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अनोखा रोमांस: प्यार की अजीब दास्तां (लेखक: अंतोन चेखव)

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
September 23, 2022
in कविताएं, बुक क्लब
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Chekhov_Stories
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कुछ कहानियां बेसिरी और बेहद अधूरी होती हैं. रूसी लेखक अंतोन चेखव की कहानी अनोखा रोमांस इसी मिज़ाज़ की है.

संगीतकार स्मिसकोव नगर से राजकुमार बिबुलोव के महल को जा रहा था, जहां एक सगाई के उपलक्ष्य में शाम को संगीत और नृत्य का कार्यक्रम रखा गया था. चमड़े के केस में अपना भीमकाय डबल बास बाजा बन्द किए और पीठ पर लादे, वह एक नदी के तट से गुज़र रहा था. स्मिसकोव ने सोचा,‘क्यों न एक डुबकी लगा ली जाए?’ विवस्त्र हो वह शीतल जल में कूद पड़ा.
वह बड़ी सुहावनी सन्ध्या थी. स्मिसकोव की कवित्वमय आत्मा वातावरण के साथ एक हो चुकी थी. अभी वह सौ क़दम ही तैरकर आगे बढ़ा था कि उसका हृदय पुलकित हो उठा-तट की ढलान पर उसे एक अत्यन्त सुन्दर लड़की बैठी दिखाई दी. वह मछलियां पकड़ रही थी. उसने बदलती हुई भावनाओं में डूबी अपनी सांस को रोक लिया.
जब से उसने मानवता में विश्वास खो दिया था (जबसे उसकी प्रिय पत्नी उसके एक मित्र के साथ भाग गई थी), उसका हृदय ख़ाली पड़ा था और वह लोगों से घृणा करने लगा था.
किन्तु अब उस सो रही सुन्दरी (उसकी आंखें बन्द थीं) के क़दमों में उसे अपनी इच्छा के विपरीत, प्रेम जैसी किसी भावना का अनुभव हुआ. वह देर तक उस सुन्दरी के रूप का पान करता रहा.
“अब काफ़ी हो चुका!” उसने एक लम्बी सांस ली,“विदा, रे आकर्षक दृश्य! दावत में जाने का समय हो रहा है.”
और उस ओर अन्तिम बार देखकर वह वहां से तैरकर हटना ही चाहता था कि उसे एक विचार सूझा.
“कोई ऐसी वस्तु छोड़ जाओ कि यह सुन्दरी भी याद रखे कि यहां कोई आया था. मैं बंसी के गुल्ले में कुछ अटका देता हूं.”
धीमे से स्मिसकोव तैरकर तट पर पहुंचा, पानी के कुछ फूल इकट्ठा किए, उन्हें एक में बांधकर बंसी के गुल्ले में बांध दिया.
फूलों का गुच्छा डूब गया, साथ ही बंसी का गुल्ला भी.
जब वह तट पर पहुंचा, तो उसे बड़ा आघात लगा. उसके वस्त्र कहीं भी दिखलाई नहीं पड़ रहे थे. वे चुरा लिए गए… जब वह उस सुन्दर लड़की के रूप की प्रशंसा कर रहा था, कुछ बदमाश उसके सभी वस्त्र लेकर भाग गए थे. छोड़ गए थे, उसका भीमकाय बाजा और हैट मात्र.
“ए बदमाश जहन्नुम को जाएंगे!” स्मिसकोव चिल्लाया,“मुझे वस्त्र चुरा लिए जाने का दुख नहीं. वस्त्र तो शरीर का ही होता है, किन्तु अब मुझे उस दावत में विवस्त्र होकर ही जाना पड़ेगा.”
वह अपने डबल बास बाजे पर बैठ गया.
“मैं विवस्त्र होकर राजकुमार बिबुलोव की दावत में जा भी तो नहीं सकता. वहां महिलाएं भी तो होंगी. और हां, मैं बाजा बजा भी तो नहीं सकता, ‘रोजीन’ तो पैण्ट की जेब में ही थी.”
वह बड़ी देर तक सोचता रहा. आख़िरकार उसे याद आया कि तट से ज़रा हटकर ही झाड़ियों में एक पैदल-पुल है. मैं अंधेरा होने तक वहां छिपा बैठा रहूंगा. उसके बाद पहली काटेज तक पहुंच जाऊंगा…
अब बाजा पीठ पर लादकर, हैट सिर पर रखकर पुल की ओर चलने लगा. वह कोई पौराणिक उपदेवता लग रहा था.
अच्छा, मेरे पाठकों, अब हम अपने नायक को पुल के नीचे छोड़कर मछली मारने वाली लड़की की ओर ध्यान दें. उसका क्या हुआ? आंखें खुलने पर जब उस सुन्दरी ने बंसी के गुल्ले को पानी पर नहीं देखा, तो उसने बंसी खींची. वह भारी लगी-कंटीला तार और गुल्ला दिखलाई नहीं पड़ रहे थे. स्मिसकोव के पुष्प गुच्छ भारी होकर पानी की सतह के नीचे डूब गए थे.
