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Home ज़रूर पढ़ें

फ़िक्शन अफ़लातून#1 त्रिलोकी की दुल्हन (लेखिका: डॉक्टर संगीता झा)

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
March 1, 2023
in ज़रूर पढ़ें, नई कहानियां, बुक क्लब
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Fiction_Aflatoon_Dr-Sangeeta-Jha
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 कई बार हम अपने मन में कुछ बातें बिठा लेते हैं, पूर्वधारणाएं बना लेते हैं. लेकिन जब व्यावहारिक स्थिति से पाला पड़ता है तो समझ में आता है कि हमारी सोच तो पूरी तरह निराधार थी. इस भाव को झलकाती हुई कहानी. 

बचपन से आलोक, मयंक, रितेश ऐसे नाम सुनने की ही आदत थी. ख़ुद का नाम ज़माने से अलग निमिशा, भाईयों के नाम विहान और आहान हैं. मां तक का नाम शशि और पापा का नाम शरद है. स्कूल में सारे टीचर्स पूछते ये निमिशा कैसा नाम है? वो बताती कि निमिशा का अर्थ है क्षणिक और आंखों का जगमगाना. जिस परिवार में बच्चों के नाम इतने सोच कर रखे जाते हों उस परिवार का दामाद है, त्रिलोकी लाल.

निमिशा अपनी लॉ की पढ़ाई ख़त्म कर अपनी वकालत की प्रैक्टिस करना चाहती थी. मां पापा को बेटी के ब्याह की भी बड़ी चिंता थी. रहते तो वो लोग महानगर लखनऊ में पर अपनी सोच महानगर में लाने की बजाए अपने छोटे से बिहार के गांव सरहिल्ला को ही लखनऊ ले आए थे. निमिशा की दोनों बुआओं ने बिरादरी के बाहर अपने मन से प्रेम विवाह किया था इससे पापा चाहते थे कि बेटी का विवाह किसी सजातीय लड़के से हो. सारी सहेलियों के पति राकेश, प्रदीप, संदीप जैसे नाम वाले ही थे. निमिशा के लिए घर वालों ने शादी डॉट कॉम में इश्तहार दिया. एक लड़के पर आकर मां और पापा दोनों ही अटक गए. आईआईटी, आईआईएम का ठप्पा और एक बड़ी आईटी कंपनी में नौकरी और क्या चाहिए एक लड़की को? मां पापा को भी इतने योग्य लड़के का त्रिलोकी लाल चौधरी नाम खटका, लेकिन किसी तरह उनकी योग्यता देख मन को मना लिया. दोनों इसी उधेड़बुन में लगे रहे कि निमि को नाम बताएं तो बताएं कैसे? वो तो नाम सुनते ही कूद जाएगी, बाक़ी ख़ूबियां तो धरी की धरी रह जाएंगी.

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मां ने सुझाव दिया अभी उसे टी एल चौधरी बता देंगे. त्रिलोकी के पिता का नाम अनोखे लाल और मां दुलारी देवी था. ठीक निमि के परिवार की तरह वहां भी दो भाई और एक बहन थी. भाई का नाम बांके बिहारी और बहन का नाम गंगा देवी था. त्रिलोकी का परिवार बिहार के ही एक क़स्बे सकरी से था, जहां पिता की ईंटे की भट्टी थी साथ ही पुश्तैनी खेती भी थी. खाने पीने की कोई कमी ना थी पर अनोखे लाल जी को मलाल था कि वो ख़ुद पढ़ नहीं सके थे इसलिए उन्होंने तीनो बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया था. दोनों भाईयों ने पहली ही बार में आईआईटी क्रैक कर लिया और बेटी ने भी पटना साइंस कॉलेज से एमएससी कर लिया था. पढ़ाई में सभी बहुत आगे थे, लेकिन दुनियादारी की दौड़ में बहुत पीछे. कपड़ा को कपरा और शीला को सिला, विवेक को बीबेक उच्चारण करते जो किसी भी लखनऊ शहर की लड़की को नागवार गुज़रता. फिर यहां निमि तो थोड़ी ज़्यादा ही स्नॉबिश थी. पापा-मां बड़े असमंजस में थे. कई बार सोच इस टीएल को छोड़ कोई और लड़का देखें, लेकिन फिर आकर उसी पर अटक जाते.

