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ओए अफ़लातून
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नई पीढ़ी के क़िस्से – रंगे सियार की कहानी: भावना प्रकाश

भावना प्रकाश by भावना प्रकाश
April 23, 2026
in ज़रूर पढ़ें, नई कहानियां, बुक क्लब
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नई पीढ़ी के क़िस्से – रंगे सियार की कहानी: भावना प्रकाश
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दोस्तो, आप सबने रंगे सियार की कहानी तो सुनी ही होगी. और ये भी पता होगा ही कि पंचतंत्र की कहानियां सिर्फ़ बच्चों के लिए नहीं हैं, इनमें मानव मन की विसंगतियों और उसके कारण होने वाले समाज के उत्थान पतन के गहरे रहस्य छिपे हैं. रंगे सियार की जो कहानी आपने पंचतंत्र की कहानियों में पढ़ी होगी, दौर बदला तो वो कहानी किस तरह बदल गई, ये आप जानेंगे इस कहानी में…

तो हुआ ये था कि एक बार एक सियार गलती से उस ड्रम में गिर गया था, जिसमें कपड़े रंगने के लिए नीला रंग तैयार किया जा रहा था. जब जानवरों ने नीले सियार को देखा तो उसे पहचान न सके और उसे परमात्मा का भेजा फ़रिश्ता समझकर बहुत सम्मान देने लगे. सियार ने इसका फ़ायदा उठाया और इशारों से उनकी गलतफ़हमी को इतना बढ़ा-चढ़ा दिया कि चढ़ावे और सम्मान से उसके वारे-न्यारे होने लगे. पर एक दिन वो गलती से बोल दिया और जानवरों को उसकी बोली से उसकी सच्चाई पता चल गई. मुर्गे बाबा द्वारा ये ख़बर पूरे जंगल तक पहुंची और सबने मिलकर उसे जंगल से बाहर भगा दिया.

अब आते हैं पीढ़ियों बाद के जंगल में. एक बार फिर सियार रंग के टब में गिर पड़ा. पूरा रंगने के बाद जब वो जंगल में पहुंचा तो उसे देखकर चकित कुछ छोटे जानवर उसके आगे सिर झुकाने लगे. कुछ बड़े जानवर भी उसे कोई नया ख़तरनाक जानवर समझकर डरने लगे. सियार का मन तो अपने भाग्य पर बल्लियों उछलने लगा. पर उसने सुन रखा था कि गलती से अपने साथियों के सुर में सुर मिलाकर बोलने लगने के कारण पीढ़ियों पहले वाले सियार को अंधभक्तों द्वारा चढ़ावे में मिलने वाली स्वादिष्ट मिठाइयों, उपहारों के साथ सम्म्मान से भी हाथ धोना पड़ा था.

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कितने दिन वो बिना बोले रह पाएगा? और बोलने के बाद तो उसका पहचान लिया जाना निश्चित है. मुर्गे बाबा से सुबह होने की सूचना के साथ ये सूचना भी चिड़ियों और बंदरों तक पहुंचेगी. फिर उनकी सम्मिलित चहचहाहट से पूरे जंगल के जानवरों तक. फिर सब मिलकर…जानवरों को ज्यादा दिन तक बेवकूफ़ नहीं बनाया जा सकता और बिना बेवकूफ़ बनाए ये सम्मान जारी कैसे रहे?

एक दिन सियार इसी उधेड़बुन में चला जा रहा था कि रास्ते में उसे लकड़बग्घा मिला. वो उसे एक पल में पहचान गया. बजाय दूसरे जानवरों की तरह झुककर प्रणाम करने या डरने के उसने सीधे प्रश्न दागा. और कहो सियार भाई. क्या-क्या मलाई काट रहे हो आजकल? एक पल को तो सियार हकला गया पर जल्द ही वो लकड़बग्घे का इशारा समझ गया. और फिर दोनों के शातिर इरादे जल्द ही हाथ मिलाकर मुस्कुरा उठे.

अगले दिन से ही फ़रिश्ते रूपी सियार की कृपा मुर्गे बाबा को मिलने लगी. सियार चढ़ावे में आई मिठाइयां और उपहार मुर्गे बाबा के लिए ले जाता और उसे सौ-सौ आशीर्वाद देकर आता. लकड़बग्घा बना फ़रिश्ते रूपी सियार का परम भक्त. उसने अपने भगवान का गुणगान बंदरों और चिड़ियाओं से नित नए उपहारों के साथ करना शुरू कर दिया.

