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बंदिनी: भारतीय सिनेमा के स्वर्ण काल का अद्भुत नगीना है यह फ़िल्म

जय राय by जय राय
February 22, 2022
in ओए एंटरटेन्मेंट, ज़रूर पढ़ें, रिव्यूज़
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बंदिनी: भारतीय सिनेमा के स्वर्ण काल का अद्भुत नगीना है यह फ़िल्म
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जब आपको सारी दुनिया एक जैसी लगने लगे, सारे लोगों की शक्लें एक जैसी दिखने लगे इसका मतलब कुछ नया नहीं हो रहा है. ऐसे में लाज़मी है कि आप कुछ नया ढूंढ़ने की कोशिश ज़रूर करेंगे. ओटीटी के इस ज़माने में जब सब कुछ एक जैसा लगने लगा है. ऐसे में हमारा सुझाव है आप थोड़ा पीछे जाएं और हमारे महान बॉलिवुड निर्देशकों की कालजयी फ़िल्में ज़रूर देखें. आज बात करते हैं साठ के दशक के मशहूर और महानतम निर्देशक बिमल रॉय की. वर्ष 1963 की फ़िल्म “बंदिनी” बिमल रॉय की आख़िरी फ़िल्म थी. फ़िल्म कामयाब रही थी उस वर्ष की फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार के बहुत सारे कैटेगरी में इस फ़िल्म को शामिल किया गया और पुरस्कारों से भी नवाज़ा गया.

फ़िल्म: बंदिनी
निर्माता/ निर्देशक: बिमल रॉय
कलाकार: नूतन बहल, अशोक कुमार, धर्मेंद्र, तरुण बोस, राजा परांजपे और अन्य
स्क्रीन प्ले: नबेंदु घोष
डायलॉग: पॉल महेंद्र
म्यूज़िक: सचिन देव बर्मन
गीत: शैलेंद्र/ गुलज़ार

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1963 की बंदिनी बिमल रॉय की दूसरी नारी प्रधान फ़िल्म थी, बिमल दा इसके पहले सुजाता जैसी बेहतरीन नारी प्रधान फ़िल्म बना चुके थे. भारत जैसे पुरुष प्रधान देश में साठ और सत्तर के दशक में इस तरह की फ़िल्में बनाना एक तरह से सराहनीय ही नहीं, साहसी क़दम था. हालांकि आज भी जब बिमल रॉय की चर्चा होती है तब फ़िल्मों के जानकार हमेशा सुजाता, काबुलीवाला, दो बीघा ज़मीन, मधुमती की बात ज़्यादा करते हैं. इन फ़िल्मों के मुक़ाबले बंदिनी की चर्चा कम होती है. अमूमन बंदिनी को गुलज़ार साहब की डेब्यू फ़िल्म के तौर पर याद किया जाता है. गुलज़ार साहब ने 23 साल की उम्र में इस फ़िल्म से बॉलिवुड में अपना आग़ाज़ किया था. बहुत सारे मौक़ों पर गुलज़ार साहब ने बताया है,‘‘उस वक़्त मैं एक मोटर गराज में पेंटर का काम करता था. मैंने कभी सोचा नहीं था कि कभी बॉलिवुड में आऊंगा.’’ उस दौर में बॉलिवुड में बिमल रॉय, एसडी बर्मन और शैलेंद्र की बहुत अच्छी जुगलबंदी थी. एक बार किसी बात को लेकर शैलेंद्र और सचिन देव बर्मन में थोड़ी-सी अनबन हो गई थी. शैलेंद्र के कहने पर गुलज़ार के दोस्त देबु सेन, उन्हें लेकर बिमल रॉय के पास गए. बिमल रॉय ने उन्हें सीन समझाया और गुलज़ार साहब ने “मोरा गोरा रंग लई ले” गाना लिखा. गुलज़ार बताते हैं की मेरा गाना ख़त्म होते-होते शैलेंद्र और एसडी बर्मन की दोस्ती वापस पटरी पर लौट आई थी. उसके बाद एसडी बर्मन ने कहा कि किसी नए आदमी के साथ मुझे काम करने में ज़्यादा आसानी नहीं होगी. शैलेंद्र के लिए बहुत अजीब-सी परिस्थिति पैदा हो गई थी. तब बिमल रॉय को यह बात अच्छी नहीं लगी. उन्होंने कहा कि इतना अच्छा लिखनेवाले के साथ इस तरह से व्यवहार नहीं कर सकते. बिमल रॉय ने कहा तुम अभी से मेरे असिस्टेंट बन जाओ. वापस उस गराज में मत जाना. गुलज़ार के लिए यह लम्हा बहुत भावुक था, क्योंकि इसके पहले उन्हें किसी ने भी इस तरह से प्रोत्साहित नहीं किया था. गुलज़ार इतने भावुक हो गए कि वहीं फूट-फूट कर रोने लगे. इस तरह से भारत को गुलज़ार जैसा नायाब गीतकार और फ़िल्मकार मिला, जिसने आगे जाकर भारत को एक से बढ़कर एक बेहतरीन गाने, कविताएं और फ़िल्में दीं.

