सदियों से हमारी कंडिशनिंग ऐसी की गई है कि हम महिलाएं अपनी इच्छाओं को घर के आख़िरी कोने में जगह देते हैं और कई बार हम बहुत चाहते हुए भी उन्हें कोनों में तक जगह नहीं दे पाते हैं… लेकिन ज़िंदगी हमारे चुनाव यानी चॉइसेस से बनती है. इन चॉइसेस में अपने स्वजनों को जगह देना अच्छा है, पर ये ध्यान रखते हुए कि ये जीवन हमें भी एक ही बार तो मिला है! ऐसे में अपनों को वरीयता देते-देते, ख़ुद को, अपनी इच्छाओं को पीछे रखना आख़िर कितना सही है? यहां से आगे, आप बड़े नाज़ुक तरीक़े से इसी बात की ओर ध्यान दिलाती हुई एक संजीदा एक कहानी पढ़ने जा रहे हैं…
“पिछले तीन और महीनों की तरह ही गुजरा ये महीना.” सारी बातें बताकर आयशा ने थोड़ा रुककर एक नज़र अपने पति रोहित के सपाट चेहरे पर डाली. उसकी आवाज़ की बेचैनी बढ़ गई, “कोई दिन ऐसा नहीं गया होगा रोहित, जब मम्मी जी ने मुझे किसी के सामने बेइज़्ज़त न किया हो.” कहते-कहते आयशा रो पड़ी.
“मेरी प्यारी आयशा! आयशा मेरी बात सुनो” कहते हुए रोहित ने उसे गले से लगा लिया. “अब क्या बताऊं? वो ऐसी ही हैं. देखो वो तो सबको भला-बुरा कहती रहती हैं. मुझे भी कितना डांटती हैं…
“नहीं रोहित, डांटने में और इंसल्ट करने में फ़र्क़ होता है…” आयशा ने अपना सिर रोहित के सीने से हटाकर अपनी नाराज़गी भरी आंखें उसकी आंखों पर टिका दीं.
“और बात इतनी सी नहीं है. उन्होंने मुझे पेंटिंग करने से भी सख़्ती और तानाशाही से मना कर दिया. मैं तो सन्न सी उन्हें देखती रह गईं जब उन्होंने मेरे कलर्स और कैनवस के लिए बोला- “अपना ये कूड़ा-करकट हटाओ यहां से. तुम मुझसे पूछे बिना ये सब मेरे घर में लाईं कैसे?” आयशा का स्वर गुस्से से थरथराने लगा. “बिल्कुल यही शब्द थे. एक तो इतने बड़े घर में नई बहू के लिए प्राइवेसी वाली कोई जगह नहीं. जब तुम नहीं होते हो वो हमारे कमरे में सोती हैं. उनके हिसाब से ये उनका ही एक कमरा है, जो उन्होंने मुझे बस सोने और एक अल्मारी में बस अपना सामान रखने के लिए दिया है. वो भी इसलिए, क्योंकि वो मेरे साथ रहना चाहती हैं, बातें करना चाहती हैं. तानाशाही की हाइट ये कि जब मैंने अपने आर्ट्स कॉलेज की गोल्ड मेडिलिस्ट होने की बात बताकर कहा कि मैं पेंटिंग बनाकर ड्राइंग रूम में लगाना चाहती हूं तो उन्होंने साफ़ शब्दो में कह दिया कि मेरी हिम्मत कैसे हुई ये सोचने की भी कि मैं ‘उनके’ हां रोहित, ‘उनके’ घर में अपनी मर्जी का कुछ लगा सकती हूं?” आयशा के मन में गुस्से का तूफ़ान था, पर रोहित का स्वर एकदम शांत आया।
“रोकना टोकना तो बड़ो की आदत होती है. हां, वो गलत होते हैं जब बच्चों के बड़े होने के बाद भी अपनी आदत नहीं बदल पाते मगर…”
“ये रोकना टोकना नहीं, तानाशाही है, मेंटल हेरेसमेंट है।” आयशा की आंखों में आंसू आ गए चेहरा गुस्से से लाल और आवाज़ पनीली हो गई, “सच कहती हूं रोहित, मैं बाकी सब इग्नोर कर दूं अगर मेरे पास करने के लिए मेरा मनपसंद काम हो. बस एक कोने में थोड़ी-सी जगह चाहिए. तुम्हें तो पता है पेंटिंग मेरे लिए मेडिटेशन है… बस कोई मुझसे मेरा मेडिटेशन न छीने.” कुछ देर चुप रहने के बाद उसने रोहित की ओर प्रश्नवाचक नज़र से देखा.
“देखो आयशा, इतना तो तुम समझ ही चुकी होगी कि मां को समझाना तो संभव नहीं है.”
“तो तुम ये बताओ कि तुम मुझे मुंबई कब ले चल रहे हो?” रो
हित ने एक ठंडी आह भरी, “तुम जानती हो आयशा मुंबई में सब कुछ मिल सकता है, घर नहीं. मुझे कंपनी की ओर से घर मिलने में अभी आठ महीने हैं…”
“तो तुमने घर मिलने के एक साल पहले शादी क्यों की?” आयशा गुर्राई.
“मम्मी के अरमान थे कि वो भी नई बहू के साथ समय बिताएं. एक बार वहां जाने के बाद तो…”
“समय बिताएं या उसके आत्म-सम्मान को रोज़ कुचलें? और उनका ये अरमान पूरा करने के लिए तुमने…” आयशा हांफने लगी थी. उसने वाक्य अधूरा छोड़ दिया. “तो ठीक है, पर मैंने शादी उनका अरमान पूरा करने के लिए नहीं की है. तब तक के लिए मैं मायके चली जाती हूं.”
