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ओए अफ़लातून
Home बुक क्लब कविताएं

पिता का चश्मा: मंगलेश डबराल की कविता

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
December 19, 2022
in कविताएं, बुक क्लब
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Mangalesh-Dabral_Kavita
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कहते हैं बुढ़ापा भी एक तरह का बचपना होता है. पिता के चश्मे को माध्यम बनाकर लिखी गई यह कविता उसी बुढ़ापेवाले बचपने को दिखाती है, साथ ही एक पिता और पुत्र के भावनात्मक संबंध को भी.

बुढ़ापे के समय पिता के चश्मे एक-एक कर बेकार होते गए
आंख के कई डॉक्टरों को दिखाया विशेषज्ञों के पास गए
अन्त में सबने कहा-आपकी आंखों का अब कोई इलाज नहीं है
जहां चीज़ों की तस्वीर बनती है आंख में
वहां ख़ून का जाना बन्द हो गया है
कहकर उन्होंने कोई भारी-भरकम नाम बताया

पिता को कभी यक़ीन नहीं आया
नए-पुराने जो भी चश्मे उन्होंने जमा किए थे
सभी को बदल-बदल कर पहनते
आतशी शीशा भी सिर्फ़ कुछ देर अख़बार पढ़ने में मददगार था
एक दिन उन्होंने कहा-मुझे ऐसे कुछ चश्मे लाकर दो
जो फ़ुटपाथों पर बिकते हैं
उन्हें समझाना कठिन था कि वे चश्मे बच्चों के लिए होते हैं
और बड़ों के काम नहीं आते

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पिता के आख़िरी समय में जब मैं घर गया
तो उन्होंने कहा-संसार छोड़ते हुए मुझे अब कोई दुःख नहीं है
तुमने हालांकि घर की बहुत कम सुध ली
लेकिन मेरा इलाज देखभाल सब अच्छे से करते रहे
बस यही एक हसरत रह गई
कि तुम मेरे लिए फुटपाथ पर बिकने वाले चश्मे ले आते
तो उनमें से कोई न कोई ज़रूर मेरी आंखों पर फ़िट हो जाता

Illustration: Pinterest

Tags: Aaj ki KavitaHindi KavitaHindi PoemKavitaMangalesh DabralMangalesh Dabral PoetryPita ka chashma by Mangalesh Dabralआज की कविताकवितापिता का चश्मापिता का चश्मा मंगलेश डबरालमंगलेश डबरालमंगलेश डबराल की कविताहिंदी कविता
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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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