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लता मंगेशकर: सुरों की सुरीली और अमर दास्तां

शकील अहमद by शकील अहमद
February 6, 2022
in चेहरे, ज़रूर पढ़ें, सुर्ख़ियों में
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लता मंगेशकर: सुरों की सुरीली और अमर दास्तां
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लता मंगेशकर को भारत सरकार ने ‘भारत रत्न’ से तो वर्ष 2001 में नवाज़ा, लेकिन भारत की जनता के दिलों में वे एक ‘अनमोल रत्न’, एक ‘बेशक़ीमती रत्न’ के रूप में पिछले पचहत्तर बरसों से महफूज़ हैं. हिंदुस्तान क्या, लता की आवाज़ में तो सारे उपमहाद्वीप का दिल धड़कता है, क्योंकि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका जैसे देशों में उनकी आवाज़ दिलो-जान से सुनी जाती है, सराही जाती है और दिल में बसाई जाती है. वे आज सशरीर भले ही हमारे बीच न हों, लेकिन अपने संगीत के चलते वे हमेशा हमारे दिलों में रहेंगी. लता मंगेशकर को कुछ यूं याद कर रहे हैं शकील अहमद.

लता मंगेशकर को भारत सरकार ने ‘भारत रत्न’ से तो वर्ष 2001 में नवाज़ा, लेकिन भारत की जनता के दिलों में वे एक ‘अनमोल रत्न’, एक ‘बेशक़ीमती रत्न’ के रूप में पिछले पचहत्तर बरसों से महफूज़ हैं. भारत की जनता के साथ-साथ बेशुमार संगीत हस्तियों ने उनकी आवाज़ पर तारीफ़ों के सुर बिखेरे, शायरों ने क़सीदे पढ़े, लेखकों ने किताबों के अंबार लगा दिए, अख़बारों को जब भी मौक़ा मिला अपने पन्ने उनके सुरीले, मीठे और सदाबहार गीतों से संगीतमय बना दिए.

जब लता के ही साथी और सुप्रसिद्ध संगीतकार नौशाद अली ने कहा कि ‘लता की आवाज़ में हिंदुस्तान का दिल धड़कता है’, तो भला उनके इस बयान को कौन झुठला सकता है.

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सचमुच हज़ारों-हज़ार ऐसी मिसालें हैं, जो यह साबित करती हैं कि हां! लता की आवाज़ में हिंदुस्तान का दिल धड़कता है, हिंदुस्तान की हर मां, बहन, प्रेमिका, पत्नी, बेटी, बहू, सहेली, भाभी, साली, ननद के ख़यालों को लता की आवाज़ में आवाज़ मिलती है. लता की आवाज़ में उन्हें सुकून महसूस होता है, उनकी ख़ुशी उमड़ पड़ती है, उनका दर्द छलक आता है, उनकी वेदना तड़प उठती है, उनकी दुहाई बिलख उठती है, उनकी पुकार सिहर उठती है!

लता की आवाज़ में मिलन को बेचैन एक प्रेमिका की इल्तिजा को आवाज़ मिलती है, तो जुदाई में विरह-वेदना में तड़पती प्रेमिका की आह को स्वर मिलता है. उनकी आवाज़ में अठखेलियां हैं, शोख़ियां हैं, ख़ुशी है, पीड़ा है और दर्द भी है, तो उनकी आवाज़ में समाज से जुड़ा सरोकार भी है, अभागन नारी की दुहाई है, तो पतिता की वेदना भी है, अत्याचार और ज़ुल्म के ख़िलाफ उठी हुंकार है, तो समाज को दिशा देती आशा की किरण भी है.

हिंदुस्तान क्या, लता की आवाज़ में तो सारे उपमहाद्वीप का दिल धड़कता है, क्योंकि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका जैसे देशों में उनकी आवाज़ दिलो-जान से सुनी जाती है, सराही जाती है और दिल में बसाई जाती है. वे दुनिया भर के लिए ‘स्वर साम्राज्ञी’ और ‘स्वर कोकिला’ कहलाईं.