रोहित ने आयशा को अपनी बांहों में भर लिया. बहुत भावुक स्वर में बोला, “मैं जानता हूं तुम बहुत दुखी हो, पर बहुत अच्छी हो तुम, बहुत समझदार हो. अनदेखा करना, माफ़ करना जानती हो. ठीक है, तुम जाना चाहती हो तो जाओ,… तो अब आठ महीने बाद ही मुलाकात होगी.
रोहित ने आयशा को अपनी बांहों में भर लिया. बहुत भावुक स्वर में बोला, “मैं जानता हूं तुम बहुत दुखी हो, पर बहुत अच्छी हो तुम, बहुत समझदार हो. अनदेखा करना, माफ़ करना जानती हो. ठीक है, तुम जाना चाहती हो तो जाओ… तो अब आठ महीने बाद ही मुलाकात होगी. तुम मेरा प्यार हो, पर मम्मी मेरी ज़िम्मेदारी. मैं जानता हूं कि वो कैसी हैं, पर अकेली हैं वो. उन्हें मेरी ज़रूरत है. महीने में एक बार दो दिन की छुट्टी लेकर आता हूं. उनका एकाकीपन बांटना और ज़रूरी काम निपटाना फ़र्ज़ है मेरा. तुम्हारा मायका, ये शहर और मुंबई है भी तीन अलग कोनो पर. वहां आने के लिए एक्स्ट्रा छुट्टी और किराए का पैसा…तुम तो जानती हो…”
रोहित रो पड़ा और आयशा पिघल गई, “मैं तुमसे मिले बिना कैसे रहूंगी?”
“तुम अपने घर में चलकर पेंटिंग करना और पूरे घर को एग्ज़िबिशन बना देना.” भावुक स्वर हवा में तैर रहे थे.
मुंबई में वन बेडरूम फ़्लैट का ताला खोलते हुए आयशा जैसे हवा में उड़ रही थी.
“छोटा-सा घर है ये मगर..” रोहित के होठों पर गीत आ गया.
“…खुशी हो या गम, बांट लेंगे हम आधा-आधा…” आयशा ने भी गीत से ही जवाब दिया.
ज़िंदगी का ग्लास आधा ख़ाली भी था, पर दोनों का नज़रिया ऐसा था कि आधा भरा ही दिखाई देता. छोटी-छोटी बातों से पाईं ख़ुशियां, बड़ी-बड़ी कमियों को नज़रअंदाज़ करने के लिए काफ़ी थीं. रोहित बहुत ही केयरिंग और डीसेंट था. घर के काम मिलजुलकर करना उसकी आदत थी और ध्यान रखना उसका स्वभाव. आयशा बड़े चाव से कलर्स और कैनवस लाई. सारे कलर्स खोले सपनीली आंखें कैनवस पर सपना उकेर रही थीं और हाथ प्यार से उसे सहला रहे थे. तभी उसे अपने भीतर हलचल महसूस हुई. लगा सब कुछ बाहर आ जाएगा.
“बहुत नार्मल है ये. अक्सर प्रेग्नेंसी में कोई पार्टिकुलर गंध एकदम बर्दाश्त से बाहर हो जाती है. आपके केस में ये ऑइल पेंट की गंध है. कोई बात नहीं तीन-चार महीने में ये प्रॉब्लम अपने आप ही बंद हो जाएगी.” डॉक्टर प्यार से बोली.
“हॉक आई रखनी पड़ती है मिली और रॉकी पर. बकैयां चलने लगे हैं अब.”
“हूं.” टी.वी. देखते हुए रोहित की छोटी-सी आवाज़ थी.
“आज जब सोए थे दोनों, कलर्स खोलकर देखे थे. सूखने लगे हैं.”
“हूं.”
“पता है रोहित, लेक्चरर्स कहते थे मैं आर्ट में कुछ ऐसा करूंगी कि यूनीवर्सिटी का नाम रोशन होगा.”
“हूं.”
“क्या सुना तुमने?” अबकी आयशा भड़क गई.
“सुन रहा हूं सब. पर कोई सलूशन नहीं है मेरे पास इसीलिए कुछ कह नहीं रहा.” मैं जानता हूं तुम बहुत अच्छी आर्टिस्ट हो और मिली और रॉकी भी तो तुम्हारे नायाब क्रिएशन ही है. माना, जुड़वां बच्चो की परवरिश मुश्किल है पर ये भी तो सोचो एक साथ बड़े भी होंगे तो एक साथ झंझट ख़त्म. फिर कर लेना अपने शौक पूरे.”
“बच्चे झंझट हैं?” आयशा के स्वर में नाराज़गी थी “कोई नहीं, तुम कुछ न करो. दो ढाई साल की बात है. प्ले-स्कूल जाने लगेंगे तो थोड़ा-सा समय मिलने लगेगा.” आयशा की आवाज़ में दुख भी था, पर आशा भी.
“दैट्स गुड आइडिया! ऑप्टिमिस्टिक थिंकिंग!” रोहित ने टेलीवि़्न देखते हुए ही कनक्लूड किया.
प्ले स्कूल छोड़कर लौटने और लेने जाने वाला समय में लगने वाला समय एक घंटा. ऑइल पेंट खोलने और बाद में समेटने, फिर ब्रश वगैरह तारपीन के तेल से धोकर रखने और कैनवस को टांड़ पर चढ़ाने में आधे घंटे, बचे एक घंटे. अपना ग्राफ़िक डिज़ाइनिंग का ऑफ़िशल काम तो बच्चो के सोने पर कर लेती थी. घर का काम शुरू से ही मेड के साथ मिलकर बच्चों के साथ खेलते, उन्हें सम्हालते हुए ही करती थी. बड़े चाव से कलर्स खोले. सूखे हुए कलर्स फेंके, नए मंगाए, कैनवस सेट किया.
