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सहमति से बने सेक्स संबंधों को, संबंध बिगड़ जाने पर क्या बलात्कार माना जाना चाहिए?

विनोद तिवारी by विनोद तिवारी
April 4, 2021
in नज़रिया, सुर्ख़ियों में
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सहमति से बने सेक्स संबंधों को, संबंध बिगड़ जाने पर क्या बलात्कार माना जाना चाहिए?
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मी टू के तहत हों या इससे इतर स्त्री-पुरुष के सेक्स संबंधों के सालों बाद दायर किए गए मामले हों, इन पर हमेशा देर से सवाल उठाए जाने पर सवाल पूछे जाते रहे हैं. जिस पर हमारे समाज की संरचना को देखते हुए महिलाओं के हिम्मत जुटाने में समय लगने की बात भी अपनी जगह सही है. पर कुछ और सच्चाइयों को नज़रअंदाज़ करना भी सही न होगा. इस मुद्दे पर जानिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद तिवारी का नज़रिया.

पिछले दिनों एक बहुत ख़ूबसूरत फिल्म आई थी, ‘आर्टिकल 376.’ नाम के अनुरूप विषय बड़ा नाज़ुक था, सहमति से स्थापित किए गए सेक्स संबंधों को, संबंध बिगड़ जाने पर क्या बलात्कार माना जाना चाहिए? प्रतिशोध और ईगो जैसी संवेदनाओं के परिपेक्ष्य में क़ानून की धाराओं और साक्ष्यों के विवेचन पर रची गई यह कविता जैसी रचना है, जिसमें अक्षय खन्ना और रिचा चढ्ढा के संयत, मैच्योर अभिनय ने चार चांद लगा दिए हैं.
फ़िल्म की तार्किक परिणति कुछ लोगों की समझ से परे जा सकती है. यह फ़िल्म देखते हुए मुझे कुछ साल पुराना वह वाक़या याद आ गया, जिसमें क़रीब ऐसे ही विषय वाली लगभग 50 साल पुरानी घटना के आधार पर मुक़दमा दाख़िल करने की कोशिश की गई थी.

तो आज इस पर कुछ कहा/लिखा क्यों जा रहा है? इसलिए कि बात समझ से कुछ परे चली गई थी. परे इसलिए कि जिस मसले को उछाला गया वह सेक्स संबंधों से जुड़ा कोई 50 साल पुराना ‘वाक़या’ था, जिसे पुराना अपराध कह कर सामने लाया गया. अब 50 साल बाद ऐसे `तथाकथित’ अपराधों के सुबूतों का कोई नामोनिशान बचा रह जाता है, यह तो फ़ोरेंसिक साइंस वाले भी नहीं मानते. ऊपर से यह अपराध शिमला के जिस होटल में किया गया बताया गया, उसका नाम तक मीडिया से छिपाने की कोशिश हुई. कोई न कोई वाजिब वजह होगी पुलिस के पास इसके लिए.
मामला नाज़ुक है. युवा महिला की इज्जत से जुड़ा है. कुछ समय पहले उसने शिमला पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि जब वह मात्र 18 वर्ष की थी, तब एक नामी अभिनेता ने, जो उसका रिश्तेदार है, उसकी इज़्ज़त पर हाथ डाला, उसका शीलभंग किया था इसलिए अब अभिनेता को उसके किए की सज़ा दी जानी चाहिए. यह घटना तब की है, जब आज 75 पार का, विवाहित, फिल्म जगत में सक्रिय दो जवान बच्चों का पिता, यह प्रतिष्ठित अभिनेता 28 साल का था और शिमला में किसी फ़िल्म की शूटिंग के लिए आया था. महिला ने यह बताया है कि वह उसी के साथ दिल्ली से आई थी और उसी के साथ होटल में उसी के कमरे में ठहरी थी और उसी के बेड के साथ वाले बैड पर सो रही थी. अभियोग यह है कि अभिनेता ने दोनों बेड्स को जोड़ कर एक कर लिया.
यहां यह स्पष्ट कर देना उचित है कि यह घटना बहुप्रचारित, `मी टू’ प्लैटफ़ॉर्म के ज़रिए नहीं आई. इसे इन्साफ़ मांगने का स्वतंत्र प्रयास बताया गया. नारियों के पक्ष में खड़े हो जाने वाले किन्हीं संगठनों के सामने न आने के बावजूद शिमला पुलिस ने मामला दर्ज कर, तहक़ीक़ात शुरू कर दी.