28 सितम्बर 1929 को इंदौर में पैदा हुईं लता का ताल्लुक यूं तो महाराष्ट्र से है, लेकिन उनकी आवाज़ आगे चलकर पूरे देश की आवाज़ बन गई. लता जी ने अपने संगीत सफ़र की शुरुआत महज़ 13 साल की उम्र में 1942 में की थी और सफ़र तक़रीबन सत्तर बरसों तक चलता रहा. इस दौरान उन्होंने कई भारतीय भाषाओं में 30 हज़ार से ज़्यादा गानों को अपनी आवाज़ से सजाया.

सुर और संगीत लता की रगों में दौड़ता है. उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर मराठी संगीत नाट्य के लोकगायक और नाटककार थे. इसलिए घर का माहौल पूरी तरह संगीतमय था. वे संगीत की स्वरलहरियों के बीच ही पलने लगीं, इसलिए संगीत उनके साथ पाठशाला की कक्षाओं में भी चला आया. कक्षा में वे दूसरों बच्चों को गाना सिखाने लगीं. शिक्षक ने मना किया, तो उन्हें बड़ा नगवार गुज़रा और दूसरे दिन से ही स्कूल से नाता तोड़ लिया और पूरी तरह संगीत से जोड़ लिया और फिर वे ताज़िंदगी संगीत की ही होकर रह गईं.

लता ने यूं तो पहली बार एक मराठी फ़िल्म में गाना गया और अभिनय भी किया. फ़िल्म का नाम था ‘पहिली मंगला गौर’ (1942). मास्टर विनायक ने उन्हें यह अवसर दिया था, जो दीनानाथ मंगेशकर के मित्र थे. दीनानाथ इसी बरस चल बसे थे और उस समय लता थीं सिर्फ़ 13 बरस कीं. मास्टर विनायक ने ही वर्ष 1945 में हिंदी फ़िल्म ‘बड़ी मां’ बनाई, तो उन्होंने उसमें लता और आशा को भूमिकाएं भी दीं और लता को एक भजन गाने का मौक़ा भी दिया.

वर्ष 1948 में मास्टर विनायक की मौत के बाद संगीतकार ग़ुलाम हैदर ने लता के गायन करियर को एक दिशा दी.

वर्ष 1948 की बात है, एक दिन ग़ुलाम हैदर लता को लेकर निर्माता शशधर मुखर्जी के पास गए. वे उन दिनों ‘शहीद’ फ़िल्म बना रहे थे. मुखर्जी ने लता की आवाज़ सुनी तो यह कहकर उसे ख़ारिज कर दिया कि इस लड़की की आवाज़ तो बहुत ही पतली है. ग़ुलाम हैदर आगबबूला हो उठे, कहा, आनेवाले दिनों में निर्माता, निर्देशक लता के पैरों पर गिरेंगे और अपनी फ़िल्म में गाने के लिए गुज़ारिश करते फिरेंगे. और हुआ भी वही, आगे चलकर लता की आवाज़ हर फ़िल्म का ज़रूरी हिस्सा हो गई, उनकी आवाज़ के बिना कोई भी संगीतकार महिला गीत की कल्पना भी नहीं कर सकता था. सबसे बढ़कर यह कि उनकी आवाज़ फ़िल्म की सफलता का एक पैमाना बन गई.

ग़ुलाम हैदर शशधर मुखर्जी के यहां से चले तो आए, लेकिन फिर वर्ष 1948 में ही अपनी फ़िल्म ‘मजबूर’ में लता से एक गाना गवाया और इस तरह फ़िल्म संगीत में लता का सफ़र धीमी गति से आगे बढ़ा.

शुरू में उनकी आवाज़ पर उस समय की मशहूर और दिग्गज गायिका नूरजहां की आवाज़ की छाप नज़र आती थी, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी ख़ुद की शैली बना ली और फिर उनकी एक अलग पहचान भी बन गई. गायन का शास्त्रीय आधार तो उनके पास था ही, रियाज़ भी वे ख़ूब करतीं. शायरी और गीतों पर अच्छी पकड़ के लिए दिल लगाकर उर्दू भी सीख ली.