पहले तो लगा मनपसंद स्ट्रोक्स लगाने की ट्रिक्स ही भूल गई है शायद. फिर सब याद आने लगा और साथ ही कुनमुनाने लगे ढेरों अधूरे सपने…थोड़ी प्रैक्टिस चाहिए बस. हालांकि जब घड़ी की टिकटिक सिर पर सवार हो तो कलाकार मन एकाग्र ही न हो पाता, पर आयशा हिम्मत हारने वालो में से कब थी?
इतने छोटे घर को साफ़ और व्यवस्थित रखना शायद महानगर की हर गृहणी की सबसे बड़ी चुनौती है. आयशा की प्रतिभा ने भी इस चुनौती का पूरी शिद्दत से सामना किया था. बच्चो की किताबें रखने के लिए शेल्फ़ ख़ाली करना था. आयशा का रॉ मेटेरियल, उसका सीनरी कलेक्शन बाहर क्या आया, ढेरों सपनीले दृश्य पूरे घर में फुदकने लगे.
“कोई नहीं, जब ज़रूरत होगी, प्रिंट ऑउट निकलवा लूंगी.” टेलीविज़न में खोए रोहित के बगल में अपने कलेक्शन की फ़ोटोज़ खींचती आयशा की आवाज़ पनीली थी. पलकों में टूटे सपनो के टुकड़े तैर रहे थे।
“हूं”
आयशा ने मूंगफली गटकते हुए रोहित पर एक नज़र डाली. “हूं का क्या मतलब? क्या तुमने कुछ सुना भी? मेरी हॉबी, मेरा पैशन नहीं मेरा मेडिटेशन है पेंटिंग. जिसके लिए न घर में जगह निकल पा रही है न ज़िंदगी में समय.”
“मैं क्या करूं? तुम बताओ. मेरे पास कोई उपाय है क्या, जो मैं नहीं कर रहा?”
“मैं क्या कहती हूं, बहुत सारे लोगों ने छत पर एक टेम्पेरेरी रूम बनवाया है…”
“उन्हें हमेशा इसी पोस्ट पर इसी घर में रहना है. मुझे दो-तीन साल में प्रमोशन के साथ दो बेडरूम का घर मिल जाएगा तो मैं इस पर पैसे क्यों ख़र्चूं? तुम ही बताओ.”
“कोई नहीं अगले साल बच्चे नर्सरी में जाने लगेंगे तो थोड़ा और टाइम मिल जाएगा. थोड़े समझदार भी हो जाएंगे तो सब सामान समेटकर टांड़ पर न चढ़ाना पड़े शायद.” आयशा की आवाज़ में फिर एक उम्मीद थी.
“बिल्कुल” रोहित ने टी.वी. देखते हुए एक बांह से आयशा को ख़ुद में समेटते हुए कनक्लूड किया, “मेरी समझदार पत्नी.”
फिर बच्चे नर्सरी में आ गए. स्कूल चार घंटे का हो गया पर अब तक बच्चों का पढ़ाई और खेल का सामान इतना बढ़ चुका था कि कलर्स और कैनवस रखने की जगह बिल्कुल नहीं बची थी. धीरे-धीरे वो टांड़ से उतरने बंद हो गए.
एक दिन आयशा ने एक एग्ज़िबिशन में पूरी दीवार जितनी बड़ी लगभग बिल्कुल वैसी ही पेंटिंग देखी, जैसी उसके सपनो में एक थी.
“दो साल बाद जब बच्चे फ़ुल-फ़्लेज्ड स्कूल जाने लगेंगे और तुम्हें बड़ा घर मिल जाएगा तब मैं ऐसी ही पेंटिंग बनाऊंगी. बस एक चेंज होगा उसमें…” आयशा की उम्मीद पेंटिंग की तारीफ़ करते हुए चहक रही थी. ऑफ़िस का फ़ोन अटेंड करते रोहित का मुस्कुराता जवाब था, “हूं”
बच्चों के क्लास वन में आने मतलब उनका स्कूल समय फ़ुल-फ़्लेज्ड हो जाना. उसके साथ ही प्रमोशन मिला और दो बेडरूम का घर भी. अभी तक ड्रॉइंगरूम ही बच्चों का बेडरूम था. अब उनके पास अलग बेडरूम था और ड्रॉइंगरूम ख़ाली. घर में बड़ी कवर्ड बॉलकनी भी थी. कोई आनेजाने वाला तो था नहीं. तो आयशा के सपने एक बार फिर फुदकने लगे.
‘दीवार जितना बड़ा कैनवस इस दीवार के सहारे रखूंगी. बाद में इसी पर टांगा जाएगा. एक कैबिनेट लेकर उसमें सारे कलर्स और ब्रश ड्रॉर में रहेंगे और बाक़ी चीज़ों के लिए…वो कैबिनेट की डिज़ाइन बनाने में व्यस्त थी.
“सुनो, संडे को फ़र्निचर मार्केट चलना है.” रोहित की तरफ़ से घर सजाने के नाम पर कोई पहल सुनकर आयशा गद्गद् हो गई.
“मैंने तो फ़र्निचर की डिज़ाइंस भी सोच ली हैं.”
“अच्छा, तुम सोफ़ा भी डिज़ाइन करती हो?”
