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शू लेस: मीनाक्षी विजयवर्गीय की कहानी

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
May 29, 2023
in नई कहानियां, बुक क्लब
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Meenakshi-Vijayvargiya_Kahani
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कई बार रिश्तों को जोड़ने वाली घटनाएं और कड़ियां इतनी मामूली-सी होती हैं, जिनके बारे में हम सोच भी नहीं सकते. लेखिका मीनाक्षी विजयवर्गीय की कहानी ‘शू लेस’ रिश्ते की एक ऐसी ही कहानी है.

पैर पटकते-पटकते मॉर्निंग वॉक शुरू किया. जब कोई काम हमसे ज़बरदस्ती करवाया जाता है तो हम काम तो कर लेते हैं, पर मन से नहीं करते. ख़ुशी से नहीं करते. बस इसी तरह से मेरा मन ना होते हुए भी मुझे मॉर्निंग वॉक के लिए भेजा गया. नतीजा, मैं बेमन से वॉक कर रही थी. इस बीच मेरी शू लेस बार-बार खुल जा रही थी. मैंने दो-तीन बार बांध लिया, फिर मैंने उसे ऐसे ही छोड़ दिया. चलते-चलते अपने ख़्यालों में चलती जा रही थी, अचानक किसी ने मुझे कहा,‘मैम आपके शू लेस खुले हैं.’ मैंने उसे बिना देखे ही कह दिया,‘आई नो, बट मेरा मन नहीं है बांधने का.’
उसने हाथ से रोका मुझे, मैं समझ नहीं पाई. उसने झुककर मेरे शू लेस बांधी और चला गया. यह सब इतना अचानक हुआ कि मैं कुछ समझ ही नहीं पाई. उसे थैंक्स भी नहीं कह पाई और ना ठीक से देख पाई कि कौन है? क्या है समझ ही नहीं पा रही थी कि कोई भला ऐसा भी करता है क्या. पर उसका ऐसा करना मेरे होंठों पर एक मीठी-सी मुस्कान छोड़ गया. बार-बार मैं पीछे देखती कि कहीं दिख जाए और फिर अपने जूतों की बंधी लेस को देखकर मुस्कुरा रही थी. ऐसा बार-बार मेरा घर आते-आते तक यही चलता रहा. अचानक से अंदर से बहुत अच्छा महसूस कर रही थी. मुझे घर वालों ने ज़बरदस्ती मॉर्निंग वॉक पर भेजा था, उसका ग़ुस्सा तनिक नहीं था सब ग़ायब. थोड़ा ओवर वेट होते ही एक लड़की को लगभग सभी टोकने लगते हैं, बस उनमें से एक मैं भी थी. वज़न बहुत ज़्यादा तो नहीं पर एक मां अपनी बेटी में कोई कमी नहीं चाहती जिसकी शादी की बात चल रही हो .
पूरे दिन उस अनजान के बारे में सोचती रही. रात जल्दी बीत जाए, सुबह जल्दी हो, मैं मॉर्निंग वॉक पर जाऊं, फिर वह मुझे मिल जाए… इन ख़्यालों में रात बीत गई. सुबह में उठकर जल्दी से वॉक पर गई. पर यह क्या मॉर्निंग वॉक पूरा हो गया, परंतु वह कहीं नहीं दिखा. मिला ही नहीं. मन उदास हो चला, पर फिर एक उम्मीद थी कि शायद कल मिले, ऐसा सोचते ऐसा करते 4 दिन बीत गए, दोबारा मिला ही नहीं. अब तो ख़ुद पर हंसी आ रही थी कि मैं भी क्या-क्या नहीं सोच रही थी. आज के टाइम में जहां ‘झुकेगा नहीं साला’ ट्रेंडिग चल रहा है वहां मैं अनजान के सपने देखने लग गई थी. पांचवे दिन सुबह वॉक कर रही थी. कहीं भी उसका ख़्याल नहीं था. तभी किसी ने मुझे क्रॉस करते गुड मॉर्निंग मैम कहा, मेरे मुंह से ‘ओह माय गॉड यू’ बस यही निकल पाया. मैंने देखा वही है. वह भागता नज़र आ रहा था. मैं ज़ोर से चिल्लाई,‘ओ हेलो!’ जैसे ही उसने पीछे मुड़ कर देखा, मैंने अंगूठा दिखाते हुए थैंक्यू कहा. उसने भी थम्ब दिखाया और आगे चला गया. मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था. अब तो मैं उसकी ओर खिंची जा रही थी. इधर घर में शादी की बात चल रही थी, मैंने तो पहले ही हां कर दी थी कि आप लोगों की पसंद से ही करूंगी. अपना वर्क फ्रॉम होम लेकर आई हुई थी. इसी बीच मम्मी-पापा के साथ रहूंगी और उन्होंने जो लड़का देख रखा है, बस उसी से, उनकी पसंद से ही शादी करूंगी. मुझसे पूछा तो गया था कि कोई पसंद हो तो बता दो, परंतु उस समय तक तो कोई था ही नहीं, पर इस अजनबी के लिए क्या-क्या नहीं सोच रही थी. मन में बस गया था वह. दिन-रात उसी का