तहक़ीक़ात किस दिशा में जाएगी, वक़्त पर छोड़ दिया गया. वक़्त ऐसे नाज़ुक मामलों में बहुत महत्वपूर्ण रोल अदा करता है. इन्साफ़ सबूतों के आधार पर किया जाता है. यह बात अभियोग लगाने से पहले सोच ली गई होगी. कुछ और असहज सवाल भी उठ खड़े होंगे. पूछा जाएगा कि क्या यह मामला बदनाम कास्टिंग काउच का कोई नमूना था? या फिर अपने दौर का यह बेहद सफल और लोकप्रिय अभिनेता इस महिला को अगवा करके जबरन अपने साथ ले आया था या धोखा दे कर लाया था या किसी अन्य दबाव में उसे अपने साथ अपने कमरे में रहने को मजबूर किए हुए था! मसलन उसे हीरोइन बनवा देने का प्रॉमिस या उसके साथ शादी कर लेने का वचन या कहीं कोई प्रॉपर्टी ले देने की बात…
ऐसे वादों से उपजे विवाद पहले भी सामने आते रहे हैं. उस युवती की बात लोग अब तक भूले नहीं हैं, जिसने एक सफल फ़िल्म निर्देशक पर इस आधार पर मुकदमा दायर किया था कि निर्देशक ने कुछ वर्षों के दौरान, जब वह निरंतर उसके निकट संपर्क में थी, यह कह कर उसके साथ 16 बार बलात्कार किया कि वह उसे फ़िल्म में हीरोइन बना देगा. मगर मुक़दमा इस तर्क पर कमज़ोर पड़ गया कि क्या किसी बालिग युवती के साथ, जो उस पुरुष के साथ निकट संपर्क में बनी हुई हो, 16 बार शरीर संपर्क बलात्कार माना जाना चाहिए या नहीं? सवाल यह था कि इसे 16 बार सहमति से बना शरीर संबंध क्यों न कहा जाए? और अगर ऐसा सहमति से हुआ तो बलात्कार का मुकदमा क्यों?
उस मामले में निर्देशक को कोई सज़ा नहीं हुई. क्या इस मामले में अभिनेता पर किया गया दोषारोपण उसे अपराधी सिद्ध कर सका? क्या उस महीन लकीर पर कोई निर्णयात्मक बहस हो सकी, जो स्वेच्छा या सहमति और महिला की इच्छा न होते हुए भी की गई ज़बर्दस्ती को परिभाषित कर सके? स्त्री की स्वतंत्रता और गरिमा का पूर्ण आदर करते हुए क्या इस तथ्य को भी ध्यान में रखा जा सकेगा कि `लेट्स हैव फ़न’ के जिस भाव के तहत पुरुष ,अक्सर सीमा लांघ जाते हैं, क्या कभी कभार वही भाव महिलाओं को भी यह सोचने पर विवश नहीं कर देता कि,`व्हाय शुड मैन हैव ऑल द फ़न?’ (याद कीजिए, प्रियंका चोपड़ा का विज्ञापन). सवाल ये है कि क्या आज़ादी या मनमानी की इच्छा क्या महिलाओं के लिए वर्जित है? वर्जित है तो क्यों और अगर वर्जित नहीं है तो फिर दोषारोपण क्यों? ‘आर्टिकल 376’ इन सब सवालों का विश्लेषण बहुत ख़ूबी से करती है.

जो लोग कॉर्पोरेट जगत, कॉल सेंटर्स या अन्य संस्थानों में, जिनमें शिक्षण संस्थान भी शामिल हैं, आए दिन होने वाली पार्टियों के स्वरूप को निकट से जानते हैं उन्हें ठीक पता होता है कि इन पार्टियों में `फ़न सीकर्स’ पुरुषों की संख्या जितनी होती है, महिलाओं की संख्या उनसे कुछ कम नहीं होती. क्या यहां शरीक़ होने वाले बिग बॉसेस से लेकर अपर स्टाफ़ और साथ में अन्य कर्मचारी तक `लेट अस हैव सम गुड टाइम’ की चाहत में नहीं आते? और अगर आते हैं तो कौन सा कहर बरपा हो जाता है? वे इन्हें कोई यज्ञोपवीत धारण समारोह मान कर नहीं आते. फ़िल्म जगत की पार्टियां भी कुछ इसी तरह की होती हैं. इनमें मस्ती चाहने वालों में स्ट्रगर्ल्स और मॉडल्स से लेकर बड़े घरों के संपन्नता से अघाये हुए लोगों तक कितनी ही तरह के मेहमान मौजूद होते हैं. धीरे-धीरे जब रात गहराती है, `फ़न’ की चाहत उभरने लगती है. यहां सबको पता होता है कि इन पार्टियों में `गुड टाइम’ की कोई निर्धारित परिभाषा नहीं होती. वह तो समय और मौक़ा देख कर बनती बिगड़ती रहती है. तो जहां बात बन गई, बन गई, नहीं बनी तो कोई बात नहीं! बेटर लक नेक्स्ट टाइम! यहां आने वाले सभी इन्हें सिर्फ़ टेंशन बस्टर्स मानते हैं, वे यहां ऐसे कोई नैतिक मूल्य लेकर नहीं आते, जिनके बारे में उन्हें बरसों बाद बोध हो कि उनके उस साथी ने, जिसके साथ वे स्वेच्छा से जीवन के कुछ उन्मुक्त क्षणों का आनंद उठा रहे थे, कोई मर्यादा भंग कर दी थी. वे कोई मुक़दमा दायर कर देने की भावना का शिकार नहीं होते. यह कोई नई बात भी नहीं है. जाने कब से यह सब यूं ही होता चला आ रहा है.