“सोफ़ा क्यों लेंगे हम? कम जगह घेरने वाली सेटी है तो हमारे पास फिर कोई आने-जाने वाला तो है नहीं…”
“अब होंगे.”
“कैसे?”
“प्रमोशंस के साथ कुछ ज़िम्मेदारियां भी बढ़ती हैं, जिनमें से एक है क्लाइंट्स को कभी-कभी अपने घर पर बुलाना. कुछ डील्स हैप्पी फ़ैमिली एन्वायरन्मेंट में ही हो पाती हैं. डोंट वरी, कंपनी उन्हें एंटरटेन करने का पूरा पैसा देती है. यहां तक कि हमारे पर्क्स में एक हाउसमेड की सैलरी भी है. वो भी रख लेंगे. हमें बस समय देना होगा और ड्रॉइंगरूम को वैसा ही डेकोरेट करना होगा, जैसा तुम जैसी एस्थेटिक सेंस की धनी हाउस-वाइफ़ करती है.”
प्रमोशन के साथ सैलरी और पर्क्स भी बढ़े और ज़िम्मेदारियां भी. जॉब टुअरिंग हो गया. फिर रोहित महीने में एक बार तीन दिन की छुट्टी नियम से लेता था मां के पास जाने के लिए. बॉस और उसके बीच में ऐग्रीमेंट-सा था. बॉस इसके लिए मना नहीं करते थे और रोहित ऑफ़िस के एक्स्ट्रा काम के लिए.
इधर आयशा के बहुत से काम हाउसमेड की ओर शिफ़्ट हुए और रोहित के बहुत से काम आयशा की ओर. फिर भी थोड़ा ही सही, पर समय तो आयशा का जुनून निकाल ही लेता, लेकिन जगह! आयशा की अनुभवी और हिम्मत न हारने वाली निगाहों ने बालकनी को परखना शुरू किया ही था कि रोहित ने बताया एक अलग ऑफ़िस रूम-कम-बार बनाना भी प्रोफ़ेशनल नीड हो गया है. नतीजा अपने बेडरूम का वो कोना जिसे पेंटिंग कॉर्नर बनाने की सोच रही थी, उसका विकल्प भी ख़त्म हो गया. उस कोने में बालकनी से वो चौड़ी अल्मारी शिफ़्ट हुई, जो वेल ऑर्गनाइज़्ड स्टोर रूम थी.
इधर आयशा के बहुत से काम हाउसमेड की ओर शिफ़्ट हुए और रोहित के बहुत से काम आयशा की ओर. फिर भी थोड़ा ही सही, पर समय तो आयशा का जुनून निकाल ही लेता, लेकिन जगह! आयशा की अनुभवी और हिम्मत न हारने वाली निगाहों ने बालकनी को परखना शुरू किया ही था कि रोहित ने बताया एक अलग ऑफ़िस रूम-कम-बार बनाना भी प्रोफ़ेशनल नीड हो गया है.
बच्चे नाइंथ में आ गए. कोचिंग जाने लगे तो उन्हें पढ़ाने में लगने वाला समय भी बचने लगा. बच्चों को आत्मनिर्भर और सुलझा हुआ व्यक्तित्व बनाने में आयशा की सतर्क कोशिशें सफल रही थीं. फिर भी वो ये महसूस करती थी कि बच्चे जैसे-जैसे बड़े और आत्मनिर्भर होते जाते हैं, उनकी परवरिश में दिखाई देने वाला समय तो कम हो जाता है, पर ऐक्चुअल समय बढ़ जाता है. दोनों की कोचिंग, स्कूल, हॉबी कोर्सेस का समय अलग उस पर रोहित का भी काम पर जाने-आने का कोई समय नहीं. वो तीनों अपनी ज़िंदगी के सबसे क्रूशियल समय में थे. बच्चे नौकरी के संघर्ष में कूदने की तैयारी के साथ एक हेल्दी और सफलता के लिए ज़रूरी मेहनती लाइफ़-स्टाइल बनाने का भी संघर्ष कर रहे थे. और रोहित अधिक से अधिक पैसे कमाकर फ़्यचर सिक्योर करने की भागदौड़ में व्यस्त था, तकि शरीर थकने लगे, उस उम्र से पहले रिटयरमेंट ले सके. ऐसे में उनकी दैनिक व्यावहारिक ज़रूरतों के साथ भावनात्मक ज़रूरतों के लिए भी उनके समय पर उपलब्ध रहना ज़रूरी लगता था आयशा को. रोहित के प्रमोशंस के साथ उसकी व्यस्तता, और आयशा पर निर्भरता भी बढ़ती जा रही थी. कब टुअर पर जाना है, वो तो बस इन्फ़ॉर्म करता था. टिकट बुकिंग से लेकर पैकिंग तक आयशा को ही करना था. ऑफ़िशल मेहमानो के लिए डिनर बनाता तो शेफ़ ही था, पर अगर आयशा का ऑब्ज़र्वेशन न हो तो काम बिगड़ना तय था.
फिर सास भी अक्सर मन ऊबने पर आ जातीं तो महीना-पंद्रह दिन बिताकर जातीं. उनका बिस्तर और सूटकेस रोहित और आयशा के बेडरूम में ही पड़ता था. वैसे तो उन्हें आयशा की हर बात से चिढ़ थी, पर पेंटिंग से तो विशेष नफरत थी. उनके आने से पहले और जाने तक तो आयशा खुद ही सब समेटकर रख देती थी. बात सिर्फ उनके आने से बढ़ने वाले छोटे-मोटे कामों की नहीं थी, उनकी रोज़ की बिन मतलब की बातों का बतंगड़ बनाकर बोले जाने वाले अपशब्द, शिकायतें…किसी के भी सामने किया जाने वाला अपमान किसी क्रिएटिव मूड को ध्वस्त करने के लिए काफ़ी थीं. यही नहीं, नौकरों से इतनी बिन बात झिकझिक करती थीं कि आयशा के लिए उन्हें हैंडल करना मुश्किल हो जाता.
