछ फ़िल्में थीं. आज हम बात करने जा रहे हैं दुल्हन वही जो पिया मन भाए की.

आगे बढ़ने से पहले बता दूं कि यह फ़िल्म कोई कल्ट या क्लासिक फ़िल्म नहीं है. पर इस फ़िल्म से जुड़ी यादें इतनी मनभावन है कि उनकी वजह से यह फ़िल्म मेरे लिए अहम है. दुल्हन वही जो पिया मन भाए 1977 की गर्मियों में रिलीज़ हुई थी. फ़िल्म के हीरो हीरोइन नए थे. फ़ेमस खलनायक प्रेम नाथ का बेटा प्रेम किशन (जी हां, नेपोटिज़्म तब भी था) और सांवली सलोनी रामेश्वरी.
फ़िल्म के निर्देशक लेख टंडन ने वर्ष 1952 में आई देव आनंद और मीना कुमारी की फ़िल्म तमाशा की कहानी को ट्वीक करके इस फ़िल्म की कहानी लिखी थी. प्रेम के दादाजी अमीर उद्योगपति हैं. वे बीमार हैं और चाहते हैं कि उनके गुज़रने से पहले प्रेम शादी कर ले. प्रेम की प्रेमिका रीता एक मॉडल है. प्रेम रीता को दादा से मिलवाना चाहता है पर रीता काम की वजह से अटक जाती है. जल्दी जल्दी में प्रेम एक ग़रीब फूल बेचने वाली कम्मो को रीता की तरह ऐक्ट करने के लिए मना लेता है. कम्मो को प्रेम से प्यार हो जाता है. दादा जी (मदन पुरी) को कम्मो भा जाती है. जब रीता वापस लौटती है, कम्मो को वापस जाना पड़ता है. लेकिन अंत में प्रेम को समझ में आ जाता है कि उसकी दुल्हन कम्मो ही हो सकती है रीता नहीं.
मिडल क्लास वैल्यूज़ के साथ बनी इस फ़िल्म में हीरोइन साड़ी पहनती है, ज़ाहिर है सिगरेट शराब नहीं पीती. गाउन नहीं पहनती. हिंदी बोलती है. खाना भी सुपर्ब बनाती है. बड़ों का सम्मान करती है, ज़रूरत पड़ने पर गाना भी गा लेती है और सितार भी बजा लेती है. हीरोइन और वैम्प के बीच का डिमार्केशन उस दौर की सभी फ़िल्मों में साफ़ नजर आता है. यह अच्छी है यह बुरी. अंत में जब अच्छी को नायक मिलता है तो लगता है वाह, यह हुई ना बात. मैंने आपको पहले ही बता दिया था कि हम जेन एक्स वाले जबरदस्त त्रिशंकु में फंसे रहते हैं. ख़ैर यह तब का वक़्त था, सरिता, गृहशोभा, धर्मयुग की कहानियां भी इसी सोशल मैसेज के साथ होती थीं और एक पूरी पीढ़ी इसी बात को सच मान कर मिलेनियल्स की आज़ाद ख़्याली को कोसती भी है.
इस फ़िल्म के गाने-ख़ुशियां ही ख़ुशियां, ले तो आए हो हमें, अब रंजिशें ख़ुशी से बहारों फ़िज़ा से क्या ज़बरदस्त हिट हुए. रवींद्र जैन, हेमलता, येशुदास की आवाज़ से सजे ये गाने बिनाका गीत माला में ख़ूब बजे.
इस फ़िल्म से जुड़ी दिलचस्प बातें बताने से पहले इससे जुड़ी अपनी दिलचस्प यादों के बारे में बात करना चाहूंगी. तो बात यह है कि दुल्हन वही जो पिया मन भाए हम जब पहली बार चित्र मंदिर में देखने गए, तो शुरू के दस मिनट मिस हो गए. मैं और मेरी बहन नलिनी आज भी कोई फ़िल्म शुरू से ना देखें तो मानते हैं कि फ़िल्म देखी ही नहीं. मैं तो चाहे आईपैड पर ही क्यों ना देखूं, शुरू के टाइटिल्स के साथ देखती हूं.
फ़िल्म हम सबको बेहद सही लगी. मदन पुरी-इफ्तिखार की जोड़ी ग़ज़ब. गाने गजब. घर लौट कर आए तो हम दोनों को लगा कुछ मिस कर दिया. कुछ दिन पहले ही हमारा नया साल विशु गुज़रा था, हम दोनों के पास पैसे थे. तय हुआ कि घर पर बहाना बना कर वापस यह फ़िल्म देखी जाए शुरू से. हम दोनों दो दिन बाद चित्र मंदिर गए. फ़िल्म देखा. कह कर गए थे कि मैं अपनी दोस्त से मिलने जा रही हूं. मैटिनी शो देखने के बाद हम दोनों रिक्शा ले कर घर आए, तो बरामदे में बैठे अप्पा ने चश्मे से आंख निकाल कर घूरते हुए पूछा, तो कैसी लगी फ़िल्म? हम दोनों खिसिया गए. घर में भाई रवि ने ख़ूब खिल्ली उड़ाई कि क्या पहली बार में फ़िल्म समझ नहीं आई थी जो दोबारा देखने गए.
ख़ैर इसके एक सप्ताह बाद मुंबई से मौसी हमारे घर आईं. उनके साथ पूरी फ़ैमिली फिर से यह फ़िल्म देखने गई. एक सप्ताह में मैंने तीन बार सिर्फ़ यही फ़िल्म देखी है. और तीनों बार एंजॉय किया. कहा ना तीनों बार अच्छी वाली फ़ीलिंग के साथ घर लौटे. इस फ़िल्म के साथ इतनी सारी यादें जुड़ी हुई हैं कि सोचती हूं तो गुदगुदी सी होती है. गर्मियों के दिनों में पके आम की ख़ुशबू का सौंधापन है यह फ़िल्म.

