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ओए अफ़लातून
Home बुक क्लब कविताएं

ग़ुलाम: रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ की कविता

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
September 24, 2022
in कविताएं, बुक क्लब
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Ramashankar-yadav-vidrohi_Poem

Brangwyn, Frank; The Slave Market; Atkinson Art Gallery Collection; http://www.artuk.org/artworks/the-slave-market-65821

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सदियों से शक्तिशाली लोग, वर्ग या जातियां कमज़ोरों को ग़ुलामी की बेड़ियों में जकड़ती रही हैं. अतीत की उन क्रूरताओं की दास्तां को कविता की शक्ल दी दिवंगत कवि रमाशंकर यादव विद्रोही ने.

तब बने बाज़ार और बाज़ार में सामान आए,
और बाद में सामान की गिनती में खुल्ला बिकते थे ग़ुलाम,
सीरिया और काहिरा में पट्टा होते थे ग़ुलाम,
वेतलहम-येरूशलम में गिरवी होते थे ग़ुलाम,
रोम में और कापुआ में रेहन होते थे ग़ुलाम,
मंचूरिया-शंघाई में नीलाम होते थे ग़ुलाम,
मगध-कोशल-काशी में बेनामी होते थे ग़ुलाम,
और सारी दुनिया में किराए पर उठते ग़ुलाम,
पर वाह रे मेरा ज़माना और वाह रे भगवा हुकूमत!
अब सरे बाजार में ख़ैरात बंटते हैं ग़ुलाम

लोग कहते हैं कि लोगों पहले ऐसा न था,
पर मैं तो कहता हूं कि लोगों कब, कहां, कैसा न था?
दुनिया के बाज़ार में सबसे पहले क्या बिका था?
तो सबसे पहले दोस्तों… बंदर का बच्चा बिका था
और बाद में तो डार्विन ने सिद्ध बिल्कुल कर दिया,
वो जो था बंदर का बच्चा,
बंदर नहीं वो आदमी था

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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