यूं तो लता के पहले गुरु उनके पिता दीनानाथ ही थे, लेकिन उनके बाद उन्होंने उस्ताद अमान अली ख़ां साहब भेंडीबाज़ार वाले से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली. लेकिन जब वे 1947 में पाकिस्तान चले गए, तो लता ने उस्ताद अमानत ख़ां देवास वाले से बाक़ायदा गंडा बंधवाकर शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली. लता ने महान शास्त्रीय गायक उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ां साहब के शागिर्द पंडित तुलसीदास शर्मा से भी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली और उनकी परम्परा को भी आगे बढ़ाया.

फिर शुरू हुआ लता का दौर यानी पचास का दशक, जिसमें उन्होंने फ़िल्म संगीत इतिहास के तमाम दिग्गज संगीतकारों के साथ गाया, अलग-अलग अंदाज़ में गाया और हर तरह की शैलियों, परिस्थितियों, ज़रूरतों और जज़्बात के लिए गाया. गीत, नज़्म, कव्वाली, भजन, नात, ग़ज़ल, कैबरे, मुजरा, लोरी, लोकगीत, नृत्यगीत, भक्तिगीत, देशभक्ति गीत, प्रार्थना आदि में अपने सुरों को घोला.

उन्होंने ग़ुलाम हैदर, अनिल विश्वास, शंकर-जयकिशन, नौशाद, एस. डी. बर्मन, सी. रामचंद्र, सलिल चौधरी, खेमचंद प्रकाश, हेमंत कुमार, सज्जाद हुसैन, रोशन, वसंत देसाई, मदन मोहन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, जतिन-ललित, नदीम-श्रवण आदि संगीतकारों के साथ गाया और इतिहास रच दिया.

देश के महान शास्त्रीय गायक उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ां से जुड़ा एक क़िस्सा बहुत मशहूर है. महान शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने कहा था कि वे एक बार बड़े ग़ुलाम अली ख़ां से मिलने अमृतसर गए, वे बातें ही कर रहे थे कि ट्रांजिस्टर पर लता का गाना ‘ये ज़िंदगी उसी की है जो किसी का हो गया’ सुनाई पड़ा. ख़ां साहब बात करते-करते एकदम से चुप हो गए और जब गाना ख़त्म हुआ, तो बोले, “कमबख़्त कभी बेसुरी होती ही नहीं.“ इस टिप्पणी में पिता का प्यार भी था और एक कलाकार का रश्क भी.

वर्ष 1958 में उन्हें फ़िल्म ‘मधुमति’ के गीत ‘आजा रे परदेसी’ के लिए पहली बार फ़िल्मफ़ेयर का सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का पुरस्कार मिला. इसका संगीत सलिल चौधरी ने तैयार किया था. उसके बाद उनकी आवाज़ में निखार आता चला गया और नए संगीतकारों के साथ उनकी आवाज़ को नए आयाम भी मिलने लगे.

साठ के दशक की शुरूआत में ही नौशाद की ऐतिहासिक फ़िल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ ने सफलता के नए रिकॉर्ड क़ायम कर दिए और संगीत के क्षेत्र में तो एक मिसाल ही बन गई. एक से बढ़कर एक तराशे हुए हीरों की तरह बेशक़ीमती और बेमिसाल गीतों ने सारे भारत को मदहोश बना दिया, जिसमें लता की आवाज़ का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोला.

साठ के दशक में उन्हें दूसरा फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला फ़िल्म ‘बीस साल बाद’ के लिए, जिसका संगीत तैयार किया था गायक हेमंत कुमार ने और गीत था ‘कहीं दीप जले, कहीं दिल’. महान स्वतंत्रता सेनानी और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के बारे में मशहूर था कि वे सार्वजनिक तौर पर कभी रोते नहीं थे और न ही दूसरों को रोता देखना पसंद करते थे. लेकिन 27 जनवरी, 1963 को जब लता मंगेशकर ने कवि प्रदीप का लिखा गाना ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गाया तो वे अपने आंसू नहीं रोक पाए. गाने के बाद लता स्टेज के पीछे कॉफ़ी पी रही थीं तभी निर्देशक महबूब ख़ां ने लता से आ कर कहा कि तुम्हें पंडितजी बुला रहे हैं. महबूब ने लता को नेहरू के सामने ले जा कर कहा, “ये रही हमारी लता. आपको कैसा लगा इसका गाना?”

