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इतिहास का पुनर्निर्माण: दुरुस्तीकरण के लिए आख़िर हम कितना पीछे जाएंगे?

इस क़वायद के कोई मायने हैं या फिर यह भटकाव की अनंत यात्रा है

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
August 10, 2023
in ज़रूर पढ़ें, नज़रिया, सुर्ख़ियों में
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इतिहास का पुनर्निर्माण: दुरुस्तीकरण के लिए आख़िर हम कितना पीछे जाएंगे?
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जिस तरह की इन दिनों चर्चा चल निकली है यदि यह मान लें कि इतिहास के अप्रिय संदर्भों को हम आज की मूल्य व्यवस्था के आधार पर पुनर्निर्मित करेंगे, तब यह प्रश्न क्या जायज़ नहीं है कि इतिहास में वह निर्दिष्ट बिंदु या cut off point क्या होगा? दुरुस्तीकरण के लिए हम कितना पीछे जाएंगे? क्या कोशिश कर के भी इतिहास को बदला जा सकता है? और आख़िर इस खब्त का कोई परिणाम भी निकलेगा या यह व्यर्थ की क़वायद और आम लोगों को उलझाए रखने का एक हथकंडा मात्र है? इन्हीं बातों पर पढ़िए पंकज मिश्र का नज़रिया.

उपासना स्थल अधिनियम (Places of worship Act) की बात छोड़ दीजिए. मेरी समझ मे यह नहीं आता कि इतिहास में जो हुआ उसे किस आधार पर “ठीक” करने की बात हो रही है? क्या इतिहास उसी आधार पर निर्मित हुआ था, जिस आधार पर आज उसे ठीक करने की बात हो रही है. क्या तब लोग वोट देकर सरकार चुनते थे? क्या तब क़ानून का शासन (rule of law) था? क्या तब न्यापालिका स्वतंत्र अस्तित्व रखती थी? क्या तब जनता में संप्रभुता निहित थी? तब राजा संप्रभु था या जनता?

तो जब मानव इतिहास के विकास क्रम में चीज़ें अलग-अलग आधार पर निर्मित हुईं, विवाद अलग-अलग आधार पर निर्णीत हुए तो हम कल जो हुआ उसे, आज जो आधार है उन्हें समाधान का प्रस्थान बिंदु कैसे बना सकते हैं? मध्यकाल में जब तलवारों के दम पर सत्ता तय होती थी, सैन्य शक्ति से सत्ता मिलती थी और राजा संप्रभु होता था, तब राजा में ही सारी शक्तियां निहित होती थीं. तब यदि आप सत्ता संघर्ष में पराजित हुए तो क्या उस समय के संप्रभु के कृत्यों को आज के क़ानूनों के आधार पर चैलेंज किया जा सकता है? क्या राजाओं के समय न्यायिक समीक्षा का सिद्धांत (doctrine of judicial review) था? सोचिए कि तब रूल ऑफ़ लॉ था या फिर रूल ऑफ़ किंग था? तब क़ानून संप्रभु का आदेश (law was command of sovereign) था. यह मध्यकाल की विधि व्यवस्था थी. राजा या सार्वभौम का कोई काम ग़ैरक़ानूनी हो ही नहीं सकता था.

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यदि यह मान लें कि इतिहास के अप्रिय संदर्भों को हम आज की मूल्य व्यवस्था के आधार पर पुनर्निर्मित करेंगे, तब यह भी प्रश्न क्या जायज़ नहीं है कि इतिहास में वह निर्दिष्ट बिंदु या cut off point क्या होगा? दुरुस्तीकरण के लिए हम कितना पीछे जाएंगे? वह कौन सा तर्क होगा, जो हमे हमें प्राक ऐतिहासिक काल तक जाने से रोकेगा? सतयुग में राजा हरिश्चंद्र के साथ हुए अपराध और अन्याय को जनभावना और लोकमान्यता और अगर सुप्रीम कोर्ट की भाषा मे कहें तो सामूहिक चेतना यानी collective consciousness के आधार पर “ठीक” करने से कौन रोक सकता है? यदि बनारस के अलावा औरंगज़ेब ने पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान और बंग्लादेश में भी कुछ अनर्थ किया है तो क्या होगा? जैसे तर्क आजकल चल रहे हैं, उन तर्कों के आधार पर तो हमें उन देशों का इतिहास ठीक करने के लिए चढ़ाई कर देनी चाहिए.

इस तर्क पर श्रीलंका में चोल राजाओं द्वारा अनुराधापुर राज्य में जो दशकों तक तांडव मचाया, लूटपाट की, स्थापत्य भ्रंश किया, वहां के राजा को परिवार समेत अपनी राजधानी में क़ैद कर लिया, जहां वह मर गए… तो उसका भी तो कोई मुआवज़ा होगा! भावना तो वही है न, प्राचीन और मध्यकालीन गलतियों को ठीक करना.

तो बंधुओ ये जो बर्बर, प्राचीन और मध्यकाल के कालीन हैं न, इन्हें इस आधुनिक युग मे ड्रॉइंग रूम में बिछाओगे तो लिविंग रूम की जगह गुफ़ाओं में रहने लगोगे. चलते-चलते ये भी बता दूं कि जब तक अंग्रेज नहीं आए थे, तब औरंगज़ेब ने हमें सड़क पर बाएं चलने का आदेश दिया था या दाएं या मार्ग पर चलने का कोई नियम ही नहीं था, गुप्त काल जो स्वर्णयुग था, तब मार्ग पर चलने का नियम था या हम ये भी नहीं जानते थे.

फ़ोटो साभार: पिन्टरेस्ट

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