आयशा अपने घर की ज़रूरतें समझती थी. ये भी कि किसी भी कर्मचारी को कैसे डील करना है, कौन से प्रिविलेज देने हैं कि वो हमारी ऐसी ज़रूरत के समय काम आ जाए, जिस पर नॉर्मल मेड चिढ़ जाया करती हैं. पर सास को तो वे अपने वर्चस्व को प्रमाणित करने का साधन लगते थे. नौकरो को बिन मतलब की बातों पर डांटते रहना उनके अनुसार उन्हें ‘सिर न चढ़ने देने’ और अपनी अहमियत साबित करने के लिए सबसे ज़रूरी कदम था. आयशा की सारी व्यवस्था उन दिनो गड़बड़ा जाती. आयशा उनके तानों और कटूक्तियों का जवाब सिर्फ़ ये सोचकर नहीं देती थी कि माहौल ख़राब होने से बच्चों को भी तो ध्यान एकाग्र करने में दिक़्क़त होती है. रोहित से भी शिकायत नहीं करती थी क्योंकि व्यावसायिक व्यस्तता और अत्यधिक काम के चलते उन्होंने ऐसे ही इतने टेंशन और हेल्थ प्रॉब्लम्स इन्वाइट कर लीं थीं कि उन्हें और टेंशन देना नहीं चाहती थी.
शिकायत न करने की एक वजह और थी. जब कभी सास रोहित के सामने उसकी इंसल्ट करतीं तो वे उसका पक्ष लेकर मां से लड़ना शुरू कर देते. नतीजा ये निकलता कि वो आपे से बाहर हो जातीं. फिर तो दोनों का झगड़ा कई दिनों के लिए बच्चों की पढ़ाई और आयशा के बचे-खुचे चैन का भी दुश्मन हो जाता. रोहित तो मां से झगड़ा करके गिल्ट में आ जाते और उनसे दुगुने दुलार से बात करने लगते. और सास का आहत अहं रोहित के ऑफ़िस जाने के बाद दुगुनी शिद्दत से आयशा को बेइज़्ज़त करने लगता. आयशा जानती थी जितना चुप रहेगी उनका ग़ुस्सा उतनी जल्दी उतरेगा और घर का माहौल उतनी जल्दी ठीक होगा. इसीलिए बस चुप रहती थी. आयशा ये सब चुपचाप सहकर ख़ुद अपनी नज़र में महान भी होती जाती. पर उसे खुद नहीं पता था कि ये सब सहने का सबसे बड़ा मोटीवेशन वो डेट होती थी, जिस पर उनके वापस जाने का रिज़र्वेशन आने से पहले ही हो गया होता था.
बच्चों के बड़े होने के साथ छोटी-छोटी पेंटिंग्स बनने लगी थीं और घर सजने लगा था, पर बहुत धीमी गति से. तभी उसकी बर्थडे पर मिली और रॉकी स्कल्पचर का सामान ले आए, जिसे देखकर खुश होने के बजाए आयशा की पलकें भर आईं. ‘पेंटिंग के सामान के लिए ही घर में जगह नहीं थी, अब स्कल्पचर?’ बच्चो ने पकड़ लिया और बिल्कुल वैसे ही उसकी पसंद की डिश बनाकर माहौल बनाकर बात करने के अंदाज़ में बैठकर जैसे वो उनकी कोई उलझन पकड़ लेने पर आयशा माहौल बनाकर बैठ जाया करती थी. पास ही बैठा रोहित टी.वी. पर मैच देख रहा था. मिली ने अपने पापा को घूरा और रोहित ने वॉल्यूम म्यूट कर दिया.
“नहीं बच्चो, तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है. समय तो है मेरे पास. पर टूटा-फूटा” कोई भी आर्ट डीपली करनी हो तो इट्स जस्ट लाइक मेडिटेशन. ध्यान एकाग्र करना पड़ता है. ऐट-अ-स्ट्रेच समय ज़रूरी है. फिर उससे भी बड़ी प्रॉब्लम है, जगह. एक अपना पर्सनल कोना. बार-बार सामान समेट नहीं सकते. रंग सूख जाते हैं और स्कल्पचर में तो…”
“ओ मॉम क्या हम सच में तुम्हारी हॉबी के लिए कोई कोना नहीं निकाल सकते घर में?” बच्चे उससे लिपटकर रोने लगे.
“अरे, रोते क्यों हो? बहुत डिसिप्लिन पसंद मां हूं मैं. एक बार तुम लोग अपना लक्ष्य पा लो, तभी तक सेवा कर रही हूं. ग्रैजुएशन से तो हॉस्टल में ही रहना है. फिर जगह भी होगी घर में और समय भी होगा मेरे पास.”
“ऐब्सलूटली!” रोहित ने टेलीविज़न देखते हुए ही कहा और समस्या ख़त्म होने वाले ‘दे ताली’ अंदाज़ में हथेली बच्चो की ओर बढ़ा दी.
