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Home ओए हीरो

इंटरनेट और यूनीकोड ने तकनीक, भाषा और कॉन्टेंट का लोकतांत्रिकरण कर दिया है: योगेश पालीवाल

शिल्पा शर्मा by शिल्पा शर्मा
September 21, 2021
in ओए हीरो, ज़रूर पढ़ें, मुलाक़ात
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इंटरनेट और यूनीकोड ने तकनीक, भाषा और कॉन्टेंट का लोकतांत्रिकरण कर दिया है: योगेश पालीवाल
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तकनीक, यूनिकोड और इंटरनेट के अमैल्गमेशन ने भारत में बोली जानेवाली भाषाओं के विकास को अचानक ही विस्तार दे दिया. इस गठजोड़ ने भारत के हर व्यक्ति को अपने हाथ में मौजूद स्मार्ट फ़ोन को हैंडल करने के लिए उसे अपनी भाषा उपलब्ध करा दी है. हमारी ख़ास पेशकश हिंदी वाले लोग में आज हम आपको मिलवा रहे हैं योगेश पालीवाल से, जो इस परिवर्तन के साक्षी ही नहीं, बल्कि इसके होने में सहभागी भी रहे हैं.

यदि आप हिंदी या अन्य किसी भी भारतीय भाषा से जुड़े हैं और अपनी भाषा के साथ-साथ आप अंग्रेज़ी भाषा में भी दक्ष हैं तो योगेश पालीवाल का यह इंटरव्यू आपके लिए बेहद काम का साबित हो सकता है. योगेश जी जर्नलिज़्म से जुड़े हुए थे, लेकिन धीरे-धीरे वे उस क्षेत्र की ओर मुड़ गए, जिसे ‘लोकलाइज़ेशन’ कहा जाता है. अब लोकलाइज़ेशन दरअसल क्या है, उसके बारे में तो आपको वे ही बताएंगे, क्योंकि यह उनकी दक्षता वाला विषय है. हां, मैं आपको यह ज़रूर बताऊंगी कि वे ट्रान्स्लेशन और लोकलाइज़ेशन सर्विस देनेवाली अमेरिकी कंपनी लायनब्रिज से जुड़े हैं. तो आइए, योगेश से इस बारे में चर्चा शुरू करते हैं.

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योगेश जी आप जर्नलिज़्म से जुड़े रहे, फिर आपने एक दूसरे ही करियर की ओर रुख़ किया, जो हिंदी से ही जुड़ा हुआ है, लेकिन जिसके बारे में कम लोग जानते हैं, हम उसपर भी आएंगे, पर पहले आप अपने और अपने करियर की यात्रा के बारे में बताएं और ये भी बताएं कि क्या वजह रही कि आपने जर्नलिज़्म को छोड़ा.
दरअसल, जर्नलिज़्म से लोकलाइज़ेशन में आना अनायास हुआ. मैंने इसके लिए कोई कोशिश नहीं की थी. भाषाओं से प्रेम था तो शुरू से सही लिखने और बोलने की कोशिश रहती थी. हिंदी तो अच्छी थी, अंग्रेज़ी भी ठीक थी. फिर मुझे सौभाग्य से डिजिटल पत्रकारिता में काम करने का मौका मिला तो वहां नई तकनीक कंप्यूटर और इंटरनेट से भी परिचय हो गया. जब हमारे संस्थान ने भारत और हिंदी के पहले लोकलाइज़ेशन प्रोजेक्ट के लिए प्रतियोगिता में भाग लिया तो सौभाग्य से मुझे उस पर काम के लिए चुना गया. मैं अपने शुरुआती योगदान, दोनों भाषाओं और तकनीक से परिचित होने के नाते पहले हिंदी लोकलाइज़ेशन के लिए लीड चुना गया. और इस तरह मैं डिजिटल जर्नलिज़्म से लोकलाइज़ेशन में आ गया. और मैं यहां खुश हूं.

लोग हिंदी के ग्लोबल हो जाने की बात करते हैं, चूंकि आप हिंदी के क्षेत्र में ही काम करते हैं क्या आपको लगता है कि इंटरनेट के आने से यह एक ग्लोबल भाषा बन गई है? यदि हां तो क्यों? यदि नहीं तो क्यों?
निश्चित रूप से हिंदी का विस्तार ग्लोबल स्तर पर हुआ है. इंटरनेट ने इसके विस्तार में बहुत बड़ी और सकारात्मक भूमिका निभाई है. इंटरनेट और यूनिकोड के संयोग ने इसके सारे बंधन और रुकावटों को ध्वस्त कर दिया. कॉन्टेंट जनरेट करना और उसे प्रकाशित करना और उसे पूरी दुनिया में कहीं भी पहुंचाना, आज बहुत आसान है. मैं इसे तकनीक, भाषा और कॉन्टेंट का लोकतांत्रिकरण कहता हूं, जहां सबकुछ सबकी पहुंच में है. और यह विस्तार और प्रसार अभी रुका नहीं है.

