• होम पेज
  • टीम अफ़लातून
No Result
View All Result
डोनेट
ओए अफ़लातून
  • सुर्ख़ियों में
    • ख़बरें
    • चेहरे
    • नज़रिया
  • हेल्थ
    • डायट
    • फ़िटनेस
    • मेंटल हेल्थ
  • रिलेशनशिप
    • पैरेंटिंग
    • प्यार-परिवार
    • एक्सपर्ट सलाह
  • बुक क्लब
    • क्लासिक कहानियां
    • नई कहानियां
    • कविताएं
    • समीक्षा
  • लाइफ़स्टाइल
    • करियर-मनी
    • ट्रैवल
    • होम डेकोर-अप्लाएंसेस
    • धर्म
  • ज़ायका
    • रेसिपी
    • फ़ूड प्लस
    • न्यूज़-रिव्यूज़
  • ओए हीरो
    • मुलाक़ात
    • शख़्सियत
    • मेरी डायरी
  • ब्यूटी
    • हेयर-स्किन
    • मेकअप मंत्र
    • ब्यूटी न्यूज़
  • फ़ैशन
    • न्यू ट्रेंड्स
    • स्टाइल टिप्स
    • फ़ैशन न्यूज़
  • ओए एंटरटेन्मेंट
    • न्यूज़
    • रिव्यूज़
    • इंटरव्यूज़
    • फ़ीचर
  • वीडियो-पॉडकास्ट
  • लेखक
ओए अफ़लातून
Home बुक क्लब क्लासिक कहानियां

एक जीवी, एक रत्नी, एक सपना: अमृता प्रीतम की कहानी

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
October 27, 2020
in क्लासिक कहानियां, बुक क्लब
A A
Share on FacebookShare on Twitter

पुरानी यादों के धागों को पकड़कर कहानियां बनुना अमृता प्रीतम की अनूठी शैली थी. कहानी एक जीवी, एक रत्नी, एक सपना इस कहानी को पढ़ते हुए आप उनकी इस शैली से परिचित होंगे. पाठकों से बतियाते हुए कहानियां लिख देना यह अमृता प्रीतम ही कर सकती थीं.

