ट्रैंस्जेंडर के टैबू को चुनौती देती फ़िल्म है चंडीगढ़ करे आशिकी
पंजाबी तड़के से सजी यह फ़िल्म गुदगुदाती है, हंसाती है और इसके साथ-साथ अपने लक्ष्य तक भी ले जाती है. ...
पंजाबी तड़के से सजी यह फ़िल्म गुदगुदाती है, हंसाती है और इसके साथ-साथ अपने लक्ष्य तक भी ले जाती है. ...
यदि आपका सवाल ये है कि फ़िल्म शिकारा क्यों देखी जाए तो इसके कई जवाब हैं: देश में 1947 के ...
फ़िल्म के शीर्षक को पढ़कर मैं ख़ुद ही हैरान थी, क्योंकि अब तक तो तानाजी मालुसरे पढ़ते आए थे, ये ...
इधर करोना के दौरान थिएटर में जाकर फ़िल्में देखना तो सपनों की बात जैसा हो गया था. लेकिन काफ़ी समय ...
हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.
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