क्या आपके क्षेत्र से देखने पर आपको ऐसा लगता है कि बाज़ार में हिंदी की मांग है, अच्छी हिंदी जाननेवालों की मांग है? और यदि है तो उसका कारण क्या है?
ये बात एक जानामाना सच है कि किसी भी क्षेत्र में ‘अच्छे’ की मांग हमेशा रहती है. भाषा, तकनीक और कॉन्टेंट के लोकतंत्र में सब तरह की हिंदी चल रही है और बिक रही है, पर अभी भी अच्छी हिंदी की मांग है और अच्छी हिंदी वालों की भी मांग है. बाज़ार में सबकुछ है और सबके लिए ख़रीददार भी हैं. हम ऐसे कस्टमर्स के लिए भी काम करते हैं, जिन्हें अच्छी भाषा से कोई सरोकार नहीं है. दूसरी तरफ़ हमारे ऐसे कस्टमर भी हैं, जिनके लिए काम करना हमें बहुत चुनौतीपूर्ण लगता है, क्योंकि अपने बिज़नेस के लिए वे अच्छी भाषा का महत्व समझते हैं और हमसे उसकी मांग करते हैं. इसलिए मैं आश्वस्त हूं कि अच्छी हिंदी जानने वालों की मांग और जगह हमेशा है.

‘लोकलाइज़ेशन’ एक ऐसा शब्द है जिसके बारे में आज भी लोग नहीं जानते हैं, जब इस शब्द के बारे में लोगों को ज्ञान नहीं है तो इससे जुड़े करियर के बारे में पता होना दूर की बात है. आप हिंदीभाषी लोगों को इस शब्द से परिचित कराइए.
आज के वैश्विक बाज़ार में एक जगह बने किसी प्रोडक्ट को पूरे विश्व के हर बाज़ार के उपयोग के लिए तैयार करना लोकलाइज़ेशन है. उस प्रोडक्ट के विवरण, फ़ीचर्स और इंटरफ़ेस का अनुवाद लोकलाइज़ेशन की व्यापक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण भाग है. हमारी अपनी भाषा में सेट किया हुआ मोबाइल फ़ोन लोकलाइज़ेशन का सबसे सुलभ, सरल उदाहरण है.

इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए किस तरह की क्वालिफ़िकेशन या किन गुणों की ज़रूरत होती है? किस तरह का प्रोफ़ाइल मिलता है?
अपनी भाषा और अंग्रेज़ी पर अच्छा अधिकार होना इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए मूलभूत योग्यता है. आख़िरकार भाषा ही आपका प्रोडक्ट बनती है. एक और चीज़ बहुत ज़रूरी है वह है-आपका व्यापक पठन. बहुत अच्छा सामान्य ज्ञान बहुत मददगार होता है. पठन और सामान्य ज्ञान आपको कोई भी काम अच्छी तरह करने का आत्मविश्वास और आधार देता है. प्रोफ़ाइल बहुत हैं-अनुवादक, आइडियेटर, एडिटर से लेकर मैनेजमेंट तक की प्रोफ़ाइल्स योग्य लोगों को मिलती हैं. और आज भारत के बड़े बाज़ार में इस क्षेत्र की हर कंपनी अपनी जगह बनाना चाहती है. भारत एक अकेला ऐसा देश है, जिसमें हिंदी के अलावा भी कई भाषाओं के यूज़र्स और उपभोक्ता हैं. हमारी कई भाषाओं का यूज़र बेस दुनिया की कई ऐसी भाषाओं से बड़ा है, जो कई देशों में बोली जाती हैं. तात्पर्य यह है कि न केवल हिंदी, बल्कि हमारी सभी भारतीय भाषाओं में बहुत अवसर हैं.

