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ओए अफ़लातून
Home बुक क्लब कविताएं

कारवां गुज़र गया: गोपालदास नीरज की कविता

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
September 25, 2021
in कविताएं, बुक क्लब
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कारवां गुज़र गया: गोपालदास नीरज की कविता
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मरहूम गीतकार-कवि गोपालदास नीरस की दार्शनिकता उनकी लंबी कविता कारवां गुज़र गया में महसूस की जा सकती है.

स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पांव जब तलक उठें कि राह रथ निकल गई,
पात-पात झर गए कि शाख-शाख जल गई,
फांस तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्रु बन चले,
छन्द हो हवन चले,
साथ के सभी दिए धुआं पहन-पहन चले,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके रुके,
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे!

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(नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पांव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क़ बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिए धुआं-धुआं पहन गए,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे)

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार का उठा,
क्या सुरूप था कि देख आईना सिहर उठा,
इस तरफ़ ज़मीन और आसमां उधर उठा,
थामकर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगरछली
वह-हवा यहां चली
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली
और हम दबी नज़र,
देह की दुकान पर,
सांस की शराब का ख़ुमार देखते रहे,
कारवां गुजर गया, ग़ुबार देखते रहे!

(क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आईना मचल उठा
इस तरफ़ ज़मीन और आसमां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहां,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,
वक्त से पिटे-पिटे,
सांस की शराब का खुमार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे)

आंख थी मिली मुझे कि अश्रु-अश्रु बीन लूं,
होंठ थे खुले कि चूम हर नज़र हसीन लूं,
दर्द था दिया गया कि प्यार से यक़ीन लूं,
और गीत यूं कि रात से चिराग़ छीन लूं,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि ढह गए क़िले बिखर-बिखर,
और हम लुटे-लुटे,
वक्त से पिटे-पिटे,
दाम गांठ के गंवा, बज़ार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे!

(हाथ थे मिले कि जुल्फ़ चांद की संवार दूं,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूं,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूं,
और सांस यूं कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूं,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गए किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे!)

मांग भर चली कि एक, जब नई-नई किरण,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरण-चरण,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गांव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
ग़ाज एक वह गिरी,
पुंछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी,
और हम अजान से,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे

एक रोज़ एक गेह चांद जब नया उगा,
नौबतें बजीं, हुई छटी, डठौन, रतजगा,
कुंडली बनी कि जब मुहूर्त पुन्यमय लगा,
इसलिए कि दे सके न मृत्यु जन्म को दग़ा,
एक दिन न पर हुआ,
उड़ गया पला सुआ,
कुछ न कर सके शकुन, न काम आ सकी दुआ,
और हम डरे-डरे,
नीर नैन में भरे,
ओढ़कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे,
चाह थी न, किंतु बार-बार देखते रहे,
कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे!

Illustration: Pinterest

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