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Home ओए एंटरटेन्मेंट

जैत रे जैत: मराठी फ़िल्म, जिसे समझने में भाषा कोई बाधा नहीं है

जयंती रंगनाथन by जयंती रंगनाथन
May 13, 2021
in ओए एंटरटेन्मेंट, रिव्यूज़
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जैत रे जैत: मराठी फ़िल्म, जिसे समझने में भाषा कोई बाधा नहीं है
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म्यूज़िकल फ़िल्म की अगर बात करूं तो आपके जहन में सबसे पहले घंटी किस फ़िल्म के लिए बजती है? साउंड ऑफ़ म्यूज़िक? चिटी चिटी बैंग बैंग? परिचय? हीर-रांझा? ग्रीस? लाला लैंड? ला मिसरेबल्स? मामा मिया? शिकागो? सावन को आने दो? हम आपके हैं कौन? माइ फ़ेयर लेडी? लगान? द विज़ार्ड ऑफ़ ऑज़? जैत रे जैत क्यों नहीं? आज हम बात करने जा रहे हैं इस स्मिता पाटिल की इस फ़िल्म की.

यह मराठी फ़िल्म 1977 में रिलीज हुई थी. ओह क्या फ़िल्म थी. डॉक्टर जब्बार पटेल फ़िल्म के निर्देशक थे. फ़िल्म में काम किया था स्मिता पाटिल और मोहन अगाशे ने. मुझे जानने वालों को पता है कि मराठी गाना मी रात टाकली, मी कात टाकली, मुझे कितना पसंद है. इस गाने से मैं अपने मुंबई और पनवेल में गुज़ारे दिनों में पहुंच जाती हूं.
यह फ़िल्म मैंने 1984 में देखी थी, पनवेल में. मुंबई से सत्तर किलोमीटर दूर रायगढ़ ज़िले का यह छोटा-सा क़स्बा तब शहर का आकार ले रहा था. मेरी बहन रजनी बाले एचओसी में इंजीनियर थी और पनवेल में उन्हें स्टाफ़ क्वॉर्टर मिला था. हम भिलाई से वाया मुंबई पनवेल आए. रवि तब कॉलेज के एडमिशन में लगा था. एक दोपहरी दूरदर्शन पर मैं और भाई इस फ़िल्म को पा गए. उस समय मराठी से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं बना था. बाद के दिनों में मैं ठीक-ठाक समझने और बोलने भी लगी थी. पर उस वक़्त हमारे लिए वो एक पड़ोसी की भाषा थी. कलाकार भी कुछ ऐसे बड़े नाम नहीं कि फ़िल्म को रुक कर देखा जा सके. हालांकि भिलाई में हम स्मिता पाटिल की कुछ फ़िल्में देख चुके थे. शक्ति में वो ठीक भी लगी थीं. पर तब तक ‘द स्मिता पाटिल’ से हमारा ना परिचय हुआ था ना साबका.

