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माँ तुम्हारा चूल्हा: अरुण चन्द्र रॉय की कविता

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
April 3, 2026
in बुक क्लब, कविताएं, ज़रूर पढ़ें
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माँ तुम्हारा चूल्हा: अरुण चन्द्र रॉय की कविता
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जब दुनिया में ईंधन की इतनी किल्लत आ रही है या आने वाली है और हम आत्मनिर्भर भी नहीं हैं, कवि अरुण चन्द्र रॉय को अपनी कविता ‘माँ तुम्हारा चूल्हा’ की याद आ गई. उन्होंने यह कविता 2011 में लिखी थी और यह ‘प्रगतिशील वसुधा’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी. चूल्हे को आत्मनिर्भरता का प्रतीक बताते हुए कवि चूल्हा विरोधी उन लोगों पर तंज कसते हैं, जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर कार्बन फ़ुटप्रिंट कम करने की बातें करते हैं.

माँ
बंद होने वाला है
तुम्हारा चूल्हा
जिसमे झोंक कर
पेड़ की सूखी डालियाँ
पकाती हो तुम खाना
कहा जा रहा है
तुम्हारा चूल्हा नहीं है
पर्यावरण के अनुकूल

माँ
मुझे याद है
बीन लाती थी तुम
जंगलों, बगीचों से
गिरे हुए पत्ते
सूखी टहनियां
जलावन के लिए
नहीं था तुम्हारे संस्कार में
तोड़ना हरी पत्तियाँ
जब भी टूटती थी
कोई हरी पत्ती
तुम्हें उसमें दिखता था
मेरा मुरझाया चेहरा
जबकि
कहा जा रहा है
तुम्हारे संस्कार नहीं हैं
पर्यावरण के अनुकूल
तुम्हारा चूल्हा
प्रदूषित कर रहा है
तीसरी दुनिया को

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पहली और
दूसरी दुनिया के लोग
एक जुट हो रहे हैं
हो रहे हैं बड़े बड़े सम्मेलन
तुम्हारे चूल्हे पर
तुम्हारे चूल्हे के ईंधन पर
हो रहे हैं तरह तरह के शोध
मापे जा रहे हैं
कार्बन के निशान
तुम्हारे घर आँगन की
हवाओं में

वातानुकूलित कक्षों में
हो रही है जोरदार बहसें
कहा जा रहा है कि
तुम प्रदूषित कर रही हो
अपनी धरती
गर्म कर रही हो
विश्व को
और तुम्हारे चूल्हे की ओर से बोलने वाले
घिघियाते से प्रतीत होते हैं
प्रायोजित से लग रहे हैं
शोध अनुसन्धान
और तम्हारे चूल्हे के प्रतिनिधि भी

माँ!
मौन हैं सब
यह जानते हुए कि
जीवन भर जितने पत्ते और टहनियां जलाओगी तुम,
उतना कार्बन
एक भवन के केन्द्रीयकृत वातानुकूलित यन्त्र से
उत्सर्जित होगा कुछ ही घंटे में

वे लोग छुपा रहे हैं
तुमसे तथ्य भी
नहीं बता रहे कि
तुम्हारा चूल्हा
कार्बन न्यूट्रल है
क्योंकि यदि तुम्हारे चूल्हे में
जलावन न भी जले फिर भी
कार्बन उत्सर्जन तो होगा ही
लकड़ियों से
बस उसकी गति होगी
थोड़ी कम
और तुम्हारा ईंधन तो
घरेलू है,
उगाया जा सकता है
आयात करने की ज़रूरत नहीं

लेकिन बंद होना है
तुम्हारे चूल्हे को
तुम्हारे अपने ईंधन को
और जला दी जाएगी
तुम्हारी आत्मनिर्भरता
तुम्हारे चूल्हे के साथ ही

माँ! एक दिन
नहीं रहेगा तुम्हारा चूल्हा!

Illustration: Pinterest

Tags: Aaj ki KavitaArun Chandra RoyArun Chandra Roy PoetryHindi KavitaHindi KavitayeinHindi KavitayenHindi PoemJyoti Parv PrakashanKavitaMaa Tumhar Choolah by Arun Chandra Royअरुण चन्द्र रॉयअरुण चन्द्र रॉय की कविताआज की कविताकविताज्योति पर्व प्रकाशनमाँ तुम्हारा चूल्हाहिंदी कविता
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