इस क्षेत्र में आने के इच्छुक हिंदीभाषी युवाओं से आप क्या कहना चाहेंगे?
भाषाओं को वह आदर और प्रेम दें, जिसकी वे अधिकारी हैं. मैं केवल हिंदी की बात नहीं कर रहा हूं क्योंकि हमारे क्षेत्र में केवल एक भाषा से बात नहीं बनती है. बहुत पढ़ें, अपने ज्ञान और दृष्टि को व्यापक बनाएं और परिश्रम और उद्यम से इन्हें निरंतर विस्तार दें. प्रतियोगिता बहुत कठोर है, पर ये भी तो अटल सत्य है कि लगन और परिश्रम बहुधा जीत ही जाते हैं.

यह तो हुई आपके कार्यक्षेत्र से जुड़ी बातें, अपने शुरुआती दिनों यानी बचपन, शिक्षा-दीक्षा और परिवार के बारे में कुछ बताइए.
मैं मध्य प्रदेश के मालवा अंचल के एक छोटे शहर जावरा से आता हूं. मेरा एक परिवार पृष्ठभूमि में कृषि और शिक्षा दोनों हैं. मेरे पिता को घर से बाहर जाकर पढ़ने का मौका मिला और वे कृषि की पारंपरिक पृष्ठभूमि से अलग होकर शिक्षा के क्षेत्र में आ गए. लेकिन हमारे परिवार, गांव और हमारी मालवी बोली से हमारा जीवंत संपर्क आज भी है. हम सब लोग आज भी खुद की पहचान अपने गांव से ही जोड़कर देखते हैं और इस पर गर्व भी करते हैं. पता नहीं इसमें ऐसी क्या बात है पर मुझे इस बात पर भी गर्व है कि मैंने सबसे पहले मालवी में बोलना शुरू किया था. मैंने मालवी में बहुत कुछ पढ़ा और सुना है और मैं आज भी इसे बोलने में बहुत सहज हूं. घर जाने पर कई बार ऐसे मौके आते हैं कि मैं एक ही समय पर हिंदी और मालवी बोलने वाले लोगों से बात कर रहा हूं, सबको उनकी भाषा में जवाब दे रहा हूं और बीच में फोन पर किसी को अंग्रेज़ी में भी जवाब दे रहा हूं. स्कूली पढ़ाई पूरी हिंदी माध्यम में हुई. हमारे शहर में पढ़ाई और खेलकूद का बड़ा अच्छा माहौल था और दोनों के लिए बहुत अवसर थे जिनका भरपूर लाभ हम सबने उठाया. ग्रेजुएशन में संस्कृत और अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ा और उसके बाद पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए जेएनयू जाने का मौका मिला जहां मेरे कस्बाई किशोर व्यक्तित्व में थोड़ा महानगर भी मिल गया.

आपकी आगे की क्या योजनाएं हैं?
मैं भाषा और समाज विज्ञान का विद्यार्थी था और रहूंगा. भाषा और समाज विज्ञान ने मुझे व्यापक दृष्टि दी और मेरे लिए पठन और चिंतन को आधार और विस्तार दिया. इन्हीं के सहारे मैं पहले शिक्षा, पत्रकारिता और फिर लोकलाइज़ेशन जैसे क्षेत्रों में कामकर पाया. सुखद संजोग यह था कि इन दोनों कार्यक्षेत्रों के लिए मैंने न तो कभी सोचा था और न ही कभी कोई औपचारिक योग्यता हासिल करने की कोशिश की. बस थोड़ी अच्छी भाषा, व्यापक पठन, नई चीज़ों के साथ जल्द तालमेल बैठा लेने की सहज आदत ने एक नितांत नए क्षेत्र में काम करने का रास्ता आसान बनाया.
परिश्रम और समर्पण मेरे मंत्र हैं जिनमें मेरा अखंड विश्वास है. परिवार मेरी प्रेरणा और आधार है जहां हमें प्रेम और त्याग घुट्टी में मिला जिसे मैं दुनिया को लौटाने की कोशिश करता हूं. पर्यावरण, पानी और पशु-पक्षियों के प्रति बहुत संवेदनशील हूं और अपने स्तर पर इन्हें बचाने की कोशिश करता हूं. इच्छा है कि इन सबके साथ अपने लोगों के लिए भी कुछ करूं.

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शिल्पा शर्मा

शिल्पा शर्मा

पत्रकारिता का लंबा, सघन अनुभव, जिसमें से अधिकांशत: महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर कामकाज. उनके खाते में कविताओं से जुड़े पुरस्कार और कहानियों से जुड़ी पहचान भी शामिल है. ओए अफ़लातून की नींव का रखा जाना उनके विज्ञान में पोस्ट ग्रैजुएशन, पत्रकारिता के अनुभव, दोस्तों के साथ और संवेदनशील मन का अमैल्गमेशन है.

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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