कुछ न कहकर भी सब कुछ कह जाने का उपक्रम है, कविता संग्रह- बहुत कुछ कहा हमने
वरिष्ठ पत्रकार पंकज पाठक के संपादन में हाल ही में आए कविता संग्रह ‘बहुत कुछ कहा हमने अकविता की वापसी’...
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वरिष्ठ पत्रकार पंकज पाठक के संपादन में हाल ही में आए कविता संग्रह ‘बहुत कुछ कहा हमने अकविता की वापसी’...
‘भारत के दलित, भारत में दलित’ की पांचवीं और अंतिम कड़ी में डॉ रामजीलाल दलितों के सही मायने में उत्थान...
यदि आप मौसम की गर्मी से परेशान हैं-तब भी, यदि आप घर पर पार्टी ऑर्गैनाइज़ कर रहे हैं-तब भी और...
रबिन्द्रनाथ टैगोर की यह लघुकथा लौकिक और अलौकिक सुख और इच्छाओं की बड़े ही संक्षेप में क्या अद्भुत व्याख्या करती...
‘भारत में दलित, भारत के दलित’ श्रृंखला की पिछली कड़ी मेंआपने पढ़ा, दलितों के ख़िलाफ़ बढ़ रहे अत्याचारों की कड़ी...
‘भारत में दलित, भारत के दलित’ श्रृंखला की पिछली कड़ी में सामाजिक चिंतक, लेखक और दयाल सिंह कॉलेज, करनाल के...
संवेदनाएं किसी पहचान से ज़्यादा तीव्र और सार्वभौमिक होती हैं. हम भले ही किसी को न जानते हों, पर उसे...
काला जल जैसे हिंदी के कालजयी उपन्यास के लेखक गुलशेर ख़ां शानी की कहानियां भी समाज के विरोधाभासों और विडंबनाओं...
औरतों का आत्मनिर्भर होना एक बड़े वर्ग को बर्दाश्त नहीं होता. अपने दम पर नाम बना रही औरतों को बदनाम...
बेमेल विवाह का दर्द झेल रही एक जवान पत्नी की व्यथा कथा. ज़िंदगी के दूसरे पहर में यदि सूरज न...
हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.
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