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फ़िल्म दुल्हन वही जो पिया मन भाए से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें
यह फ़िल्म सुपर-डुपर हिट रही. यह अगल बात है कि फ़िल्म के हीरो-हीरोइन इस फ़िल्म के बाद खास नहीं चले. प्रेम किशन बाद में टीवी सीरियल बनाने लगे. रामेश्वरी एक एक्सिडेंट में अपने आंख पर चोट लगा बैठीं. वो भी कुछ ख़ास नहीं कर पाईं. अर्से बाद बंटी और बबली में अभिषेक बच्चन की मां के किरदार में देखा था. इस फ़िल्म में लेख टंडन मदन पुरी के रोल में अशोक कुमार को लेना चाहते थे. उनके मना करने के बाद मदन पुरी की एंट्री हुई. इस फ़िल्म से उन्हें खूब फ़ायदा हुआ. सालों बाद डेविड धवन ने इसी प्लाट पर माधुरी दीक्षित और ऋषि कपूर को ले कर याराना फ़िल्म बनाई, जो नहीं चली. लेख टंडन इस फ़िल्म में बंगाली हीरोइन बिजया को लेना चाहते थे. पर जब वह राजश्री के ऑफ़िस में ताराचंद बड़जात्या से मिलने आईं तो पैंट्स और शर्ट में थी. उसे तुरंत रिजेक्ट कर दिया गया यह कह कर कि वो कम्मो के रोल में नहीं जमेगी.

क्यों देखें: कहा ना, फ़ील गुड से भी है यह फ़िल्म.

कहां देखें: यूट्यूब, अमेज़ॉन प्राइम

Tags: 30 days 30 films30 दिन 30 फिल्मेंDulhan vahi jo piya man bhayeकल्ट क्लासिक फिल्मेंजयंती रंगनाथनदुल्हन वही जो पिया मन भाएपुरानी फिल्मेंफिल्म रिव्यूफिल्म समीक्षाफिल्में और ज़िंदगी
जयंती रंगनाथन

जयंती रंगनाथन

वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन ने धर्मयुग, सोनी एंटरटेन्मेंट टेलीविज़न, वनिता और अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम किया है. पिछले दस वर्षों से वे दैनिक हिंदुस्तान में एग्ज़ेक्यूटिव एडिटर हैं. उनके पांच उपन्यास और तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. देश का पहला फ़ेसबुक उपन्यास भी उनकी संकल्पना थी और यह उनके संपादन में छपा. बच्चों पर लिखी उनकी 100 से अधिक कहानियां रेडियो, टीवी, पत्रिकाओं और ऑडियोबुक के रूप में प्रकाशित-प्रसारित हो चुकी हैं.

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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