नेहरूजी ने कहा, “बहुत अच्छा. इस लड़की ने मेरी आंखों में पानी ला दिया.” और उन्होंने लता को गले लगा लिया.

इस दौरान उन्होंने कई मराठी फ़िल्मों के लिए भी गाया और आनंदघन के नाम से संगीत भी दिया. उन्होंने चार मराठी फ़िल्मों को अपने संगीत-निर्देशन से सजाया. उन्होंने बांग्ला, तमिल और तेलुगू गीतों में भी अपनी आवाज़ के रंग भरे.

लता ने कुल चार बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीता और फिर पुरस्कारों की होड़ से हट गईं, ताकि आनेवाली नई प्रतिभाओं को पुरस्कार पाने का मौक़ा मिले और यह बात है वर्ष 1969 की.

सत्तर के दशक में उन्होंने आर.डी. बर्मन, कल्याणजी-आनंदजी और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे नए संगीतकारों के साथ गाया और बहुत ही लोकप्रिय गीत दिए. वर्ष 1972 में आर. डी. बर्मन की संगीतबद्ध फ़िल्म ‘परिचय’ के गीत ‘बीती ना बिताई रैना’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा गया. यह गीत गुलज़ार ने लिखा था.

लता ने बाद में गुलज़ार की लिखी और निर्देशित फ़िल्म ‘लेकिन’ के गीत ‘यारा सिली सिली बिरहा की रात का जलना’ के लिए एक बार फिर राष्ट्रीय पुरस्कार जीता था. ख़ास बात यह थी कि इस फ़िल्म का निर्माण उन्होंने ख़ुद किया था और उसका संगीत उनके भाई हृदयनाथ मंगेशकर ने दिया था.

इससे पहले वर्ष 1975 में भी उन्हें फ़िल्म ‘कोरा कागज़’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका था.

अस्सी के दशक में लता ने नए ज़माने के साथ नए संगीतकारों की संगत की और देश को एक से बढ़कर एक अनमोल गीत दिए. शिवहरि, राम-लक्ष्मण, हृदयनाथ मंगेशकर जैसे संगीतकारों के लिए गाया. नब्बे के दशक में उन्होंने जतिन-ललित, नदीम-श्रवण और ए. आर. रहमान के सुरों को अपने स्वर दिए और नई पीढ़ी के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चलती रहीं.

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र सरकार उनके नाम पर उभरती हुई संगीत प्रतिभाओं को ‘लता मंगेशकर’ पुरस्कार प्रदान करती हैं, जो लता के लिए एक बड़ी उपलब्धि है कि उनके जीते-जी उनके नाम पर पुरस्कार दिए जाते हैं.

यूं तो स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर को देश और दुनिया भर के कई पुरस्कार मिले हैं, लेकिन भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1969 में पद्मभूषण, वर्ष 1989 में दादा साहेब फाल्के, वर्ष 1999 में पद्मविभूषण और फिर वर्ष 2001 में देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ देकर सम्मानित किया.

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट

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शकील अहमद

शकील अहमद

शकील अहमद हिंदी लेखक, कॉपी-राइटर, अनुवादक, समीक्षक और लोकलाइज़ेशन ट्रेनर हैं. उन्होंने ‘जनसत्ता’ से पत्रकारिता की शुरुआत की. ‘नवनीत’ पत्रिका में वरिष्ठ उप-संपादक, जोश-18 (नेटवर्क-18) में वरिष्ठ कॉपी-एडिटर के रूप में कार्य करने के बाद लोकलाइज़ेशन की दुनिया में बतौर अनुवादक और समीक्षक कार्यरत हैं. वे कालनिर्णय, मैकमिलन प्रकाशन, द राइट प्लेस - क्रॉसवर्ड, पॉप्यूलर प्रकाशन, मुंबई सर्वोदय मंडल और सद्भावना साधना जैसे संस्थानों में बतौर अनुवादक और सलाहकार सेवाएं भी दे चुके हैं. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन व संपादन सहित उन्होंने कई पुस्तकों का अनुवाद भी किया है.

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