मन को बांध कर रखते-रखते भी, कभी-कभार उसे मुक्त छोड़ देने की वक़ालत भला किस कवि ने नहीं की? और जब मन कहे कि `आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है..’ तो जीने से कौन रोक सकता है? `आज उड़ा जाये रे मेरा मन, मेरा मन…’, `कहां उड़ चले हैं, मन प्राण मेरे…’ उस वक़्त तो मन की उड़ान को रोकना पुरातनपंथी जीवन मूल्य मान कर दरकिनार कर देना ही उचित लगता है. कोई इस सब को लाख पश्चिमी संस्कृति कहे लेकिन सच यह भी है कि हर किसी के मन में किसी न किसी के प्रति अदम्य आकर्षण हो जाना कोई असामान्य बात नहीं. ‘धीरे धीरे मचल, ए दिले बेक़रार, कोई आता है… उसके आने की आहट हवाओं में है…दिल पे रहता है ऐसे में कब अख़्तियार, कोई आता है.’ क्या भारत में ऐसा नहीं होता रहा है कि देशी-विदेशी क्रिकेट खिलाड़ियों के प्रति मोहित होकर किसी छोटी बड़ी अभिनेत्री ने भावावेश में प्रेम निवेदन कर दिया हो? यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि विदेशी खिलाड़ियों ने इस भावावेश का भरपूर फायदा उठाया है और अवसर को तुरंत भुना लेने में पीछे नहीं रहे. अक्सर इस प्रकार के मामलों में `नो स्ट्रिंग्स अटैच्ड’ की अलिखित शर्त पहले से ही तय होती है. मीडिया को भी इनकी भनक मिलती रहती है. क्रिकेट और रोमैंस की गर्मागर्मी के बाद खिलाड़ी स्वदेश लौटते रहे हैं. `परदेसियों से न अंखियां मिलाना…ये पंछी हैं, रात को ठहरें… उड़ जाएं कल को…’ जैसी सीख की ज़रूरत दोनों पक्षों को नहीं रहती. वहां तन-मन की पुकार नैतिकता के दायरों में बंधी हुई नहीं होती इसलिए कोई पछतावा भी नहीं होता. पछतावा नहीं तो अदालत जाने की ज़रूरत भी नहीं आती. क्यों कोई अपने नितांत निजी फ़ैसले और उससे उपजे आनंद के क्षणों को जग हंसाई का मसाला बनने दे! कोई इसे ग़लत ठहराता हो तो ठहराता रहे. ‘हम हैं राही प्यार के, हमसे कुछ न बोलिए…’