दोनो को इंटर के बाद मनपनसंद कॉलेजेस में ऐड्मिशन मिल गया. जश्न के से माहौल में तैयारियां हुईं. एयरपोर्ट पर उन्हें बिदा करते समय आयशा बच्चों को गले लगाकर रो पड़ी तो दोनों की मैच्योर बातें सुनकर उदासी गहरी संतुष्ट मुस्कान में बदल गई. “अब रोने के नहीं मुस्काने के दिन हैं मां!”, “तुम कोई पुराने ज़माने की अनपढ़ मां थोड़े ही हो”, “तुम्हारी अपनी ख़्वाहिशें हैं और उन्हें पूरी करने की क़ाबलियत भी”, “तुम फ़िज़िकली फ़िट हो और मेंटली स्ट्रॉन्ग”, “अब तुम्हें समय और जगह मिली है”, ‘‘छुट्टियों में हम घर आएं, इससे पहले बड़ी वाली पेंटिंग पूरी हो जानी चाहिए”, “और स्कल्पचर की शुरुआत भी” “ये है तुम्हारा होमवर्क”.
घर के सन्नाटे में जब आयशा ने बच्चों के जाने के दुख के साथ अपने लिए एक जगह और समय मिलने की ख़ुशी भी बराबर से महसूस की तो एक पल के लिए तो गिल्ट में आ गई. पर तभी उसने ख़ुद को सम्हाला. अपने लिए जीना भी उसका अधिकार है. वो देर तक बच्चों के कमरे में अपनी भावी वर्कशॉप को महसूस करती रही. कल्पना के जाने कितने चित्र उसके मन में बनते-बिगड़ते रहे. आर्ट के एरिया में कितनी नई चीज़ें आ चुकी हैं. सबके बारे में जानकारी इकट्ठा करती रही है वो. बहुत छोटे लेवल पर चीज़ें बनाकर प्रैक्टिस भी करती रही है. सालों से गिफ़्ट देने के लिए किसी नए ट्रेंडिंग आर्ट में अपनी इनोवेटिव सोच घोलकर यूनीक पीसेस तैयार करती रही है. कोई पहचान ही नहीं पाता था कि ये प्रोफ़ेशनल से ख़रीदा हुआ नहीं है. आर्ट की पूरी वर्कशॉप उसके दिमाग़ में खुल चुकी थी, बस उसे कमरे में उतारने की कसर थी और वो भी फ़ुल-फ़्लेज्ड बिज़नेस की तरह…
रोहित की कार का हार्न बजा और आयशा ने ख़ुद के सिर पर टीप मारी ‘शेखचिल्ली!’
डिनर हो चुका था. रोहित और आयशा सोफ़े पर बैठे थे. सेंटर टेबल पर आयशा का एक प्लास्टिक का कंटेनर रखा था, जिसमें वो बनी हुई क्ले कपड़े में लपेटकर रखती थी. छोटे-छोटे समयो में समय का सदुपयोग करने का सामान उसी कंटेनर में रहता था. पिछले कुछ महीनों से आयशा ने अपनी बड़ी वाली पेंटिंग के लिए ये पत्तियां और फूल बनाने शुरू कर दिए थे. रोहित टेलीविज़न में अपना फ़ेवरेट मैच देख रहा था और आयशा बगल में बैठी क्ले की पत्तियां बना रही थी.
घर के सन्नाटे में जब आयशा ने बच्चों के जाने के दुख के साथ अपने लिए एक जगह और समय मिलने की ख़ुशी भी बराबर से महसूस की तो एक पल के लिए तो गिल्ट में आ गई. पर तभी उसने ख़ुद को सम्हाला. अपने लिए जीना भी उसका अधिकार है. वो देर तक बच्चों के कमरे में अपनी भावी वर्कशॉप को महसूस करती रही.
“मेरा बैग पैक कर देना. कल मैं मां को लेने जा रहा हूं.” रोहित टेलीविज़न देखते हुए ही बोला.
“अचानक?” आयशा को झटका सा लगा. ‘उफ! इतनी सारी क्ले बना ली है. जानती थी मिली और रॉकी के जाने के बाद घर का सन्नाटा खलेगा इसलिए ज़्यादा काम करने का मन करेगा. अब तो क्ले भी सूख जाएगी और…महीनाभर और टल गया उसका वर्क प्लान.’ आयशा के मन में पहला ख्याल आया.
“मगर मां तो अपने आप आ जाती हैं. फिर आप लेने क्यों जा रहे हैं? क्या तबियत ख़राब है उनकी?” आयशा ने धड़कते दिल से पूछा.
“नहीं, मैं उन्हें हमेशा के लिए लेने जा रहा हूं इसलिए ज़्यादा सामान होगा उनके पास. बहुत अकेलापन महसूस करने लगी हैं वो काफ़ी समय से. यहां आती थीं तो जाना चाहती नहीं थीं पर… जगह न होने से परेशान हो जाती थीं. अब हमारे घर में जगह भी है और तुम्हारे पास समय भी. तो समय आया है कि हम उन्हें वो सारा अटेंशन और अपनापन दें, जो वो हमेशा से डिज़र्व करती हैं पर हम अभी तक उन्हें दे नहीं पाए.”
आयशा सन्न. समझ नहीं आया उसे कि ये उसकी ज़िंदगी की सूनामी है या भूचाल? कैसे और कहां टिकाए ख़ुद को? कैसे गिरने से बचाए?
“मगर..उनका अपना बड़ा हवेली जैसा मकान है..”
“मकान बड़ा ज़रूर है, पर मेंटेन रखने की ताक़त उनमें अब कहां है? अरे उनमें अपना काम करने की ही ताक़त कहां बची है!”
“तो नौकर रखे जा सकते हैं!”
