व्यंग्य कथा चुटीली हो तो सार्थक लगती है और यदि चुटीली होने के साथ-साथ सामयिक हो तो सार्थक होने के साथ ही मारक हो जाती है. और कहीं इनके साथ-साथ आपको आंखें खोलने पर मजबूर कर दे तो पूरी तरह सफल हो जाती है. जब आप इसे पढ़ेंगे तो ख़ुद ही जान लेंगे कि इस व्यंग्य कथा में ये तीनों ख़ूबियां हैं.
बहुत पुरानी बात है, एक था राजा, बड़ा ही अच्छा. उसके राज्य में कोई बहुत ग़रीब न था. खेती अच्छी होती थी. नहीं, नहीं, किसी काल्पनिक सतयुग की बातें नहीं कर रही हूं. ऐसा नहीं था कि सारे लोग बेड़े भले थे, सब अमीर थे, सब आदर्श थे. पर हां, क्योंकि राजा, राज्य का मुखिया नेक और जागरूक था, प्रशासनिक कामों में एक्स्पर्ट था, राज्य चलाने को अपना हक़ नहीं ज़िम्मेदारी समझता था इसलिए उसके नीचे और उनके नीचे के ज़्यादातर लोग भी ईमानदार थे. जो नहीं भी थे, वो राजा के डर से खुलकर बेईमानी नहीं कर पाते. फिर भी बेईमान लोग चालाकी से बाज़ नहीं आते. वो घोटाले भी करते और प्रजा को परेशान भी. अपराध भी होते और अपराधी बचकर निकलने की कोशिश भी करते. जैसा कि हर जगह होता है, कुछ प्रजाजन, कुछ ऊंचे पदों पर बैठे लोग यहां तक कि राजा के अपने मंत्रिमंडल में भी कुछ लोग बेहद स्वार्थी, लालची और चालाक थे.
पर प्रजा जागरूक थी इसलिए गड़बड़ियों की शिकायतें तुरंत होतीं. राजा के डर से सुनवाई भी ज्यादातर तुरंत और अक्सर निष्पक्ष ही होती. प्रजा के जागरूक होने के पीछे भी राजा की दो बुद्धिमान पहल थीं. एक तो उसने एक रिवाज़ शुरू किया था- डिबेट का. वाद-विवाद का, बहस का. दूसरे- पढ़ाई को ज़रूरी कर दिया था. क़ानून के अनुसार कोई अपने बच्चे को अनपढ़ नहीं रख सकता था. समय-समय पर राज्य में बहसें आयोजित की जातीं, जिनमें कोई भी भाग ले सकता था. बहस का विषय प्रसारित करवा दिया जाता. फिर निश्चित दिन इच्छुक लोग तैयारी करके आते पक्ष और विपक्ष पर बात होती. दर्शकों की भीड़ में से भी कोई भी, कुछ भी बोल सकता था. बहस के विषय राज्य की उन्नति से संबंधित होते, जैसे– ‘जमा टैक्स को उन्नति के किस काम में ख़र्च किया जाए’, ‘कौन-सा क़ानून सही है और कौन-सा बदलने की ज़रूरत है’ वगैरह.
तीन महीने में एक दिन खजांची राज्य की आमदनी; वसूले गए टैक्स का लेखा-जोखा बताने आता. उस दिन बहसों के निष्कर्ष में निकली बातों पर फ़ाइनल चर्चा होती– ‘कौन-से काम ज़रूरी हैं, कौन-से गैर-ज़रूरी’, ‘किस वर्ग को किस काम की ज़िम्मेदारी दी जाए.’
लेकिन दुख की बात ये थी कि राजा की कोई संतान न थी. उम्र बढ़ने के साथ उसे वारिस की चिंता हुई तो उसने फ़ैसला सुनाया कि अगला राजा जनता ही तय करेगी. बहस के विषय में उम्मीदवार होंगे और चुनाव सबकी सहमति से होगा.
पर जैसा कि होता आया है, धूर्तता हमेशा बुद्धिमानी से ज्यादा तेज़ चलती है. राज्य के धूर्त और लालची लोगों ने अपनी छवि प्रजा की नज़र में अच्छी बनानी शुरू कर दी. राजा को भनक लग गई तो उसने बहस को क़ानून बना दिया और मरने से पहले प्रजा से भावुक अपील की कि बहस की परम्परा को कभी न तोड़ें और उसी के ज़रिए सारे फ़ैसले हों.
राजा मर गया और प्रजा ने अपने राजा की अंतिम इच्छा का सम्मान किया. प्रजातांत्रिक ढंग से नया राजा चुना गया. लेकिन लोग इस बात से पूरी तरह अनजान थे कि जिसे उन्होंने चुना है, उसने कितनी धूर्तता से उनकी नज़र में अपनी अच्छी छवि बनाई है. अब जैसा राजा, वैसी प्रजा. जल्द ही जितना हो सका मंत्रिमंडल और ऊंचे पदों पर उसने अपने साथियों को बैठा दिया.