इसी बीच निमि ने शहर के एक मशहूर वकील कमाल साहेब को बतौर इंटर्न जॉइन कर लिया. वहां उनके बेटे दानिश से, जो अपने पापा की फ़र्म में जूनियर एडवोकेट था, से निमि की दोस्ती हो गई. घर आकर वो सिर्फ़ दानिश सर की बातें करतीआज- दानिश सर ने ब्लू डेनिम पहनी थी, कभी कहती आज दानिश सर ने बहुत ही अच्छा पिज़्ज़ा खिलाया.

भाई कहता, “तू ना अपने दानिश सर को अपनी लॉ फ़र्म में ही छोड़ आया कर.”

पापा चुपचाप देखते और सहकर्मी तो सहकर्मी होते हैं सोच चुप्पी साध लेते और मां की ओर देखते. मां भी कुछ नहीं बोलती, पर बड़ी देर सोचती. आए दिन टीवी पर लव जिहाद के वाकये चिल्ला-चिल्ला कर दिखाए जाते. निमि देख कर ज़ोर से चिल्लाती, “बुलशिट! क्लोज़ दी टीवी. आप लोग भी ना कहां से ढूंढ़ ढूंढ़ कर बकवास चेनल देखते हैं! ये लोग टीआरपी बढ़ाने के लिए हर हिंदू म-स्लिम के बीच के कनेक्शन को एक्स्ट्रापोलेट कर लव जिहाद का नाम देते हैं. और आप जैसे लोग उनके फ़ैन्स हैं…“

उसका ये रिऐक्शन मां पापा दोनो को परेशान कर देता कि कहीं इसका और दानिश का कोई चक्कर तो नहीं. पापा-मां दोनों ने ही मन ही मन सोचा कि निमि उन्हें कोई शॉकिंग न्यूज़ सुनाए, उसके पहले ही वो उसे सर्प्राइज़ दे दें. त्रिलोकी का ज़िक्र जब बेटों से किया दोनों एक साथ चिल्लाए, “त्रिलोकी! बाप रे… हमारा बहनोई? मना करो आप लोग.“

पापा ने कहा, “नाम पर मत जाओ. अरे दिखने में बड़ा हैंडसम और आईआईटी, आईआईएम का टैग. इतने संस्कारी लड़के मिलते कहां हैं?“

भाई चिल्लाए, “आप लोग भी ना… जैलसिंग राष्ट्रपति थे, इट डज़ नॉट मीन मैं उसे बहनोई बना लूंगा. जब उसका नाम हमें ही इरीटेट कर रहा है तो फिर बेचारी निमि…”

मां-बाप बेचारे तो चुप्पी लगा गए. थोड़ा सा युद्ध विराम. तभी एक रात विहान ने खिड़की से देखा कि दानिश सर अपनी जूनियर निमि को घर ड्रॉप करने आए हैं. दोनों साथ बड़े ख़ुश लग रहे थे. दानिश ने ख़ुद उतर निमि के साइड का कार का डोर खोल उसे बड़े प्यार से नीचे उतारा और दोनों एक दूसरे से विदा ली. विहान के पूछने पर निमि ने बड़ी कैज़ुअली जवाब दिया, “अरे भाई, ऑफ़िस में देर हो गई. थैंक गॉड, वो तो दानिश सर ने घर छोड़ने की पेशकश की जो मैंने तुरंत मान ली. इतनी रात को कहां कैब ढूंढ़ती… एनी प्रॉब्लम?”

विहान चुप रहा. लेकिन उस दिन के बाद ये वाकये रोज़ होने लगे. कभी पापा तो कभी मां और कभी भाईयों का माथा ठनकने लगा. कभी कैब ना ढूंढ़ पाने का बहाना तो कभी दानिश के किसी क्लाइंट का पड़ोस में होना.