“नौकर आजकल सुनते कहां हैं? उनसे काम करवाना भी एक काम है. तुमसे बेहतर कौन जानता है?”
“किराएदार हैं…”
“किराएदार किसी बुज़ुर्ग का अकेलापन नहीं दूर कर सकते. उन्हें हमारे साथ की ज़रूरत है. भावनात्मक सहारे की ज़रूरत है. ज़रूरत है कि कोई हो, जो उन्हें सुने, उनका ख़्याल रखे. उनके काम अपनेपन के साथ करे. अब तक हम मजबूर थे. कैसे कहते कि हमारे कमरे में बिस्तर डालकर परमानेंट रहो.”
“पर आपके और भी तो दो भाई हैं. आप परमानेंट लाने की बात क्यों कर रहे हो? कुछ ऐसा नियम क्यों न बना लिया जाए कि वो तीनो जगह…”
“क्या ताया-पांचा करने की बात कर रही हो? तुम इतनी स्वार्थी कैसे हो सकती हो? इतनी नासमझ? क्या साउंड करता है इस तरह किसी बुज़ुर्ग को बांटना? जैसे हमें तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं, तुम बोझ हो हम पर, जिसे हम मिलकर ढोएंगे. हर इनसान चाहता है उसका एक परमानेंट घर हो, उस घर में उसका अपना एक कमरा हो, जिसमें वो बिल्कुल अपने ढंग से स्थायी रूप से रह सके, अपनी मर्जी से कुछ भी कर सके. इतनी छोटी-सी भावनात्मक ज़रूरत तुम्हारे समझ में नहीं आ रही?”
“यही भावनात्मक ज़रूरत तो मेरी भी है…”
“तो तुम्हारा बेडरूम है न तुम्हारे पास?”
“बच्चे छुट्टी में आएंगे तो वैसे ही बेड पड़ जाया करेगा, जैसे मां के लिए पड़ता था. उनसे तो तुम्हें प्राइवेसी चाहिए भी नहीं. कि चाहिए? बाक़ी समय…”
“बाक़ी समय ये लिविंग रूम, स्टोर रूम, गेस्ट रूम भी तो है…और मेरी पेंटिंग्स…”
“अरे तो कब मैंने मना किया पेंटिंग्स के लिए? कब तुम्हारे सामान ख़रीदने तुम्हारे साथ झख नहीं मारी?”
“और मेरी बड़ी पेंटिंग…”
“उसकी तो तुम बात ही न करो. वो बननी होती तो अब तक बन गई होती. इतने साल से बच्चे कोचिंग और स्कूल जा रहे हैं, घर में नौकर हैं, इतने साल से क्या मां तुम्हारा हाथ पकड़ने आ रही थीं? अपना आलस को मां के मत्थे न मढ़ो.”
“और उनकी तानाशाही से भरी बातें, बात-बात में मुझे बेइज़्ज़त करना…”
“तुम्हें हो क्या गया है आयशा जो आज ऐसी बातें कर रही हो? ऐसा क्या धक्का लग गया है तुम्हें मां को यहां लाने के लिए कहने पर जो हर बात का बतंगड़ बनाने पर तुली हो.” रोहित के स्वर का धिक्कार आक्रामक हो गया, “अरे ऐसे तो तुम्हारी मम्मी ने भी अक्सर ऐसी बातें कही हैं, जो सेल्फ़-रेस्पेक्ट को हर्ट करने वाली थीं. तो क्या मैंने उन्हें नमस्ते करना बंद कर दिया या अपने यहां बुलाना बंद कर दिया?”
हतप्रभ आयशा चुप!! उससे कुछ बोलते न बना. शब्द मन में घुमड़ रहे थे. ‘हां मम्मी ने भी ऐसी बातें कही हैं. वैसे ही अनजाने में जैसे कई इनसान नासमझी में कह जाते हैं. आपने भी कई बार कही हैं और मैंने भी. और वो भी पूरे शादीशुदा जीवन में मुश्किल से आठ दस बार. उसकी तुलना मांजी दिन महीने में आठ दस बार सीधे जानबूझकर आंख निकालकर चुटकी बजाकर ‘ए, अपनी औकात में रहो’, ‘तुम निकलो यहां से मुझे अपने बेटे से पर्सनल बात करनी है’, ‘ये मुझे पसंद नहीं तो नहीं हो सकता’ जैसे शब्दों से कैसे की जा सकती है. वो भी तब जब ये पूरे परिवार, पड़ोसी, बढ़ते बच्चों, यहां तक कि नौकरों के सामने भी बोले गए हों. घंटों धाराप्रवाह दी गईं गालियां और बद्दुआएं रोहित के लिए बस ऐसी बातें थीं, जिनका वो बतंगड़ बना रही है. उसके साथ पेंटिंग का सामान ख़रीदने जाना एक बोझ भरा एहसान था तो फिर उन सब ‘हूं,’ ‘ऐब्सलूटली’, ‘नाइस डिसीज़न’ और प्रेरित करने वाले वाक्यों का क्या मतलब था, जो आयशा ने अपने पैशन के बारे में बताते हुए सुने थे.
बच्चों का बेडरूम मां के बेडरूम के रूप में सेट हो चुका था और घर की रानी रोहित की मां अपने पूरे घमंड और ठसक के साथ उसमें विराजमान हो चुकी थीं.
आज आयशा ने अपना कैनवस टांड़ से उतारकर डस्टबिन के किनारे एक बड़े गार्बेज बैग में रख दिया था, ताकि कल कूड़े वाला उसे ले जाए. इस घर में वो बस वही जगह डिज़र्व करता था.