पर फिर भी वे अपने लालच को पूरा नहीं कर पा रहे थे. सिर्फ़ एक बहस के कानून के कारण राजा ने प्रजा को इतना सतर्क, शिक्षित और जागरूक बना दिया था कि वे टैक्स द्वारा एकत्र धन के बंटवारे से लेकर नए क़ानूनो तक सभी पर अच्छी बहस करके सही नतीजे पर पहुंचते थे और राजा को वैसा ही करना पड़ता था.
अब राजा और उसके साथी परेशान! वो लोगों के हाथ की कठपुतली बनकर प्रशासनिक कामो में मगजमारी करने तो नहीं आए थे. उनका मकसद था राज्य की संपदा को हड़पना और अपने लिए सुख भोग के साधन इकट्ठा करना. तो वो आइडिया सोचते रहते.
एक दिन राजा का सबसे धूर्त मंत्री कुढ़ता हुआ अपने महल में टहल रहा था कि उसकी नज़र अपने कुल देवता की तस्वीर पर पड़ी. उन दिनों पूजा स्थल नहीं हुआ करते थे. सब अपने घरों में एक पूजा का कमरा बनाते थे, जिसमें उनके कुल देवता की तस्वीर होती थी. ये तस्वीर प्रायः सभी कुनबों की अलग-अलग ही होती थी. तस्वीर पर नज़र पड़ते ही उसे एक आइडिया आया.
बहस का अगला मुद्दा तय हो चुका था. गलियों में डुगडुगी वालों फरमान सुनाया- नगर के बीचोंबीच बने बाग के बीच में बने पानी के फव्वारे पर राज्य में सबसे ज़्यादा पूजे जाने वाले या सबसे प्रभावी कुल देवता की मूर्ति लगाए जाने का फ़ैसला किया गया है. बहस में हमें निर्णय लेना है कि वो कुल देवता कौन हों?
तय दिन पर बहस शुरू हुई. सभी को अपने कुल देवता सबसे प्रभावी लग रहे थे. धीरे-धीरे ये अब तक की सबसे ज़ोररदार बहस बन गई. फ़ैसला कुछ न हो सका और ऐलान हुआ कि फ़ैसला न होने के कारण बहस का अगला मुद्दा भी यही होगा. तब तक लोग अपने-अपने तर्क और आंकड़े तैयार कर लें. फिर क्या था? हर गली में हर कूचे में, हर मोड़ पर यही बहस होने लगी कि किसका कुल देवता सबसे प्रभावी है.
बहुत से समझदार लोगों के ये चाल तुरंत समझ आ गई. उनमें से एक ने अगली पब्लिक मीटिंग में अपना पर्चा पढ़ना शुरू किया– “हमें फ़र्क़ नहीं पड़ता. किसी कुलदेवता की मूर्ति लगाओ या किसी फूल की मूर्ति लगा दो. हमें टैक्स का धन के उपयोग के बारे में बात करनी है.” पर जैसा कि होता आया है, धूर्तता हमेशा बुद्धिमानी से ज़्यादा दबंग और आक्रामक होती है. राजा की मंडली पहले से तयार थी. उन्होंने लोगों की भावनाओं को भड़काते हुए कहा– “शायद आपके कुल देवता उनमें से हैं, जिनकी पूजा केवल एक कुनबे में होती है. आपके पक्ष में तो बस वही लोग होंगे जिनके कुल देवता की मूर्ति लग पाने की संभावना बिल्कुल नहीं है.” “और फिर ये क़ानून है कि जब तक एक मसला हल न हो जाए, दूसरा शुरू न हो.” दूसरे पदाधिकारी के ये बोलने के साथ ही राजा के भक्त हो चुके प्रजाजनों ने समर्थन में इतना ज़बरदस्त शोर शुरू कर दिया कि उसके बाद किसी की आवाज़ सुनाई ही नहीं पड़ी.
उस दिन ही नहीं, उस दिन के बाद उस नगर में कोई भी बुद्धिमान, संजीदा, सतर्क और शालीन ढंग से बोली जाने वाली आवाज़ कभी सुनाई नहीं दी. बहस के लिए कोई और विषय नहीं उठा. कुलदेवता वाला मसला हल ही नहीं हुआ था कि दूसरा मुद्दा उठाया जाता. समय के परे उस नगर में आज भी प्रजा अपने कुल-देवता का प्रभाव और उनके पूजे जाने की अधिकता साबित करने में लगी है और धूर्त राजा और उसके सहयोगी अपनी तिजोरियां भरने में.