बंदिनी की कहानी नबेंदु घोष ने लिखी थी. यह फ़िल्म मुख्यतः चारु दत्त चक्रबर्ती की कहानी “तामसी” पर आधारित थी. फ़िल्म की कहानी का कालखंड आज़ादी के पहले का है. देशभक्ति, आज़ादी के लिए कर्तव्य और प्रेम के प्रति समर्पण के साथ कहानी आगे बढ़ती है. फ़िल्म के मुख्य किरदार कल्याणी (नूतन बहल) की कहानी जेल से शुरू होती है. जहां उसकी मुलाक़ात डॉक्टर देवेंद्र (धर्मेंद्र) से होती है, जो महिला वॉर्ड में तपेदिक (टीबी) से ग्रस्त एक महिला क़ैदी का इलाज़ करने के लिए आते हैं. डॉक्टर देवेंद्र कहते हैं इस मरीज़ को देखभाल की ज़रूरत है, क्या आप में से कोई इनकी देखभाल करेगा. सबके पीछे हटने पर कल्याणी कहती है कि मैं इनकी देखभाल करूंगी. इस बात पर जेलर और डॉक्टर देवेंद्र दोनों हैरान हो जाते हैं. वे पूछते हैं कि जहां सारी बुज़ुर्ग महिलाओं ने इस काम से पल्ला झाड़ लिया, तुम क्यों करना चाहती हो? क्या तुमको पता है कि यह बहुत ख़तरनाक बीमारी है, जवान लोगों को जल्दी ग्रसित कर सकती है .कल्याणी कहती है इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है. सिर्फ़ कहने भर के लिए भी दूर-दूर तक कोई नहीं है. उसके बाद इलाज़ शुरू हो जाता है. डॉक्टर देवेंद्र और कल्याणी की मुलाक़ात जल्दी-जल्दी होने लगती है. इसके साथ ही डॉक्टर देवेंद्र का झुकाव कल्याणी की तरफ़ बढ़ने लगता है. दोनों की बढ़ती नज़दीकियां जेल के लोगों के लिए चर्चा का विषय बन जाती है. कल्याणी डॉक्टर से पूछती है कि क्या आप जानते हैं कि मैं किस अपराध की सजा काट रही हूं? डॉक्टर देवेंद्र बताते हैं, हां मैं जानता हूं लेकिन किसी की एक ग़लती से उसे हमेशा के लिए दोषी बना देना भी तो सही नहीं है. कल्याणी कहती है कि मैं हत्या की दोषी हूं. मैं आपके प्रति बहुत श्रद्धा रखती हूं लेकिन इससे ज़्यादा मैं आपके साथ कुछ और नहीं सोच सकती. जब कल्याणी जेल के अंदर हो रही चर्चा से बचने के लिए ख़ुद को अलग करना शुरू कर देती है, थोड़ी बातचीत और कुछ मुलाक़ातों के बाद डॉक्टर देवेंद्र कल्याणी को बताते हैं कि मैं तुम्हारे रास्ते में नहीं आऊंगा और वह हॉस्पिटल छोड़ कर जाने का फ़ैसला करते हैं. जेलर डॉक्टर देवेंद्र के नज़दीकी रिश्तेदार होने के नाते जानना चाहते हैं कि आख़िर में ऐसी क्या बात है, जिसके कारण कल्याणी ने डॉक्टर देवेंद्र के प्रस्ताव को ठुकरा दिया. जेलर के कहने पर कल्याणी उन्हें अपनी बीती ज़िंदगी के बारे में लिखकर बताने को कहती है. यहां से कहानी फ़्लैशबैक में चली जाती है.