‘‘पालक एक आने गठ्ठी, टमाटर छह आने रत्तल और हरी मिर्चें एक आने की ढेरी…’’ पता नहीं तरकारी बेचनेवाली स्त्री का मुख कैसा था कि मुझे लगा पालक के पत्तों की सारी कोमलता, टमाटरों का सारा रंग और हरी मिर्चों की सारी ख़ुशबू उसके चेहरे पर पुती हुई थी.
एक बच्चा उसकी झोली में दूध पी रहा था. एक मुठ्ठी में उसने मां की चोली पकड़ रखी थी और दूसरा हाथ वह बार-बार पालक के पत्तों पर पटकता था. मां कभी उसका हाथ पीछे हटाती थी और कभी पालक की ढेरी को आगे सरकाती थी, पर जब उसे दूसरी तरफ़ बढ़कर कोई चीज़ ठीक करनी पड़ती थी, तो बच्चे का हाथ फिर पालक के पत्तों पर पड़ जाता था. उस स्त्री ने अपने बच्चे की मुठ्ठी खोलकर पालक के पत्तों को छुड़ाते हुए घूरकर देखा, पर उसके होंठों की हंसी उसके चेहरे की सिल्वटों में से उछलकर बहने लगी. सामने पड़ी हुई सारी तरकारी पर जैसे उसने हंसी छिड़क दी हो और मुझे लगा, ऐसी ताज़ी सब्ज़ी कभी कहीं उगी नहीं होगी.
कई तरकारी बेचनेवाले मेरे घर के दरवाज़े के सामने से गुज़रते थे. कभी देर भी हो जाती, पर किसी से तरकारी न ख़रीद सकती थी. रोज़ उस स्त्री का चेहरा मुझे बुलाता रहता था.
उससे ख़रीदी हुई तरकारी जब मैं काटती, धोती और पतीले में डालकर पकाने के लिए रखती-सोचती रहती, उसका पति कैसा होगा! वह जब अपनी पत्नी को देखता होगा, छूता होगा, तो क्या उसके होंठों में पालक का, टमाटरों का और हरी मिर्चों का सारा स्वाद घुल जाता होगा?
कभी-कभी मुझे अपने पर खीझ होती कि इस स्त्री का ख़्याल किस तरह मेरे पीछे पड़ गया था. इन दिनों मैं एक गुजराती उपन्यास पढ़ रही थी. इस उपन्यास में रौशनी की लकीर-जैसी एक लड़की थी-जीवी. एक मर्द उसको देखता है और उसे लगता है कि उसके जीवन की रात में तारों के बीज उग आए हैं. वह हाथ लम्बे करता है, पर तारे हाथ नहीं आते और वह निराश होकर जीवी से कहता है, ‘‘तुम मेरे गांव में अपनी जाति के किसी आदमी से ब्याह कर लो. मुझे दूर से सूरत ही दिखती रहेगी.’’ उस दिन का सूरज जब जीवी देखता है, तो वह इस तरह लाल हो जाता है, जैसे किसी ने कुंवारी लड़की को छू लिया हो कहानी के धागे लम्बे हो जाते हैं, और जीवी के चेहरे पर दु:खों की रेखाएं पड़ जाती हैं इस जीवी का ख़्याल भी आजकल मेरे पीछे पड़ा हुआ था, पर मुझे खीझ नहीं होती थीं, वे तो दु:खों की रेखाएं थीं, वही रेखाएं जो मेरे गीतों में थीं, और रेखाएं रेखाओं में मिल जाती हैं पर यह दूसरी जिसके होंठों पर हंसी की बूंदें थीं, केसर की तुरियां थीं.
दूसरे दिन मैंने अपने पांवों को रोका कि मैं उससे तरकारी ख़रीदने नहीं जाऊंगी. चौकीदार से कहा कि यहां जब तरकारी बेचनेवाला आए तो मेरा दरवाज़ा खटखटाना दरवाज़े पर दस्तक हुई. एक-एक चीज़ को मैंने हाथ लगाकर देखा. आलू-नरम और गड्डों वाले. फरसबीन-जैसे फलियों के दिल सूख गए हों. पालक-जैसे वह दिन-भर की धूल फांककर बेहद थक गई हो. टमाटर-जैसे वे भूख के कारण बिलखते हुए सो गए हो. हरी मिर्चें-जैसे किसी ने उनकी सांसों में से ख़ुशबू निकाल ली हो, मैंने दरवाज़ा बंद कर लिया. और पांव मेरे रोकने पर भी उस तरकारी वाली की ओर चल पड़े.
आज उसके पास उसका पति भी था. वह मंडी से तरकारी लेकर आया था और उसके साथ मिलकर तरकारियों को पानी से धोकर अलग-अलग रख रहा था और उनके भाव लगा रहा था. उसकी सूरत पहचानी-सी थी इसे मैंने कब देखा था, कहां देखा था-एक नई बात पीछे पड़ गई.
‘‘बीबी जी, आप!’’
‘‘मैं… पर मैंने तुम्हें पहचाना नहीं.’’
‘‘इसे भी नहीं पहचाना? यह रत्नी!’’
‘‘माणकू रत्नी.’’ मैंने अपनी स्मृतियों में ढूंढ़ा, पर माणकू और रत्नी कहीं मिल नहीं रहे थे.
‘‘तीन साल हो गए हैं, बल्कि महीना ऊपर हो गया है. एक गांव के पास क्या नाम था उसका आपकी मोटर ख़राब हो गई थी.’’
‘‘हां, हुई तो थी.’’
‘‘और आप वहां से गुज़रते हुए एक ट्रक में बैठकर धुलिया आए थे, नया टायर ख़रीदने के लिए.’’
‘‘हां-हां.’’और फिर मेरी स्मृति में मुझे माणकू और रत्नी मिल गए.