फिर क्या था! पूरे जंगल में फ़रिश्ते रूपी सियार के गौरव गान का प्रसार हो गया. रोज़ सुबह बांग के साथ सियार के निश्छल, निष्कप्ट, जानवरों के उद्धारक और उनके शुभचिंतक होने का सुबूत देती कोई मनगढ़ंत कहानी सुनाई जाती. कहानी इतनी रोचक होती कि जानवरों की बांग सुनने में रुचि बढ़ने लगी. जो जानवर सुबह नहीं भी जगते थे, वो कहानी के लालच में बांग सुनकर जगने लगे. सियार की प्रतिष्ठा दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जाती. उसके और लकड़बग्घे के महल की रौनक भी उसी अनुपात में बढ़ती जाती. श्रद्धा भरे मनो की भूख पूरी हो गई थी. उन्हें एक जीवंत ईश्वर मिल गया था.

फिर एक दिन वही हुआ जो होना था. रात में सियारों के झुंड ने चिल्लाना शुरू किया. अपनी आदत से मजबूर रंगा सियार भी उनकी आवाज़ में आवाज़ मिलाकर चिल्लाने लगा. उसकी शोभाहीन, गरिमाहीन आवाज़ बहुत से जानवरों के कानों तक पहुंची और उन्होंने सियार को पहचान लिया. जंगल के अच्छे नागरिक का कर्तव्य निभाते हुए उन्होंने ये सूचना तुरंत मुर्गे बाबा को दी. पर मुर्गे को सियार के फ़रिश्ता होने पर पूर्ण विश्वास हो चुका था. उसने उन जानवरों की बात अनसुनी कर दी.

अगले दिन जब ये सूचना सुबह की बांग के साथ जंगल की हवाओं में नहीं गूंजी तो उन जानवरों को बड़ा आश्चर्य हुआ. वे दोबारा मुर्गे बाबा के यहां गए. पर मुर्गे बाबा का वो टीला देखकर हतप्रभ रह गए, जिस पर बैठकर वो सुबह-सुबह बांग दिया करते थे. वो साधारण-सा टीला अब शानदार स्टूडियो में तब्दील हो चुका था. उससे लगा हुआ बना था मुर्गे बाबा का आलीशान बंगला, जिसमें सियार के दिए उपहारों का ढेर लगा था. लकड़बग्घे की शान भी किसी से छिपी नहीं रही.

निराश जानवर बंदरों और चिड़ियाओं के पास गए. उन्होंने दो टूक उत्तर दिया कि हम तो केवल मुर्गे बाबा की बात को प्रतिध्वनित करते हैं. हमारा अपना तो कोई अस्तित्व है ही नहीं.

सियार ने सब कुछ देखा सुना तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा. उसे अब बोलने से पहले सावधान रहने की भी ज़रूरत नहीं थी.
ज़्यादातर जानवर सियार के अंध-भक्त बन चुके थे. उनके सामने सियार बाक़ी सियारों की तरह अनर्गल प्रलाप शुरू भी कर दें तो उन्हें कोई फ़रक नहीं पड़ने वाला था. थोड़े से जानवर ऐसे भी थे, जो समझ गए थे कि सिर्फ़ एक प्राणी, मुर्गे बाबा के लालच के कारण अब धूर्त सियार की असलियत कभी सामने नहीं आएगी. जानवर अपने ख़ून-पसीने की कमाई चढ़ावे में यों ही चढ़ाते रहेंगे. वो इस निराशा में चुप बैठ गए थे, कि हम कर ही क्या सकते हैं! और वो, जो सियार की असलियत सामने लाने का प्रयास अभी भी कर रहे थे? उनकी संख्या तो उंगलियों पर गिनी जा सकती थी. उनसे सियार को कोई ख़तरा न था. उन्हें तो जब चाहे जंगलद्रोही साबित कर अपने रास्ते से हटाना अब उसके बाएं हाथ का खेल था.

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भावना प्रकाश

भावना प्रकाश

भावना, हिंदी साहित्य में पोस्ट ग्रैजुएट हैं. उन्होंने 10 वर्षों तक अध्यापन का कार्य किया है. उन्हें बचपन से ही लेखन, थिएटर और नृत्य का शौक़ रहा है. उन्होंने कई नृत्यनाटिकाओं, नुक्कड़ नाटकों और नाटकों में न सिर्फ़ ख़ुद भाग लिया है, बल्कि अध्यापन के दौरान बच्चों को भी इनमें शामिल किया, प्रोत्साहित किया. उनकी कहानियां और आलेख नामचीन पत्र-पत्रिकाओं में न सिर्फ़ प्रकाशित, बल्कि पुरस्कृत भी होते रहे हैं. लेखन और शिक्षा दोनों ही क्षेत्रों में प्राप्त कई पुरस्कारों में उनके दिल क़रीब है शिक्षा के क्षेत्र में नवीन प्रयोगों को लागू करने पर छात्रों में आए उल्लेखनीय सकारात्मक बदलावों के लिए मिला पुरस्कार. फ़िलहाल वे स्वतंत्र लेखन कर रही हैं और उन्होंने बच्चों को हिंदी सिखाने के लिए अपना यूट्यूब चैनल भी बनाया है.

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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