दोनो बिस्तर के दो किनारों पर लेटे थे. बातचीत बंद थी. आयशा की आंखों से पिछले चंद दिनो की तरह नींद ग़ायब थी. आंसू ठहर नहीं रहे थे. उसके दिमाग़ में बस रोहित का एक वाक्य हथौड़े की तरह बजता जा रहा था. चाहकर भी वो उसकी आवाज़ को अनसुना नहीं कर पा रही थी. “अब हमारे घर में जगह भी है और तुम्हारे पास समय भी. तो समय आया है कि हम उन्हें वो सारा अटेंशन और अपनापन दें, जो वो हमेशा से डिज़र्व करती हैं पर हम अभी तक उन्हें दे नहीं पाए.”
‘मां अटेंशन और अपनापन डिज़र्व करती हैं’ ‘मां समय और जगह डिज़र्व करती हैं’ तो फिर वो क्या है? क्या वो कुछ भी ‘डिज़र्व’ नहीं करती? अपने ही घर में अपना एक पर्सनल कोना? नहीं, कोई मुझे समझता है का एहसास? नही, यहां तक कि सेल्फ़-रेस्पेक्ट भी नहीं. नहीं, रोहित की नज़र में वो कुछ भी डिज़र्व नहीं करती? आयशा को लग रहा था कि उसके दिल में भी सिर की तरह भयंकर दर्द होने लगा है. ‘तुम केवल रेस्पॉन्सबिलिटीज़ डिज़र्व करती हो’ भीतर से उसका अक्स व्यंग्य में हंसा और आयशा के दिल का दर्द भयानक हो गया. वो मन ही मन चीखी. मन हुआ रोहित को झिंझोड़ दे, पर नहीं अब कुछ भी कहने का कोई फ़ायदा नहीं है. सब ख़त्म हो गया है.
और तब आयशा को समझ आया कि सारी ग़लती उसकी है. उसने ख़ुद ही तो अपने निर्णयों से रोहित को को बताया है कि वो कुछ भी डिज़र्व नहीं करती. वो हर बार समझौता कर सकती है, वो भी ख़ुशी-ख़ुशी. उसने ख़ुद ही तो रोहित को टेंशन न देने की सोचकर सास के बहुतेरे बतंगड़ों के बारे में बताया ही नहीं और जब कभी बताया भी तो इतने आराम से इतने सोफ़ेस्टिकेटेड तरीक़े से कि खुद ही उसने बतंगड़ों को बात बना दिया. उसने जब ख़ुद ही ख़ुद को बच्चों और रोहित से पीछे रखा तो आज रोहित ने उसे अपने जीवन के सबसे इम्पॉर्टेंट पर्सन अपनी मां के भी पीछे रख दिया तो आश्चर्य कैसा?
जब ख़ुद ही उसने ख़ुद की सेल्फ़ रेस्पेक्ट को कैनवस के साथ सिर्फ़ ये सोचकर ताक पर रख दिया कि चलो महीने पंद्रह दिन की बात है तो रोहित क्यों न उसे हमेशा के लिए ताक पर रखने की सोच ले? जो सहना ग़लत है, वो हमेशा से ग़लत था! क्यों उसने पहली बार में कोई सीमा-रेखा नहीं खींची? क्यों उसने इतने साल उन बतंगड़ों को सिर्फ़ इसलिए बात समझा कि वो कुछ दिनों की बात थी? सोचते-सोचते कब उसके दिल का दर्द बंद हो गया, पता ही नहीं चला. ऐसा लगा वो बिल्कुल हल्की हो गई है. वो उठी. क़दम जैसे ज़मीन पर थे ही नहीं. उसने डस्ट बिन के बगल में रखा कैनवस उठाया, पर पैर बरबस ही जैसे हवा में उठ गए और उठते ही गए. वो आसमान तक पहुंच गई थी. उसने अपना कैनवस एक झटके में आसमान पर बिखेर दिया. वो जैसे आसमान ही बन गया. अरे कैनवस कहां गायब हो गया? पर करना भी क्या है कैनवस का? उसने पास रखी बादल की तूलिका उठा ली. अब यहीं रंग भरेगी वो. नहीं जाना उसे घर वापस. वहां उसकी भावनाओं के लिए, उसके मेडिटेशन के लिए यहां तक कि उसकी सेल्फ़-रेस्पेक्ट के लिए भी कोई जगह नहीं. वहां जाकर क्या करना? और फिर वहां अगर उसकी पेंटिंग बन भी गई तो उसके लिए सामान जुटाने को एहसान और पेंटिंग को हिकारत की नज़र से देखा जाएगा. नहीं जाना…वो हवा में तैरती हुई आसमान पर पेंटिंग कर रही थी. हल्की, निश्चिंत और आनंदमग्न….
घर लोगों से भर गया था. आयशा की बॉडी ज़मीन पर रखी थी. बच्चे और रोहित फूट-फूटकर रो रहे थे तभी मांजी की हालत बिगड़ने लगी. वो अपना गला पकड़कर खखारने लगीं. बेचैनी उनके चेहरे पर छा गई. रोहित रोते-रोते उठा और मेड को आदेश दिया, “थोड़ा कुछ बनाकर मां को खिला दो. उन्हें ख़ाली पेट ऐसिडिटी हो जाती है. बड़ी तकलीफ़ होती है उससे. अरे हां, कुछ काम बढ़ेंगे अब. सोचकर बता देना कि तुम्हें और पैसे लेकर करने हैं या तुम्हारी नज़र में कोई और हो तो देख लेना…”