अब घर पर पापा-मां और दोनों भाइयों की एक सीक्रेट मीटिंग हुई. सबकी यही राय थी कि इसके पहले कोई अनहोनी हो निमि के हाथ पीले कर दिए जाएं. हाथ में जो रिश्ते थे उसमे सबसे अच्छा ये त्रिलोकी लाल का ही था. भइयों को भी नाम पसंद नहीं था, पर यहां तो बहन की शादी करने की जल्दी थी. केवल नाम की परेशानी थी, बाक़ी सारी चीज़ें, मसलन लड़के की नौकरी, एजुकेशन और ख़ानदान सब बेमिसाल थे. सबने मिलकर निर्णय लिया कि निमि को उसका नाम टी एल चौधरी ही बताया जाएगा और सब उसे टी एल ही पुकारेंगे. पहले सब निमि से लड़के के गोल्ड मैडल पाने,आईआईटी, आईआईएम और नौकरी की चर्चा करेंगे और आख़िरी में नाम बताएंगे और नाम भी टीएल ही बताएंगे. सबको फिर भी डर था कि निमि अभी शादी के लिए नहीं मानेगी. करियर और सेटल होने की बात करेगी. छोटे भाई ने सलाह दी कि निमि की कमज़ोरी हैं पिता श्री. केवल पापा ही चेस्ट पेन की शिकायत कर निमि को कुछ भी करने के लिए मना सकते हैं. उसके इस सुझाव को सबने बचकाना सुझाव कह मानने से इनकार कर दिया.

मां ने निमि को शादी के लिए तैयार करने का ज़िम्मा लिया. शाम को बड़े प्यार से निमि के कमरे में पहुंच भूमिका बांधी, “ बेटा जब तेरे उम्र की मैं थी तू मेरे साथ थी. मेरी भी यही इच्छा है कि तेरे भी हाथ पीले करूं और चैन कि सांस लूं.“

निमि गुर्राई, “आर यू मैड? आपके मां बाप ने ग़लती की और आपकी ज़िंदगी अज़ाब की और आप भी वही दोहराना चाहती हैं? मेरी पूरी ज़िंदगी का सवाल है, मैं कुछ करना चाहती हूं. अभी मैंने केसेस लेने शुरू किए हैं. सीनियर सर भी मेरी तारीफ़ करते हैं. और आप लोग मुझे खूंटे से बांधना चाहते हैं?”

मां चुप रह गई पर जब भी ज़िक्र छेड़ा वैसा ही जवाब पाया. बेचारी मां को अपना ज़माना याद आया, जब वे इंटर में फ़र्स्ट क्लास में पास हुईं थीं, तब दादी ने ख़ुशी के बदले पूरे घर में शोर मचाया था, “लड़की की जात तो पतंग सी होती है, जितनी छूट दोगे उतनी उड़ेगी फिर कहीं जा गिरेगी. मुंह काला करवाना है तो बेटी को पढ़ाओ. कोई लड़की की पढ़ाई नहीं देखता सब उसकी सूरत और सीरत यानी रोटी बनानी आती है, सब्ज़ी बनानी आती है, यही देखते हैं. उस पर काम करो. कॉलेज भेजने की बात तो सोचना ही नहीं.“फिर सचमुच शरद जी को ढूंढ़ उनका ब्याह कर दिया गया. क्या वही सब की पुनरावृत्ति तो नहीं हो रही है?

फिर मन को ढांढ़स दिया ना वो तो केवल उन्नीस साल की थीं और यहां निमि तेइस की और पति के दिल की खटास भी मायने रखती थी. इसलिए उनके अन्दर भी बरसों पुरानी अपनी अम्मा की सोच घुस गई कि बेटियां पराई होती हैं. जितने जल्दी अपने असली घर जाएं उतना अच्छा. अनजाने में अपनी प्यारी निमि को पतंग ही मान लिया. फिर सबने मिल कर छोटे बेटे द्वारा सुझाई तरक़ीब ही अपनाने की सोची.

पापा के डॉक्टर दोस्त की मदद ले पापा को एक हार्ट अस्पताल में एडमिट कराया गया. निमि सब कुछ छोड़ अस्पताल पहुंच गई. पापा से लिपट कर रोने लगी. पापा ने बेटी के सपने मांग लिए और फिर प्लान के अनुसार बेचारी आख़िरकार त्रिलोकी की दुल्हनिया बन ही गई.

