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Home ज़रूर पढ़ें

बेहतर हो कि हम त्यौहार मनाने के अंदाज़ बदलें

अन्यथा हम अपने बच्चों के लिए इस धरा पर केवल समस्याएं ही छोड़ जाएंगे!

शिल्पा शर्मा by शिल्पा शर्मा
September 15, 2024
in ज़रूर पढ़ें, नज़रिया, सुर्ख़ियों में
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बेहतर हो कि हम त्यौहार मनाने के अंदाज़ बदलें
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त्यौहार और परंपराएं जनमानस के एक ढर्रे पर चल रहे जीवन में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार करते हैं। लोगों को एक-दूसरे के संपर्क में लाते हैं, उनके बीच मेलजोल बढ़ाते हैं। इन अर्थों में त्यौहार, संस्कृति और परंपराएं जैसे घुलमिल जाती हैं। लेकिन क्या आपने सोचा है कि जो रूप हमने उन्हें आज दे दिया है और जिस तरह त्यौहारों में बाज़ार ने घुसपैठ बना ली है, क्या ये हमारे और हमारी संततियों के लिए के लिए भविष्य को कैसा बना देंगे? आइए, इस पर विचार करें!

आपके आगे पढ़ने से पहले ये बताना ज़रूरी है कि मैं आस्तिक हूं, जिसे इस कायनात के बनने के पीछे किसी शक्ति/प्रकृति के होने पर पूरा भरोसा है। साथ ही इस बात पर भी पूरा विश्वास है कि आप चाहे उस शक्ति को किसी भी नाम से पुकारो, उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता, उसे अपना काम करना है, वो अपना काम करती है और करती रहती है।

बहरहाल, ये बताना भी ज़रूरी है कि ये आलेख हमारे उत्सवों के हालिया रूप के बारे में ज़रूर है। त्यौहारों का मौसम शुरू हो चुका है और आजकल ये मन में वितृष्णा और विरक्ति ज़्यादा जगाता है, बजाए ख़ुशी देने के। क्यों? इस बात पर चर्चा करते हुए अपने पति को बता रही थी कि इसका कारण है केवल ऊपरी आडंबर। पहले-पहल ये त्यौहार और उत्सव इसलिए बनाए गए होंगे कि लोग आपस में मिलें, ख़ुशियां बांटें, नाचकर-झूमकर आनंदित हों। पर जब इन उत्सवों को बनाया गया होगा तब लाउडस्पीकर, डीजे और भारी-भरकम म्यूज़िक सिस्टम्स का ईजाद नहीं हुआ होगा। और न ही इतनी अप्राकृतिक चीज़ें खोजी जा चुकी होंगी, जो अपने विघटन में सैकड़ों, हज़ारों साल का समय लेने के साथ-साथ प्रकृति को अपरिवर्तनीय नुक्सान पहुंचाती हों।

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आज भी यदि 10-20, 50 या सैकड़ों लोग सामूहिक रूप से गाएं, हर तरह के वाद्य बजाएं और नृत्य करें तो वो बहुत सुखद मंज़र होगा, लेकिन तब, जब वे बेवजह लाउडस्पीकर, माइक वगैरह का इस्तेमाल न कर रहे हों। वह कितना प्राकृतिक होगा! और जो प्राकृतिक होगा, वो तो प्रकृति और हम जैसी सभी प्रकृतियों के निर्माता के निर्माण से अलाइन होगा और जो प्रकृति से अलाइन होगा, वो पूजा के अलावा और क्या हो सकता है? मुझे लगता है कि हर वो चीज़ जो हम करते हैं यदि प्रकृति (नेचर) या मनुष्य के हित में हो तो पूजा ही होती है।

त्यौहारों/उत्सवों का निश्छल, निर्मल भाव कहीं खो गया है। प्लास्टर ऑफ़ पैरिस की मूर्तियां, टॉक्सिक रंग, केमिकल युक्त सुगंध, सजावटी सामान- जिनका इस्तेमाल केवल एक बार ही किया जाता है और जो जल्दी डीग्रेड होने वाले पदार्थों से नहीं बने होते, इन सभी सामानों की प्लास्टिक पैकेजिंग… ये सारी चीज़ें अंतत: या तो लैंडफ़िल में जाती हैं या फिर हमारे पानी के स्रोतों को गंदा करती हैं- फिर ये किस तरह की पूजा है? ये तो ऐसे दिखावों के उत्सव हुए, जहां हम प्रकृति को ख़ुद ही साल-दर-साल बहुत, बहुत ज़्यादा नुक़सान पहुंचा रहे हैं। इस तरह देखिए तो त्यौहारों और उत्सवों की आड़ में हम अपने ही अस्तित्व ख़त्म करने पर तुले हुए से हैं।

