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Home ज़रूर पढ़ें

आंकड़ों का प्रॉपगैन्डा और जीडीपी की कहानी

शिल्पा शर्मा by शिल्पा शर्मा
July 31, 2023
in ज़रूर पढ़ें, नज़रिया, सुर्ख़ियों में
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आंकड़ों का प्रॉपगैन्डा और जीडीपी की कहानी
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समय-समय पर सत्ताधारी पार्टी के मुखिया, सांसद और नेता देश के अर्थशास्त्र को लेकर तरह-तरह के दावे करते रहते हैं. आकलन किया जाए तो अक्सर पाया जाता है कि ये उनके द्वारा बताए गए आंकड़े, सच तो हैं लेकिन केवल एक ही नज़रिए से और तस्वीर का दूसरा पहलू तो वे दिखाते ही नहीं हैं. इसी तरह की आंकड़ों की बाज़ीगरी हाल ही में भाजपा के सांसद तेजस्वी सूर्या ने की है. आइए, आंकते हैं क्या है उनके दावे की सत्यता.

वर्ष 1954 में अमेरिकी लेखक डेरिल हफ़ ने एक सुंदर किताब लिखी थी, जिसका नाम था ‘‘हाउ टु लाइ विद स्टैटिस्टिक्स’’. इस किताब में उन्होंने बताया था कि कैसे आप आंकड़ों को ‘संदर्भ के बाहर’ यानी आउट ऑफ़ कन्टेक्स्ट पेश करते हुए किसी स्थिति को डेटा और गणना के साथ, उस स्थित से बिल्कुल ही अलग अर्थ दे सकते हैं. हालांकि यह किताब 50’ के दशक में लिखी गई थी, लेकिन यह आज भी कंपनियों और राजनेताओं के लिए प्रासंगिक है, क्योंकि आज भी वे डेटा यानी आंकड़ों की बाज़ीगरी या यूं कहें कि उसका चालाकी से प्रबंधन करके स्थितियों को अपने अजेंडा के अनुसार दिखा/ बता रहे हैं.

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हाल ही में केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के सांसद तेजस्वी सूर्या ने कहा कि वर्ष 1947 से वर्ष 2014 तक ‘‘सभी पिछली सरकारों ने मिलकर जीडीपी को 2 ट्रिलियन डॉलर तक ही पहुंचाया, लेकिन हमारी सरकार ने इसमें बीते पांच वर्षों में ही इसमें 1 ट्रिलियन डॉलर की बढ़ोतरी कर दी, हमारी सरकार के काम की गति देखिए.’’ मैं इस दावे से अचरज में थी कि यह दावा सत्ताधारी पार्टी के एक ऐसे व्यक्ति की ओर से आया है, जो सांसद है! मैं समझ नहीं पाई कि यह सांसद महोदय तथ्य से अनजान हैं या फिर लोगों से जानबूझकर झूठ बोल रहे हैं. उनके इस कथन ने मुझे एक कहानी की याद दिलाई, जो मैं अब आपको सुनाने जा रही हूं.

बहुत पहले की बात है, एक बुज़ुर्ग व्यक्ति थे. जब उन्हें मृत्यु का आभास हुआ तो उन्होंने अपने बेटे को बुलाया और कहा, ‘‘मैं तुम्हें 1 लाख रुपए दे रहा हूं. इसे 10 वर्षों के लिए बैंक एफ़डी में डाल दो, लेकिन एफ़डी तोड़ना मत और दो-तीन पीढ़ियों बाद हमारे नाती-पोतों के पास पर्याप्त धन हो जाएगा. वे आर्थिक रूप से संपन्न और स्वतंत्र रहेंगे.’’ उनके बेटे ने अपने पिता की बात मान ली और पैसों की एफ़डी करवा दी. कुछ समय बाद बुज़ुर्ग व्यक्ति की मौत हो गई, लेकिन उनका पैसा बैंक में रखा-रखा बढ़ता रहा. अगले 10 वर्ष में वह दोगुना हो गया और हर 10 वर्ष बाद वह पैसा दो गुना होता रहा. फिर 50 वर्ष में वह 1 लाख रुपया दोगुना होते-होते 32 लाख रुपए बन गया (नीचे की सारिणी देखें).

अब इन 50 वर्षों में उस बुज़ुर्ग का बेटा (जिन्होंने 1 लाख रुपए दिए थे) भी बूढ़ा हो गया. उसने अपने बेटे को बुलाया और वही बात कही, जो उसके पिता ने उससे 50 वर्ष पूर्व कही थी. उसके बेटे ने उन 32 लाख रुपयों की एफ़डी बनवा दी, जो 10 वर्षों में दोगुनी हो गई. तब उस बेटे ने अपने पिता से कहा, ‘‘आपने और दादाजी ने मिलकर 50 लंबे वर्षों में केवल 32 लाख रुपए ही बनाए, जबकि मुझे देखिए मैंने तो 32 लाख रुपयों में केवल 10 सालों के भीतर ही 32 लाख रुपए और जोड़ दिए, देखिए मैं कितनी तेज़ गति से काम कर रहा हूं.’’

बिल्कुल इसी तरह, वर्ष 2000 में भारत का जीडीपी 500 बिलियन डॉलर था. यह वर्ष 2008-09 में बढ़ कर एक ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया. उस समय के प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह भी यह दावा कर सकते थे कि मुझसे पहले के प्रधानमंत्री तो जीडीपी को 60 वर्षों में केवल 500 बिलियन डॉलर तक ही पहुंचा पाए और मेरे काम की गति देखो, मैंने तो केवल 8 ही सालों में इसे एक ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचा दिया. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वे अर्थशास्त्र के पंडित हैं और इकॉनॉमिक्स और स्टैटिस्टिक्स दोनों ही बहुत गहराई से समझते हैं. कोई भी व्यक्ति जो चक्रवृद्धि ब्याज जानता है (हम सभी को पांचवीं-छठवीं कक्षा में पढ़ाया गया है!), वह समझ जाएगा कि यहां क्या हो रहा है.

मैं नहीं जानती कि भाजपा के सांसद इतने शानदार दावे क्यों करते हैं, शायद यह कुछ हद तक अज्ञानता है और कुछ हद तक हर चीज़ का श्रेय लेने की इच्छा भी है. लेकिन बीजेपी सांसद का दावा ऊपर बताई गई कहानी जैसा ही है और मैं समझ नहीं पा रही हूं कि मुझे इस पर गुस्सा होना चाहिए या इस पर हंसना चाहिए, लेकिन उम्मीद है कि इस आलेख के पाठक यह तय करने में सक्षम हो गए होंगे कि उन्हें क्या करना है. जब भी ऐसे धूम-धड़ाके वाले आंकड़ें आएं तो बस, उनके आगे-पीछे की सच्चाई पता करें और उसके बाद ही उन पर भरोसा करें.

फ़ोटो: फ्रीपिक, ट्विटर

 

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शिल्पा शर्मा

शिल्पा शर्मा

पत्रकारिता का लंबा, सघन अनुभव, जिसमें से अधिकांशत: महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर कामकाज. उनके खाते में कविताओं से जुड़े पुरस्कार और कहानियों से जुड़ी पहचान भी शामिल है. ओए अफ़लातून की नींव का रखा जाना उनके विज्ञान में पोस्ट ग्रैजुएशन, पत्रकारिता के अनुभव, दोस्तों के साथ और संवेदनशील मन का अमैल्गमेशन है.

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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