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हम फ़िल्में तो बहुत देखते थे, पर तब अच्छी-बुरी फ़िल्मों और कमर्शियल और आर्ट फ़िल्मों को अलग करके देखने की तमीज नहीं आई थी. पर पता नहीं जैत रे जैत के पहले ही सीन में ऐसा क्या जादू था कि हम दोनों, टीनएजर्स सम्मोहन में बंधे वहां रुक गए. दो सूत्रधार, गानों, नगाड़ों के ज़रिए बता रहे हैं कि आगे ठाकर द्वारी है, डोंगर काठाड़ी ठाकरबाड़ी…
अब उस बच्चे को देखिए जो समंदर में नहा कर आ रहा है और मधुमक्खियों ने उसे काट लिया है. वो बच्चा नाग्या (मोहन अगाशे) है. बचपन से वो अपने पिता की तरह नगाड़ा बजाना चाहता है और मधुमक्खियों की दुनिया से आसक्त है. बाबा ने बताया है कि मधुमक्खियों की एक रानी होती है और वो ही उन सबको नचाती है. वो नहीं रहेगी तो कोई नहीं रहेगा. उस आदिवासी क़बीले में अपने पति को छोड़ आई एक तेज तर्रार चिंदी (स्मिता पाटिल) भी है, जिसका दिल कद्दावर, आकर्षक नाग्या पर आ जाता है. और जिसके लिए वह अपने पति को पैसे दे कर अपना मंगल सूत्र मोड़ कर आज़ाद भी हो जाती है. कहानी बेहद सादी है. नाग्या का बाप सांप के काटने से मर जाता है. नाग्या बेहतरीन नगाड़ा बजाता है और उसे पुण्यवंत बनना है. उसके लिए वो कुछ भी करने को तैयार है. भोला, दिल का हीरा नाग्या मधुमक्खियों के हमले में अपना एक आंख खो बैठता है. उसे बदला लेना है. चिंदी उसका साथ देने को तैयार हो जाती है. दोनों पहाड़ के ऊपर गांव के देवता लिंगोबा के पहाड़ पर जाते हैं. सभी मधुमक्खियों के छत्ते को मार गिराना आसान नहीं. पर नाग्या यह कर डालता है. उसे अहसास नहीं होता कि उसके गिराते छत्ते की मधुमक्खियों ने चिंदी को डंस लिया है. चिंदी चली जाती है पर नाग्या को विजय मिलती है अपने डर से. जैत रे जैत यानी जीत रे जीत. विन-विन…
इस मार्मिक कथानक पर मत जाइए. क़दम-क़दम पर सूत्रधारों की चुहलबाज़ी, गाने, नाच आपको एक दूसरी ही दुनिया में ले जाएंगे. मेरा पसंदीदा गाना मी रात टाकली, मी कात टाकली लता मंगेशकर ने गाया है. जैसे एक स्त्री की आज़ादी का यक्ष गान है. वह लड़की सारे बंधनों से आज़ाद हो कर अपनी पसंद की राह तय करने जा रही है. मराठी लांग की साड़ी और खुले गले के महाराष्ट्रीय ब्लाउज़, गले में ढेर मोती और गिलट के आभूषण, हाथों में कड़े, नंगे पैर, लंबे डग भरती वह लड़की दुनिया नापने चली है, लड़ने चली है उस समाज से जो स्त्रियों को पुरुष की संपत्ति मानते हैं. वह अपने बाप से लड़ती है कि क्यों उसकी शादी एक ऐसे आदमी से कर दी जो आदमी है ही नहीं?
जांबुल पिकल्या झाड़ाखाली, ढोल कुणाचा वाजजी, नब उथरु आला, वाडी वरिया वाटा … ये सारे गाने ऐसे हैं, जो आपकी ज़ुबां पर चढ़ जाते हैं. इस संगीतमय फ़िल्म में 12 गाने हैं. कुछ बातचीत की शैली में तो कुछ लय बद्ध. इस फ़िल्म में हृदयनाथ मंगेशकार ने संगीत दिया है. लता मंगेशकर के भाई हृदयनाथ ने बहुत कम फ़िल्मों में संगीत दिया है. पर जिसमें भी दिया है, वो बेहतरीन हैं. इस फ़िल्म के दो गानों की धुन बाद में हिंदी फ़िल्म मशाल में यश चोपड़ा ने इस्तेमाल किया है. उस फ़िल्म में भी हृदयनाथ का ही संगीत था. होली आई होली आई देखो होली आई रे. दिलीप साहब, वहीदा रहमान, अनिल कपूर और रति अग्निहोत्री पर यह गाना फ़िल्माया गया था.

फ़िल्म जैत रे जैत से जुड़ी दिलचस्प बातें
डॉ जब्बार पटेल पेशे से एक मेडिकल डॉक्टर हैं, पेडियाट्रीशन हैं. उन्हें नाटकों में काम करने का शौक़ था. यही शौक़ उन्हें फ़िल्मों में ले आया. उन्होंने जैत रे जैत के बाद भी कई यादगार फ़िल्में बनाई हैं, सिंहासन, उंबरटा (हिंदी में सुबह, इसमें भी स्मिता पाटिल ने काम किया था), एक होता विदूषक, डॉ बाबा साहेब आंबेडकर…
कुछ दिनों पहले मैंने यूट्यूब पर यह फ़िल्म फिर से देखी. एक बार से यक़ी हो गया कि उस वक़्त जिस फ़िल्म को देख कर मैं अभिभूत हुई थी, भाषा ना आने के बावजूद रस सिक्त हुई थी, आज भी उस फ़िल्म में कुछ वैसी ही झनझनाहट है. अब तो मुझे लगभग पूरी फ़िल्म समझ में आने लगी है.
आपको मराठी आए ना आए, यह फ़िल्म जरूर देखिए. अपनी माटी, अपना रंग, अपना संगीत. वो दुनिया, वो बाशिंदे, वो दिन ही कुछ और थे. सादगी में रस बरसता था और अपने से लोग हमें एक हसीन दुनिया में ले जाते थे.

क्यों देखें: स्मिता पाटिल और मोहन अगाशे का शानदार अभिनय, अभूतपूर्व संगीत.

कहां देखें: यू ट्यूब पर

Tags: 30 days 30 films30 दिन 30 फिल्मेंJait re Jaitकल्ट क्लासिक फिल्मेंजयंती रंगनाथनजैत रे जैतपुरानी फिल्मेंफ़िल्म जैत रे जैतफिल्म रिव्यूफिल्म समीक्षाफिल्में और ज़िंदगीमराठी फिल्म जैत रे जैतस्मिता पाटिल की फिल्में
जयंती रंगनाथन

जयंती रंगनाथन

वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन ने धर्मयुग, सोनी एंटरटेन्मेंट टेलीविज़न, वनिता और अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम किया है. पिछले दस वर्षों से वे दैनिक हिंदुस्तान में एग्ज़ेक्यूटिव एडिटर हैं. उनके पांच उपन्यास और तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. देश का पहला फ़ेसबुक उपन्यास भी उनकी संकल्पना थी और यह उनके संपादन में छपा. बच्चों पर लिखी उनकी 100 से अधिक कहानियां रेडियो, टीवी, पत्रिकाओं और ऑडियोबुक के रूप में प्रकाशित-प्रसारित हो चुकी हैं.

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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