कई बेजा दवाब भी हैं, जो उत्सवों को प्रभावित करते हैं। बाज़ार ने लोगों पर बहुत दबाव बनाया है, ख़ासतौर पर महिलाओं पर। हालांकि पुरुष भी इस दिखावे के दबाव में आने से पीछे नहीं रह गए हैं कि इन उत्सवों में हर दिन वे नए रंग-रूप और कपड़ों और गहनों में नज़र आएं। अन्यथा अपने पास पहले से मौजूद अच्छे कपड़ों में हमारी ‘मुस्कान’ से सुंदर कोई मेकअप या गहना हो ही नहीं सकता! मुस्कान उत्सवी भी है, प्राकृतिक भी और मुझे भरोसा है कि उस शक्ति को प्रिय भी होगी ही, जिसने हमें गढ़ा है।

त्यहौरों पर हावी है बाज़ार– इस चर्चा के दौरान मेरे पति ने अपना मत रखते हुए कहा। दरअसल, त्यौहारों का जो रूप हम आजकल मनाते हैं, उसमें श्रद्धा, आस्था या ईश्वरीय वंदना का भाव केवल पांच या दस प्रतिशत ही (वह भी शायद ही!) बचा है। इस रूप में उत्सव मनाने में 40-45 प्रतिशत हमारी परंपराओं और संस्कृति का योगदान है और बाक़ी का 50 प्रतिशत बाज़ार का। ध्यान से देखेंगे तो आप भी इस विश्लेषण को सही पाएंगे।

तो क्या हमें त्यौहार/उत्सव मनाने ही नहीं चाहिए? मेरे नज़रिए से इस सवाल का जवाब बहुत आसान है- हमें ज़रूर मनना चाहिए अपने त्यौहार और उत्सव, लेकिन इस तरह कि वे प्रकृति से अलाइन्ड रहें, प्रकृति को इस बात में सहयोग करें कि हम और हमारी संततियां लंबे समय तक इस धरती पर सुख से रह सकें। अपनी दिखावे से भरी, प्रदूषण फैलाने वाली परंपराओं को ख़त्म करके त्यौहारों और उत्सवों को इस तरह मनाया जाना चाहिए कि लोक परंपराएं चलती भी रहें और दूसरे मनुष्यों, प्राणियों, जलस्रोतों, पेड़-पौधों को किसी क़िस्म का नुक्सान भी न पहुंचे। इस तरह त्यौहार मनाना मुश्क़िल नहीं है। ये ख़ुशनुमा, ताज़गीभरा और उत्सवी ऊर्जा से ओत-प्रोत भी होगा ही। हां, बाज़ार को इससे नुक़सान पहुंचेगा, पर वो नुक़सान मनुष्यों, प्राणियों और नेचर को होने वाले फ़ायदे की तुलना में नगण्य ही होगा…

फ़ोटो साभार: गूगल

Tags: cultureEnvironmentFestivalsGanesh UtsavGarbageNoise PollutionPollutionTraditionsWater Sourcesकचरागणेश उत्सवजलस्रोतत्यौहारध्वनि प्रदूषणपरंपराएंपर्यावरणप्रदूषणसंस्कृति
शिल्पा शर्मा

शिल्पा शर्मा

पत्रकारिता का लंबा, सघन अनुभव, जिसमें से अधिकांशत: महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर कामकाज. उनके खाते में कविताओं से जुड़े पुरस्कार और कहानियों से जुड़ी पहचान भी शामिल है. ओए अफ़लातून की नींव का रखा जाना उनके विज्ञान में पोस्ट ग्रैजुएशन, पत्रकारिता के अनुभव, दोस्तों के साथ और संवेदनशील मन का अमैल्गमेशन है.

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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