फ़्लैशबैक में जाकर जब कहानी आगे बढ़ने लगती है, तब पता चलता है कि कल्याणी अपनी मां और भाई को बहुत पहले खो चुकी थी. कल्याणी के भाई सामाजिक कार्यकर्ता थे, किसी हादसे में कल्याणी जैसी किसी लड़की को बचाते हुए उनकी मौत हो गई. वह गांव में अपने पोस्ट मास्टर पिता के साथ रहती थी. एक दिन अजीब परिस्थितियों में इत्तेफ़ाक़ से कल्याणी की मुलाक़ात आज़ादी के दीवाने बिकास (अशोक कुमार) से होती है. बिकास को कल्याणी अच्छी लगती है, जिसके कारण उनका कल्याणी के घर आना-जाना बढ़ जाता है. इसके बाद गांव में उन दोनों के रिश्तों को लेकर चर्चा शुरू हो जाती है. इसी दौरान जब कल्याणी को बिकास अच्छे लगने लगते हैं तब गुलज़ार साहब का डेब्यू वाला गाना फ़िल्म को आगे बढ़ाता है “मोरा गोरा अंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे. छुप जाऊंगी रात ही में मोहे पी का संग दई दे”. किसी भी लिरिसिस्ट के लिए इससे बेहतरीन डेब्यू नहीं हो सकता है. गाने की रचनात्मकता देखेंगे तो समझ आएगा की यहां बिल्कुल भी कुछ नया करने की कोशिश नहीं की गई है. गुलज़ार साहब ने फ़िल्म के हिसाब से जो देखा, जैसे महसूस किया उसे लिख दिया. एक बार बिकास को बुख़ार होता है और वो कल्याणी के घर रुक जाते हैं. जिसके बाद कल्याणी के गांव वाले उनके रिश्तों को लेकर अफ़वाह उड़ाना शुरू कर देते हैं. तमाम चर्चाओं पर विराम लगाने के लिए बिकास कल्याणी से विवाह करने की बात करते हैं. कल्याणी और उनके पिता इस प्रस्ताव को मान जाते हैं. इसके तुरंत बाद किसी ज़रूरी काम से बिकास को शहर जाना पड़ता है, जो वादा करके जाते हैं कि जल्दी लौटेंगे लेकिन कभी लौट कर वापस नहीं आते. उसके बाद कहानी एक अलग मोड़ पर घूम जाती है. गांव में बिकास के रिश्ते के साथ होने वाली चर्चा कल्याणी को चुभने लगती है. इससे बचने के लिए कल्याणी अपने बुज़ुर्ग पिता को छोड़कर बिकास को ढूंढ़ने के लिए शहर जाने का निश्चय करती है और रात के अंधेरे में घर से निकल जाती है. इस सीन के दौरान बैक्ग्राउंड में बजनेवाले शैलेंद्र और सचिन देव बर्मन की बेहतरीन कंपोज़िशन “ओ जानेवाले हो सके तो लौट के आना, इस घाट को इस बाट को तूम भूल ना जाना. बचपन के तेरे मीत तेरे संग के सहारे, ढूंढ़ेंगे तुझे गली-गली सब यह ग़म के मारे” आपको झकझोर के रख देगा. आपके दिमाग़ में तमाम सवाल और जवाब गुज़रने लगेंगे. इस गीत में कल्याणी का धीरे-धीरे आगे बढ़ना बार-बार मुड़कर पीछे देखना बहुत कुछ बयान करता है, कल्याणी का प्यार के प्रति समर्पण, अपनी ज़िम्मेदारियों से दूर जाना एक असमंजस की स्थिति वाली मनोदशा से गुजरना.

शहर पहुंचकर कल्याणी को वहां के अस्पताल में नौकरी मिल जाती है. कल्याणी को मानसिक रूप से बीमार एक महिला का केयर टेकर दिखाया गया है. जब कल्याणी को पता चलता है कि वही महिला उसके होने वाले पति बिकास की पत्नी है (बिकास को आज़ादी की लड़ाई जारी रखने के लिए किसी मजबूरी के कारण इस महिला से शादी करना पड़ता है जिसका ज़िक्र इस फ़िल्म में है) उसे बहुत दुःख होता है. इसके बाद कल्याणी के पिता उसे ढूंढ़ने के लिए शहर जाते हैं और कल्याणी से मिलने के लिए अस्पताल आ रहे होते हैं, तभी एक ऐक्सिडेंट में उनकी मौत हो जाती है. इन सारी घटनाओं से दुःखी होकर कल्याणी को ग़ुस्सा आ जाता है और वह उस औरत को ज़हर देकर मार देती है. इस सीन के लिए बिमल रॉय ने जलते हुए स्टोव को कहानी का हिस्सा बनाया है. कल्याणी अपना गुनाह क़बूल कर लेती है और उसे सात साल की सज़ा हो जाती है.
कल्याणी द्वारा लिखी गई इस कहानी से जेलर डॉक्टर देवेंद्र और डॉक्टर देवेंद्र की मां को अवगत कराते हैं. डॉक्टर देवेंद्र की मां को इन सारी बातों से कोई फ़र्क़ नही पड़ता और वह कल्याणी को अपनी बहू बनाना चाहती हैं. बहुत समझाने के बाद कल्याणी डॉक्टर देवेंद्र से शादी करने को तैयार हो जाती है. बंदिनी का क्लाइमैक्स आपको बताता है की फ़िल्म का नाम बंदिनी क्यों है. जब कल्याणी डॉक्टर देवेंद्र के घर के लिए ट्रेन में सवार होती है, उसी ट्रेन में उसकी मुलाक़ात अपने पूर्व प्रेमी बिकास से होती है, जिसे देखकर कल्याणी भावुक हो जाती है. यहां फिर से आपको शैलेंद्र और सचिन देव बर्मन की एक और बेहतरीन कंपोज़िशन सुनाई देगी “ओह रे मांझी, मेरे साजन है उस पर. मैं मन मार, मैं इस पार ले चल पार. मैं बंदिनी पिया की, मैं संगिनी हूं साजन की.’’ गाने का संदेश एकदम साफ़ है कल्याणी को इसी लम्हे का इंतज़ार था. यहां कल्याणी बिकास का पीछा करती है जब बिकास ट्रेन से उतरकर रेल्वे स्टेशन के नज़दीक पानी की जहाज़ पर सवार होने के लिए चले जाते हैं. कल्याणी पीछे से भागते हुए आती है उस वक्त जहाज़ खुलने वाला ही होता है. जहाज़ पर चढ़ने के लिए सिर्फ़ एक पतली पट्टी बची होती है. कल्याणी को आख़िरी समय में उस पतले पट्टी पर चढ़कर जहाज़ पर सवार होते हुए दिखाया गया है बिकास और कल्याणी के मिलन के साथ ही फ़िल्म ख़त्म हो जाती है.