`मन की बात’ सुनने की यह आज़ादी फ़िल्म कलाकारों के प्रति कहीं ज्यादा मुखर रही है. फ़िल्म पत्रिका `माधुरी’ के संपादन के दौरान युवतियों द्वारा अपने चहेते हीरो को ख़ून से लिखे .खत इस आशय के साथ मिलते रहते थे कि अपने प्रिय कलाकार का पता न मिल पाने की वजह से यह पत्र `माधुरी’ को इस निवेदन के साथ भेजा जा रहा है कि इसे गन्तव्य तक पहुंचा देने की मेहरबानी कर दी जाएगी. शूटिंग देखने को लालायित भीड़ में मौजूद युवतियां अपने पसंदीदा हीरो से मिलने का ज़रा-सा मौक़ा मिलते ही क्या कुछ न कह कर, क्या कुछ न कर गुज़रने का आश्वासन दे कर, फ़िल्मों में बेशर्मी से प्रेम निवेदन करने वाले हीरो की बोलती बंद कर देती हैं, यह सब फ़िल्म पत्रकारों से छिपा नहीं रहता.
क्या हमारे 75 पार के, अपने समय के अत्यंत आकर्षक और लोकप्रिय उस हीरो के साथ भी ऐसा ही कुछ तो नहीं हुआ होगा, जिसके साथ काम करने को उस दौर की हर नई नायिका सब कुछ वार देने को तैयार बताई जाती थीं! दक्षिण भारत से आई एक नायिका ने, जिसने बाद में मुंबई फ़िल्म इंडस्ट्री में सफलता के झंडे गाड़े और एक दूसरे सफलतम नायक के साथ अपने सिज़लिंग रोमांस के लिए आज भी चर्चा में बनी हुई हैं, मुंबई में पहली फ़िल्म साइन करते ही खुलेआम इसी नायक का नाम जपना शुरू कर दिया था, जिस पर आज बदचलनी का अभियोग है. उस पहली फ़िल्म को लेकर हुई प्रेस कॉन्फ़रेंस में उसने कहा था कि उसकी ज़िंदगी की एक ही तमन्ना है, इस युवा चॉकलेटी हीरो के साथ अभिनय. तो जिस हीरो का सानिध्य पाने को हीरोइनें तरस रही थीं, उसका साथ पा लेने की ख़्वाहिश एक कम उम्र युवती में भी जगी हो तो इसमें अजूबा क्या है? और क्या इस प्रकार के ऐड्वेंचर्स की कहानियां ख़ुद ही बढ़-चढ़ कर नहीं सुनाई जातीं? उन्हें सात पर्दों में छिपा कर रखने के जमाने कब के लद गए. विश्वास न होता हो तो अमिताभ बच्चन के लाजवाब अभिनय से सजी फिल्म `पिंक’ का वह सीन याद कीजिए, जहां वयोवृद्ध वक़ील (अमिताभ बच्चन) कुछ युवकों की अश्लील छेड़छाड़ का प्रबल प्रतिरोध कर रही युवती से पूछता है,`आर यू अ वर्जिन?’
पहले की फ़िल्मों में क्या कोई निर्देशक इस तरह के नितांत व्यक्तिगत सवाल का जवाब भरी अदालत में पूछने वाला सीन फ़िल्माने की कल्पना भी कर सकता था? नहीं. आज ज़माना बदल गया है. युवती थोड़ी झिझक के साथ, किंतु स्पष्ट उत्तर देती है, `नो’. साथ ही मामले को और साफ़ कर देती है,`आई हैव अ बॉयफ्रैंड.’ इस जवाब को लेकर युवती के अंदर कोई `गिल्ट’ नहीं पनप रहा. इस बॉयफ्रैंड से उसे कोई शिकायत नहीं. उसे ठीक मालूम है कि वह क्या कह रही है और उसने जो किया पूरे होश हवास में, स्वेच्छा से किया.
स्वेच्छा से न किया होता तो? तो वह हल्ला मचाती. प्रतिरोध करती जैसा हर वह युवती करती है, जिसके साथ बलात्कार का प्रयत्न किया जाता है. `पिंक’ की पूरी कहानी असहाय लड़कियों के प्रतिशोध की ही है. वे डरी हुई हैं, लेकिन हिम्मत हारी हुई नहीं हैं. वे 50 साल तो क्या एक हफ़्ते भी चुप बैठी रहने वाली नहीं हैं, क्योंकि सताई हुई कोई लड़की इतने दिन आवाज़ दबाकर बैठी नहीं रह सकती. हां, सही मौक़े की तलाश में जितनी देर हो, हो.
लेकिन सही मौक़ा 50 साल के बाद आएगा, इसकी कल्पना थोड़ी विकट तो है!

फ़ोटो: गूगल

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विनोद तिवारी

विनोद तिवारी

पत्रकारिता के हर क्षेत्र, अख़बार, पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविज़न और फ़िल्मों का सघन अनुभव रखने वाले विनोद तिवारी लंबे समय तक टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप की पत्रिका माधुरी के संपादक रहे. वे सोनी एंटरटेन्मेंट टेलीविज़न के सीनियर मैनेजर के पद से सेवानिवृत हुए और मुंबई यूनिवर्सिटी में 20 वर्षों तक पत्रकारिता पढ़ाते रहे. उनकी लिखी किताबें कई विश्वविद्यालयों के मीडिया के पाठ्यक्रम में शामिल हैं. फ़िलहाल वे श्री राजस्थानी सेवा संघ, मुंबई, की एकेडमी ऑफ़ ऑडियो विशुअल आर्ट्स ऐंड जर्नलिज़्म (आवाज) के निदेशक हैं.

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