रत्नी तब अधखिली कली-जैसी थी और माणकू उसे पराए पौधे पर से तोड़ लाया था. ट्रक का ड्राइवर माणकू का पुराना मित्र था. उसने रत्नी को लेकर भागने में माणकू की मदद की थी. इसलिए रास्ते में वह माणकू के साथ हंसी-मज़ाक करता रहा.
रास्ते के छोटे-छोटे गांवों में कहीं ख़रबूजे बिक रहे होते, कहीं ककड़ियां, कहीं तरबूज़! और माणकू का मित्र माणकू से ऊंची आवाज़ में कहता,‘‘बड़ी नरम हैं, ककड़ियां ख़रीद ले. तरबूज़ तो सुर्ख लाल हैं और ख़रबूजा बिल्कुल मिश्री है, ख़रीदना नहीं है तो छीन ले वाह रे रांझे!’’
‘‘अरे, छोड़ मुझे रांझा क्यों कहता है? रांझा साला आशिक़ था कि नाई था? हीर की डोली के साथ भैंसें हांककर चल पड़ा. मैं होता न कहीं.’’
‘‘वाह रो माणकू! तू तो मिर्ज़ा है मिर्ज़ा!’’
‘‘मिर्ज़ा तो हूं ही, अगर कहीं साहिबां ने मरवा न दिया तो!’’और फिर माणकू अपनी रत्नी को छेड़ता,‘‘देख रत्नी, साहिबां न बनना, हीर बनना.’’
‘वाह रे माणकू, तू मिर्ज़ा और यह हीर! यह भी जोड़ी अच्छी बनी!’ आगे बैठा ड्राइवर हंसा.
इतनी देर में मध्यप्रदेश का नाका गुज़र गया और महाराष्ट्र की सीमा आ गई. यहां पर हर एक मोटर, लॉरी और ट्रक को रोका जाता था. पूरी तलाशी ली जाती थी कि कहीं कोई अफ़ीम, शराब या किसी तरह की कोई और चीज़ तो नहीं ले जा रहा. उस ट्रक की भी तलाशी ली गई. कुछ न मिला और ट्रक को आगे जाने के लिए रास्ता दे दिया गया. ज्यों ही ट्रक आगे बढ़ा, माणकू बेतहाशा हंस दिया.
‘साले अफ़ीम खोजते हैं, शराब खोजते हैं. मैं जो नशे की बोतल ले जा रहा हूं, सालों को दिखी ही नहीं.’
और रत्नी पहले अपने आप में सिकुड़ गई और फिर मन की सारी पत्तियों को खोलकर कहने लगी,‘देखना, कहीं नशे की बोतल तोड़ न देना! सभी टुकड़े तुम्हारे तलवों में उतर जाएंगे.’
‘कहीं डूब मर!’
‘मैं तो डूब जाऊंगी, तुम सागर बन जाओ!’
मैं सुन रही थी, हंस रही थी और फिर एक पीड़ा मेरे मन में आई,‘हाय री स्त्री, डूबने के लिए भी तैयार है, यदि तेरा प्रिय एक सागर हो!’
फिर धुलिया आ गया. हम ट्रक में से उतर गए और कुछ मिनट तक एक ख़्याल मेरे मन को कुरेदता रहा-यह ‘रत्नी’ एक अधखिली कली-जैसी लड़की. माणकू इसे पता नहीं कहां से तोड़ लाया था. क्या इस कली को वह अपने जीवन में महकने देगा? यह कली कहीं पांवों में ही तो नहीं मसली जाएगी?
पिछले दिनों दिल्ली में एक घटना हुई थी. एक लड़की को एक मास्टर वायलिन सिखाया करता था और फिर दोनों ने सोचा कि वे बम्बई भाग जाएं. वहां वह गाया करेगी, वह वायलिन बजाया करेगा. रोज़ जब मास्टर आता, वह लड़की अपना एक-आध कपड़ा उसे पकड़ा देती और वह उसे वायलिन के डिब्बे में रखकर ले जाता. इस तरह लगभग महीने-भर में उस लड़की ने कई कपड़े मास्टर के घर भेज दिए और फिर जब वह अपने तीन कपड़ों में घर से निकली, किसी के मन में सन्देह की छाया तक न थी. और फिर उस लड़की का भी वही अंजाम हुआ, जो उससे पहले कई और लड़कियों का हो चुका था और उसके बाद कई और लड़कियों का होना था. वह लड़की बम्बई पहुंचकर कला की मूर्ति नहीं, कला की क़ब्र बन गई, और मैं सोच रही थी, यह रत्नी यह रत्नी क्या बनेगी?
आज तीन वर्ष बाद मैंने रत्नी को देखा. हंसी के पानी से वह तरकारियों को ताज़ा कर रही थी,‘पालक एक आने गठ्ठी, टमाटर छह आने रत्तल और हरी मिर्चें एक आने ढेरी.’और उसके चेहरे पर पालक की सारी कोमलता, टमाटरों का सारा रंग और हरी मिर्चों की सारी ख़ुशबू पुती हुई थी.
जीवी के मुख पर दु:खों की रेखाएं थीं-वहीं रेखाएं, जो मेरे गीतों में थीं और रेखाएं रेखाओं में मिल गई थीं.
रत्नी के मुख पर हंसी की बूंदे थीं- वह हंसी, जब सपने उग आएं, तो ओस की बूंदों की तरह उन पत्तियों पर पड़ जाती है; और वे सपने मेरे गीतों के तुकान्त बनते थे.
जो सपना जीवी के मन में था, वही सपना रत्नी के मन में था. जीवी का सपना एक उपन्यास के आंसू बन गया और रत्नी का सपना गीतों के तुकान्त तोड़ कर आज उसकी झोली में दूध पी रहा था.

