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स्त्री दशा और दिशा: ज़रूरी किताब, जो हर महिला और पुरुष को पढ़नी चाहिए

अमरेन्द्र यादव by अमरेन्द्र यादव
July 20, 2022
in बुक क्लब, समीक्षा
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Stri Dasha aur Disha
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क़ानूनी धाराओं और अधिकारों की बात करनेवाली किताबें या लेख आमतौर पर इतने टेक्निकल और बोरिंग होते हैं कि उन्हें तब तक पढ़ने की हिम्मत नहीं होती, जब तक कि हम उसमें से अपने काम की कोई चीज़ न तलाश रहे हों. ऐसे में पूर्व प्रशासनिक अधिकारी और महिला अधिकारों के प्रति मुखर बॉम्बे हाईकोर्ट की वरिष्ठ वक़ील आभा सिंह तथा पत्रकार व लेखिका नसीम अंसारी कोचर की बेहद सधी हुई किताब स्त्री दशा और दिशा पढ़ना एक अनूठे अनुभव की तरह रहा.

पुस्तक: स्त्री दशा और दिशा
लेखिका: आभा सिंह और नसीम अंसारी कोचर
प्रकाशक: रणसमर फ़ाउंडेशन
मूल्य: 250 रुपए
कैटेगरी: नॉन-फ़िक्शन
रेटिंग: 4.5/5 स्टार

कई बार हम आलसवश या बस यूं ही बिना किसी वजह के कुछ किताबों को पढ़ना टालते रहते हैं. महिला अधिकारों और क़ानूनों पर लिखी गई किताब स्त्री दशा और दिशा लंबे समय तक मेरे टू रीड लिस्ट में बनी रही. पिछले दिनों जब इसके पन्ने पलटे तो दो सिटिंग में पूरी किताब अपने आप को पढ़ा गई. इसमें काफ़ी योगदान किताब को लिखने के तरीक़े का रहा.
महिलाओं के ख़िलाफ़ होनेवाले अपराधों से जुड़ी तमाम धाराओं की बात करने से पहले किताब आपको अलग-अलग तरह के अपराधों के बारे में तफ़सील से बताती है. देश के उन मामलों का ज़िक्र करती है, जिन्होंने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था, इनमें से कुछ के चलते क़ानूनों में तक बदलाव करना पड़ा था. वर्ष 1972 में महाराष्ट्र का मथुरा रेप केस हो, वर्ष 1973 का अरुणा शानबाग मामला या दिल्ली में क़ानून की पढ़ाई करनेवाली प्रियदर्शी मट्टू कांड. वर्ष 2012 का दिल्ली का कुख्यात निर्भया बलात्कार कांड, यूपी का नीलू कांड हो, मध्यप्रदेश का भोमाटोला कांड या हरियाणा का रागिनी कांड… पुस्तक में इन सभी घटनाओं और न्याय के लिए संघर्ष करती पीड़िताओं और उनके परिजनों की संक्षिप्त कहानी कही गई है, जिससे हमें समाज की उस मानसिकता का अंदाज़ा हो जाता है, जो पुरुषों को महिलाओं के प्रति हिंसा और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध करने के लिए उकसाती है.
कई बार महिला हितों की बात करनेवाली किताबें एकतरफ़ा बात करती हैं. महिलाओं के लिए बने क़ानूनों के केवल उजले पक्षों की बात करती हैं. किताब स्त्री दशा और दिशा इस मामले में काफ़ी अलग है. ‘स्त्री के दुश्मन बन रहे स्त्री हित के क़ानून’ नामक चैप्टर में दहेज प्रताड़ना क़ानून 498-ए के दुरुपयोग के कई केसेस पर चर्चा की गई है. बहुओं के हाथों सताई जा रही बुज़ुर्ग सासों में पंजाब की स्वर्णलता गोयल, नोएडा निवासी किरण कुकरेजा, गुजराती परिवार से ताल्लुक रखनेवाली सीमा के उदाहरण के माध्यम से बताया गया है कि कैसे किसी अच्छे क़ानून के दुरुपयोग से हंसते-खेलते परिवार बर्बाद हो जाते हैं. बुज़ुर्ग महिलाओं की ज़िंदगी नर्क हो जाती है.
महिलाओं के ख़िलाफ़ समाज की सहमति से बंद दरवाज़ों के पीछे वाले अपराध यानी मेराइटल रेप पर भी गंभीर चर्चा है. और उतना ही ज़्यादा परेशान करनेवाला वह चैप्टर है जिसमें तीन तलाक़ के तमाम पहलुओं को उजागर किया गया है. तीन तलाक़ का राजनीतिकरण और उसपर मुस्लिम समुदाय की असहज कर देनवाली ख़ामोशी समझ से परे है. बस तीन लफ़्ज़ों से वैवाहिक रिश्ते को ख़त्म कर देने को एक बड़े तबके द्वारा धर्म सम्मत मानना किसी भी सभ्य समाज में निंदनीय होना चाहिए. दिल्ली के मुस्लिम बहुल चांदनी चौक इलाक़े की रेशमा की कहानी इस रवायत के स्याह पहलू को उजागर करता है. तीन तलाक़ से जुड़ी घिनौनी रवायत हलाला, जिसमें पहले पति से दोबारा विवाह के लिए पत्नी को किसी अन्य पुरुष से पहले निकाह करना होता है, उसके बाद जिस्मानी रिश्ता बनाना होता है के बारे में कई केसेस के माध्यम से विस्तार से बताया गया है. हलाला भोग चुकी महिलाओं की कहानियां दिल दहला देती हैं. वहीं हिंदू महिलाओं की ज़िंदगियां भी खाप पंचायतों के अजीबोग़रीब फ़रमानों से दहलती रही हैं. खाप के कई तालिबानी फ़ैसलों पर चर्चा इस किताब में की गई है.
महिला जीवन के कई पहलुओं पर बात करनेवाली यह किताब सुनंदा पुष्कर, शीना बोरा और अनुराधा बाली जैसी अनसुलझी हाईप्रोफ़ाइल हत्याओं पर भी सवाल उठाती है. पुस्तक के आख़िर अध्याय में इंदिरा जयसिंह, अनीता लाल और नीलम कटारा जैसे दृढ़ निश्चयी महिलाओं पर बात की गई है, जिन्हें नई पीढ़ी महिलाएं मिसाल के तौर पर देख सकती हैं. चूंकि किताब का मुख्य उद्देश्य महिला अधिकारों के बारे में जागरूकता फैलाना है तो ‘महिलाएं जानें अपने अधिकार’ नामक चैप्टर में घरेलू हिंसा, लिव इन रिलेशनशिप से जुड़े अधिकारों समेत, ज़मीन जायदाद, बच्चों से संबंधित अधिकार, गर्भवती महिलाओं के अधिकार, कामकाजी महिलाओं के सुरक्षा संबंधी अधिकार आदि के बारे में टू द पॉइंट जानकारी दी गई है.
इस पुस्तक का कंटेंट बेहद ख़ास और सटीक तो है ही, भाषा भी सहज-सरल है. आधी आबादी को समर्पित इस किताब को पढ़ते समय कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि इसे महज़ आधी आबादी यानी महिलाओं को ही पढ़ना चाहिए. यह किताब हर संवेदनशील व्यक्ति को न केवल पढ़नी चाहिए, बल्कि महिला सशक्तिकरण के अभियान में अपने हिस्से का योगदान देना चाहिए.

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