“लगता है, बड़ी मछली आ फंसी है,” लड़की ने सोचा,“अथवा कंटीला तार कहीं किसी वस्तु में फंस गया है.”
जोर से खींचने पर भी गुल्ला ऊपर नहीं उठ पाया, तो वह दुखी हो गई. अन्ततः बिना झिझक अपने वस्त्रों को उतारकर अपने सुन्दर शरीर को उसने पानी के हवाले कर दिया. बड़ी कठिनाई से वह पुष्प गुच्छ को गुल्ले से अलग कर पायी और विजय की मुसकान लिए पानी के बाहर निकली.
किन्तु दुर्भाग्य उसकी बाट देख रहा था! बदमाश, जो स्मिसकोव के वस्त्र ले भागे थे, उसके वस्त्र भी चुरा ले गए थे.
“हे भगवान! अब क्या करूं?” उसकी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बहने लगी. “क्या मुझे ऐसी दशा में जाना होगा? नहीं, कभी नहीं! ऐसे जाने की अपेक्षा मैं मृत्यु पसन्द करूंगी. शाम होने तक मैं इन्तजार करूंगी. उसके बाद वृद्धा अगाथा के पास जाकर उसे घर से वस्त्र लाने को कहूंगी… इस बीच मैं अपने आपको पुल के पीछे छिपा लूंगी.”
नायिका दौड़कर पुल तक गई और घास के पीछे छिप गई.
पुल की नीचे सरकते ही उसे एक रोयेंदार छाती वाला एक नग्न व्यक्ति दिखलाई पड़ा, जिसे देखते ही वह बेहोश हो गई.
स्मिसकोव भी घबरा गया. उसने उसे कोई जलपरी समझा.
हो सकता है कि यह कोई मायाविनी हो, जो मुझे छलने को आयी है, और उसे इसका विश्वास भी हो गया, क्योंकि वह अपने को काफ़ी आकर्षक मानता था, ‘किन्तु यदि यह कोई मानवी ही हो, तो ऐसी हालत में क्यों है, यहां पुल के नीचे?’
और जब वह हतप्रभ-सा खड़ा सोच रहा था, वह उसके क़रीब आ पहुंची. ‘मुझे मारो नहीं.’ वह बुदबुदायी, ‘मैं राजकुमारी बिबुलोवा हूं. तुम्हें बड़ा इनाम मिलेगा. मैं नदी में से अपनी बंसी का कांटा छुड़ा रही थी कि कुछ चोर मेरे नए वस्त्र, जूते, सबकुछ उठा ले गए.’
“मादाम” स्मिसकोव ने विनीत भाव से कहा,“वे मेरे वस्त्र भी चुरा ले गए, मेरा ‘रोजीन’ तक उन्होंने नहीं छोड़ा.”
थोड़ी देर के उपरान्त वह पुनः बोला,“मादाम, मेरे कारण आप अजीब स्थिति में पड़ गई हैं, किन्तु जिस प्रकार ऐसी अवस्था में आप नहीं जा सकतीं, मैं भी नहीं जा सकता. मेरा सुझाव है कि आप मेरे भीमकाय बाजे के केस में लेटकर ढक्कन बन्द कर लें.”
और इन शब्दों के साथ उसने बाजा केस में से निकाल दिया.
सुन्दरी केस में लेटकर उसकी नज़रों से ओझल हो गई. स्मिसकोव ने अपने आपको अपनी बुद्धिमानी पर बधाई दी.
“मादाम, अब आप मेरी दृष्टि से ओझल हैं, घबराने की तनिक भी आवश्यकता नहीं. अंधेरा होते ही मैं आपको आपके पिता के घर पहुंचा दूंगा. उसके बाद मैं बाजा लेने वापस आऊंगा.”
अंधेरा होते ही केस को बन्द कर पीठ पर लादकर स्मिसकोव बिबुलोव के महल की ओर चला. उसकी योजना थी कि वह पहली काटेज में पहुंचकर अपने लिए कोई वस्त्र मांग लेगा.
‘हर बुराई के पीछे एक अच्छाई भी होती है’, उसने सोचा. ‘बिबुलोव अवश्य ही मुझे पुरस्कृत करेंगे.’
“आप आराम से तो हैं न?” उसने शेखी में आकर पूछा.
किन्तु तभी उसे लगा कि उसके सामने से अंधेरे में दो मानव आकृतियां चली आ रही हैं. उनके नज़दीक आने पर उसने देखा कि वे कुछ पुलिन्दे लिए हुए थे. बिजली की-सी तेज़ी से उसे विचार आया कि हो न हो, वे उसके वस्त्र चुराने वाले चोर ही हैं.