शादी के दो दिन पहले तक निमि को शादी से कोई सरोकार न था इसीलिए उसके लिए भी उसका विवाह टी एल चौधरी से हो रहा था, जो बैंगलोर शहर में सॉफ़्टवेयर इंजीनियर था. कार्ड पर भी लड़के का नाम टी एल चौधरी सन ऑफ़ ए एल चौधरी ही लिखा गया. जब नाम मालूम चला तो बेचारी… क्या करे? निमि के मन में एक घटिया सोच ने जन्म लिया कि चुपचाप अभी तो शादी कर ली जाए फिर आजकल तो तलाक़ भी लोग ले ही रहे हैं.

विवाह की वेदिका पर बैठ बड़े आराम से सारी रस्में भी पूरी कर लीं . सचमुच मंत्रों में कितनी शक्ति होती है पहली बार जाना. सप्तपदी, सिंदूर दान सबकुछ एक लड़की को कितना बदल देता है. फिर वही शैतानी सोच सामने आ गई कि उसे इन सब संस्कारों से छूटकारा पाना है. उसे विदा करते हुए परिवार रो रहा था. मां तो लगभग बेहोश ही हो गई थीं.

निमि ने सोचा इतना ही रोना था तो फिर ये शादी किसलिए? ससुराल पहुंची तो पूरे घर के लोग शोर मचाने लगे, “त्रिलोकी की दुल्हनिया आ गई, बड़ी वकील है नखलउ (लखनऊ) में.“

वह मन ही मन हंसने लगी, ‘मैं और मिसेज़ त्रिलोकी हे हे देखते जाओ… दो दिन में फ़ुर्र…’

अचानक इसी सब्ज़बाग के बीच ज़ोर से हाथ हिलाया और सचमुच फुर्र सी स्थिति हो गई और निमि नीचे गिर गई. जब होश आया तो अपने को अस्पताल में पाया और सिरहाने पर त्रिलोकी जी को बैठे पाया, जिसे उसने शादी के पहले देखने से भी इंकार किया था. सामने पापा-मां और भाई बदहवास से खड़े थे. त्रिलोकी सबको ढांढ़स दे रहे थे कि चिंता की कोई ज़रूरत नहीं है. बड़े प्यार से मां पापा से कह रहे थे, “अरे आप लोग जाइए, निमि अब मेरी ज़िम्मेदारी है. जब तक अस्पताल में है मैं देख लूंगा.“

निमि को तो पता ही नहीं था कि वो ख़ुद इतनी गंभीर रूप से इंजर्ड है उसने कहा, “माई फ़ुट! मैं और किसकी ज़िम्मेदारी? आई विल टेक केयर ऑफ़ माईसेल्फ़. किसी को मुझे देखने की ज़रूरत नहीं है.“

त्रिलोकी बोले, “धीरे, धीरे निमि तुम्हारे सारे रिब फ़्रैक्चर्ड हैं. कमर की हड्डी में चोट आई है. प्लीज़ डोंट मूव!”

निमि को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कहां शादी का मंडप फिर त्रिलोकी का गांव और अब ये अस्पताल.

त्रिलोकी पूरी तरह से अपनी दुल्हन की सेवा में जुट गए. अंत में त्रिलोकी की मेहनत कामयाब हुई और पूरे छह हफ़्तों बाद निमि चलने के क़ाबिल हुई. अब तक उन्हें भी मालूम चल गया था कि निमि ने उनसे शादी मजबूरी में की है, लेकिन इन छह हफ़्तों में निमि के दिलो-दिमाग़ पर त्रिलोकी पूरी तरह से छा गए थे.

निमि के चलने पर त्रिलोकी ने उससे कहा, “लो अब तुम आज़ाद हो. जहां चाहे जा सकती हो. तुम्हें तो शादी से एतराज़ था ना?”

निमि ने बड़े प्यार से उत्तर दिया, “मुझे तुमसे नहीं तुम्हारे नाम से परेशानी थी. लेकिन अब समझ आ गया कि नाम में क्या रखा है? मैं त्रिलोकी की दुल्हनिया बनने को तैयार हूं.”

त्रिलोकी ने ठहाका मारते हुए कहा, “सोच लो, बेटी हुई तो उसका नाम जमना देवी और बेटा हुआ तो उसका नाम राम प्रसाद रखूंगा.”

निमि ने हंसते-हंसते जवाब दिया, “मंज़ूर है, मंजूर है!”

और इस तरह मिस निमिशा त्रिलोकी की दुल्हन बन गई.

Illustration: Pinterest

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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