फ़ोटो साभार: पिंटरेस्ट

इन्हें भीपढ़ें

नई पीढ़ी के क़िस्से – रंगे सियार की कहानी: भावना प्रकाश

नई पीढ़ी के क़िस्से – रंगे सियार की कहानी: भावना प्रकाश

April 23, 2026
माँ तुम्हारा चूल्हा: अरुण चन्द्र रॉय की कविता

माँ तुम्हारा चूल्हा: अरुण चन्द्र रॉय की कविता

April 3, 2026
वो कभी मिल जाएं तो क्या कीजिए:अख़्तर शीरानी की ग़ज़ल

वो कभी मिल जाएं तो क्या कीजिए:अख़्तर शीरानी की ग़ज़ल

December 15, 2025
ummeed-ki-tarah-lautna-tum

पाठक को विघटन के अंधेरे से उजाले की ओर मोड़ देती हैं ‘उम्मीद की तरह लौटना तुम’ की कविताएं

September 23, 2025
Tags: AflatoonAflatoon KahaniyanAmrita Preetam Ek Jeevi ek ratni ek sapnaAmrita Preetam ki kahaniyanAmrita Preetam NovelsAmrita Preetam StoriesEk Jeevi ek ratni ek sapnaHindi KahaniyanHindi storiesHindi writersOye AflatoonStory Ek Jeevi ek ratni ek sapnaअफलातूनअफलातून कहानियांअमृता प्रीतमअमृता प्रीतम की एक जीवी एक रत्नी एक सपनाअमृता प्रीतम की कहानियांअमृता प्रीतम के उपन्यासएक जीवी एक रत्नी एक सपनाओए अफलातूनकहानी एक जीवी एक रत्नी एक सपनाहिंदी कहानियांहिंदी के लेखक
टीम अफ़लातून

टीम अफ़लातून

हिंदी में स्तरीय और सामयिक आलेखों को हम आपके लिए संजो रहे हैं, ताकि आप अपनी भाषा में लाइफ़स्टाइल से जुड़ी नई बातों को नए नज़रिए से जान और समझ सकें. इस काम में हमें सहयोग करने के लिए डोनेट करें.

Related Posts

गुरुत्वाकर्षण: हूबनाथ पांडे की कविता
कविताएं

गुरुत्वाकर्षण: हूबनाथ पांडे की कविता

September 18, 2025
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए: गोपालदास ‘नीरज’ का गीत
कविताएं

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए: गोपालदास ‘नीरज’ का गीत

June 12, 2025
कल चौदहवीं की रात थी: इब्न ए इंशा की ग़ज़ल
कविताएं

कल चौदहवीं की रात थी: इब्न ए इंशा की ग़ज़ल

June 4, 2025
Facebook Twitter Instagram Youtube
ओए अफ़लातून

हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

संपर्क

ईमेल: oye.aflatoon@gmail.com
फ़ोन: +91 9967974469
+91 9967638520

  • About
  • Privacy Policy
  • Terms

© 2022 - 2025 Oyeaflatoon - Managed & Powered by Zwantum

No Result
View All Result
  • सुर्ख़ियों में
    • ख़बरें
    • चेहरे
    • नज़रिया
  • हेल्थ
    • डायट
    • फ़िटनेस
    • मेंटल हेल्थ
  • रिलेशनशिप
    • पैरेंटिंग
    • प्यार-परिवार
    • एक्सपर्ट सलाह
  • बुक क्लब
    • क्लासिक कहानियां
    • नई कहानियां
    • कविताएं
    • समीक्षा
  • लाइफ़स्टाइल
    • करियर-मनी
    • ट्रैवल
    • होम डेकोर-अप्लाएंसेस
    • धर्म
  • ज़ायका
    • रेसिपी
    • फ़ूड प्लस
    • न्यूज़-रिव्यूज़
  • ओए हीरो
    • मुलाक़ात
    • शख़्सियत
    • मेरी डायरी
  • ब्यूटी
    • हेयर-स्किन
    • मेकअप मंत्र
    • ब्यूटी न्यूज़
  • फ़ैशन
    • न्यू ट्रेंड्स
    • स्टाइल टिप्स
    • फ़ैशन न्यूज़
  • ओए एंटरटेन्मेंट
    • न्यूज़
    • रिव्यूज़
    • इंटरव्यूज़
    • फ़ीचर
  • वीडियो-पॉडकास्ट
  • लेखक

© 2022 - 2025 Oyeaflatoon - Managed & Powered by Zwantum