बास बाजे के केस को ज़मीन पर रखकर वह उनके पीछे भागा और चिल्लाया,‘पकड़ो, पकड़ो!’
उन दोनों ने जब देखा कि उनका पीछा किया जा रहा है, तो निकल भागे. राजकुमारी ने कुछ देर तक भागनेवाले क़दमों की आवाज़ सुनी, ‘पकड़ो’ की आवाज़ सुनी और सब कुछ शान्त हो गया.
स्मिसकोव उनके पीछे भागता ही रहा. सुन्दरी को उस केस में सड़क के पास के खेत में पड़ा रहना होता, किन्तु भाग्य ने उसका साथ दिया. उस समय, उसी सड़क से दो अन्य संगीतकार भी, जो स्मिसकोव के मित्र थे, बिबुलोव की दावत में जा रहे थे. केस से ठोकर लगते ही वे भौचक्के रह गए.
“यह बास बाजा है!” मुखोव बोला,“किन्तु यह तो अपने मित्र स्मिसकोव का है, यहां कैसे आया?”
“स्मिसकोव किसी दुर्घटना का शिकार हो गया लगता है. या तो वह अधिक पी गया, अथवा डकैती का शिकार बना. जो भी हो, उसका बाजा हम साथ लेते चलेंगे.” दूसरा मित्र बोला.
उनमें से एक ने उसे पीठ पर लाद लिया. कुछ दूर जाकर वह बोला,“कितना वज़नदार है!”
राजकुमार बिबुलोव के महल में पहुंचकर उन्होंने वह केस एक कोने में रख दिया और दावत में शरीक होने चले गए.
हाल में रोशनी जलायी जाने लगी. बीच में खड़ा हुआ एक रूपवान आकर्षक युवक लाकेच, जो दरबार में एक अधिकारी था, और राजकुमारी का भावी पति था, काउण्ट स्कालीकोव से संगीत की चर्चा कर रहा था.
“आप जानते हैं, काउण्ट, मेरी मुलाक़ात एक ऐसे वायलिन-वादक से हुई थी, जो जादू करता था… आप विश्वास नहीं करेंगे, वह मामूली बास पर ऐसी धुनें बजाता था कि क्या कहने!”
“मुझे तो सन्देह है,” काउण्ट ने कहा.
“यकीन मानिए! उसने उस पर ‘लिज्ट राफ्सोडी’ की ऐसी धुन बजाई कि मैं मन्त्रमुग्ध रह गया. मैं उसके बगलवाले कमरे में रहता था, सो मैंने भी सीख लिया.”
“मज़ाक कर रहे हो…”
“आप विश्वास नहीं कर रहे?” लाकेच ने हंसकर कहा,“तो चलिए, आपको बजाकर सुनाता हूं.”
राजकुमारी का भावी पति काउण्ट के साथ उस कोने में जा पहुंचा. और केस का ढक्कन खोलते ही उन्होंने जो देखा… वह लोमहर्षक था.
तो अब पाठकों को संगीत-चर्चा की उनकी कल्पना पर छोड़कर हम स्मिसकोव के पास लौटते हैं. बेचारा संगीतकार चोरों को पकड़ने में असफल होकर वापस उसी स्थान पर पहुंचा, जहां उसने केस रखा था, किन्तु उसे वह बहुमूल्य बोझ वहां नहीं दिखा. अचरज में डूबा वह सड़क पर कभी आगे जाता, कभी पीछे लौटता. अन्त में उसने सोचा कि वह ग़लत सड़क पर आ गया है.
‘क्या भयानक दुर्घटना है!’ उसने मस्तक पर से पसीना पोंछते हुए सोचा. उसका रक्त अब तक बर्फ बन चुका था. ‘वह उस केस में घुटकर मर जाएगी. मैं हत्यारा हूं.’
अर्ध रात्रि तक वह केस की खोज में भटकता रहा. जब एकदम थककर चूर-चूर हो गया, तो पुल की ओर चल पड़ा.
‘अब मैं प्रातः होने पर खोज करूंगा’, उसने निश्चय किया.
किन्तु प्रातःकालीन खोज का परिणाम भी वही निकला. अब स्मिसकोव ने निश्चय किया कि अंधेरा होने पर वह पुल के नीचे खोज करेगा…
‘मैं उसे खोज कर रहूंगा!’ पसीना पोंछते हुए, हैट उतारते हुए वह बुदबुदाया, ‘चाहे एक वर्ष ही लग जाए.’
और आज भी उस क्षेत्र में रहनेवाले किसान बतलाते हैं कि किस तरह रात को पैदल पुल के पास वे हैट पहने हुए, लम्बे बालों वाली एक नंगी आकृति देखते हैं. और कभी-कभी उस पुल के नीचे से बास बाजे की मधुर ध्वनि भी सुनाई पड़ा करती है.

Illustrations: Pinterest

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