बंदिनी अपने बेहतरीन स्क्रीन्प्ले, डायलॉग, बैक्ग्राउंड म्यूज़िक और उम्दा गानों के साथ आज भी उतनी ही नई लगती है जितनी कि वर्ष 1963 में अपने रिलीज़ के वक़्त रही होगी. फ़िल्म के सारे गाने एक से बढ़कर एक हैं. कल्याणी के जेल में रहते हुए दिखाए गए गाने उस वक्त की मनोस्थिति बताने के लिए एकदम सटीक लगते हैं. शैलेंद्र का लिखा हुआ गीत “अब के बरस भेज भैया को बाबुल, सावन में लीजो बुलाई रे. लौटेंगी जब मेरे बचपन की सखियां दीजो संदेशा पठाई रे. अंबवा तले फिर से झूले पड़ेंगे, रिमझिम पड़ेंगी फुहारें. लौटेंगी फिर तेरे आंगन में बाबुल सावन की ठंडी बहारें. छलक नयन मोरा कसके रे जियरा, बचपन की जब याद आए रे. बीते रे जुग कोई चिठिया ना पाती ना कोई नैहर से आए”. फ़िल्म में जब यह गीत बजना शुरू होता है, तब ऐसा लगता है कि फ़िल्म कुछ देर के लिए रुक सी गई है. यह शैलेंद्र के कलम का जादू है जो सिर्फ़ साढ़े तीन मिनट में महिलाओं की मनोस्थिति के साथ आपको पूरा हिंदुस्तान दिखा देते हैं. इसे आशा भोंसले जी ने गाया है. यह गाना उस वक़्त के ग्रामीण भारत की महिलाओं के दर्द को बयान करता है. भारत पहले से बहुत बदल गया है लेकिन आज भी यह गाना बहुत सारे लोगों को रुला सकता है. बंदिनी ख़त्म होते-होते सकारात्मक संदेश छोड़ जाती है. आपके अंदर प्रेम कभी भी समर्पण के साथ आता है और जिसके अंदर दोनों का संतुलन हो, उसकी दुनिया में प्रेम ही प्रेम है. इसलिए बंदिनी आपको फ़िल्मों का टेस्ट बदलने के अलावा भारत में बॉलिवुड के बेहतरीन दौर को महसूस करने के लिए भी देखनी चाहिए.

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जय राय

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जय राय पेशे से भले एक बिज़नेसमैन हों, पर लिखने-पढ़ने में इनकी ख़ास रुचि है. जब लिख-पढ़ नहीं रहे होते तब म्यूज़िक और सिनेमा में डूबे रहते हैं. घंटों तक संगीत-सिनेमा, इकोनॉमी, धर्म, राजनीति पर बात करने की क़ाबिलियत रखनेवाले जय राय आम आदमी की ज़िंदगी से इत्तेफ़ाक रखनेवाले कई मुद्दों पर अपने विचारों से हमें रूबरू कराते रहेंगे. आप पढ़ते रहिए दुनिया को देखने-समझने का उनका अलहदा नज़रिया.

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