ख़्याल. इतना केयरिंग नेचर, कोई दिखावा नहीं. मुझे तो गुणों की खान लग रहा था. परंतु यह सब बातें बे सिर-पैर की भी लग रही थीं. कोई राह चलते को जीवनसाथी बनाता है क्या? उसका आगे-पीछे, भूत-भविष्य, वर्तमान कुछ भी तो नहीं पता था. और मैं उसके लिए जाने क्या-क्या सपने देख रही थी. अगले दिन वह मुझे फिर सुबह मिला, हम दोनों ने एक-दूसरे से हाय हैलो किया और साथ में वॉक करने लगे. साथ में वॉक करते समय एक दूसरे के बारे में कई बातें हुईं. नाम, जॉब सब जान लिया. उसका पता नहीं पर मन ही मन में उसे पसंद करने लगी. दो-चार दिन साथ में वॉक करने का सिलसिला चलता रहा, पर मेरे मन में कुछ और ही चल रहा था. मैंने बातों ही बातों में एक दिन अचानक ही उससे कह दिया कि मुझे आप बहुत अच्छे लगते हैं और मैं आपको? सवाल भी पूछ लिया. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं यह क्या कह रही हूं, और क्या कर रही हूं. बस जैसे मुझ पर इश्क़ का भूत सवार हो चला था. मैं उसके जवाब के इंतज़ार में एक टक आंखें ना रख कर आंख बंद करके रुक सी गई. उसने कहा की आप अच्छी हैं पर मैं कमिटेड हूं सॉरी. सुनकर दिल के हज़ार टुकड़े हो गए. लगा मन के गुब्बारे में ज़्यादा ही हवा भर ली थी तो उड़ने की जगह फूट गया. बस मैं ‘इट्स ओके’ कह कर रह गई. फीकी सी मुस्कान लिए वॉक पूरा किया. घर आते ही रोना फूट गया. पहले लगा ख़ुद को कहीं दफन कर दूं या इस दुनिया से भाग जाऊं. पूरा दिन उदासी में बीता. घर में किसी को कुछ नहीं बता सकती थी. रातभर सोचती रही कि सुबह वापस जाऊं या नहीं. नहीं जाऊंगी तो क्या सोचेगा, जाऊंगी तो उसका सामना कैसे करूंगी. ऐसा सोचते-सोचते रात को सो भी नहीं पाई. सुबह होते-होते नींद लगी, जागी तो देखा दस बजे थे. हे भगवान यह क्या हुआ क्या करूं. क्या मैं यह मान लूं कि जो होता है अच्छे के लिए ही होता है. विचारों के बीच में युद्ध चल रहा था. समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए. काम में ध्यान लगाने की कोशिश जारी थी पर सब बेकार.
दो-तीन दिन के बाद थोड़ा तो ठीक लगने लगा. ध्यान भटका तो था पर पूरी तरीके से नहीं. मम्मी ने शुक्रवार के दिन मुझसे कहा कि इस रविवार को तुम्हारी कोई ऑनलाइन मीटिंग शेड्यूल तो नहीं है, हमारे यहां पर लड़के वाले उसके पापा-मम्मी के साथ लंच पर आ रहे हैं. मैंने कहा मेरी कोई मीटिंग नहीं. मम्मी ने कहा एक बार फ़ोटो बायोडाटा देख लेती, बात करने में आसानी होगी. मैंने अपना नया रूप बनाने की कोशिश की. मम्मी हम सीधे बात ही करेंगे और हंसने लगी. मम्मी भी साथ में हंसने लगी. पर दिल में बहुत दर्द हो रहा था, काश वो मुझे चुन लेता. पहले तो मुझे लगा था कि जब कोई देखने आएगा तो मैं उसे मना कर दूंगी, पर अब तो ना करने की कोई वजह ही नहीं.
लड़का अपने मम्मी-पापा के साथ आया. मन तो नहीं कर रहा था, परंतु कोई ऑप्शन भी नहीं था. मैं जैसे ही बाहर आई तो क्या देखती हूं वही है. मैंने कहा तुम? उसने कहा आप? हमारे पैरेंट्स हम दोनों की तरफ़ देखने लगे और पूछने लगे क्या तुम दोनों एक दूसरे को जानते हो? तो उसने कहा कि हां इनको मॉर्निंग वॉक पर देखा है. मैंने भी हां में हां कर दी. फिर थोड़ी देर बाद हम दोनों को कहा कि अंदर जाकर बात करना चाहते हो तो कर सकते हो. आते ही उसने मुझसे पूछा आप तो मुझे पसंद करती हैं, फिर आपने अपने मम्मी-पापा की पसंद को हां, क्यों किया? जवाब देने के बजाय मैंने भी पूछा आप तो कमिटेड हैं, फिर क्यों आए देखने के लिए? क्या करूं पैरेंट्स का कहा मानना पड़ता है उसका जवाब था. फिर मेरा मन तो नहीं था, फिर भी मैंने कहा आप ना कर सकते हैं. आप कह देना हमारे विचार बिल्कुल नहीं मिलते हैं. जो चीज मुझे पसंद है, आपको नहीं पसंद. यह कह देना हमारा कोई फ़्यूचर नहीं एक साथ. वह मुझे आश्चर्यभरी नज़रों से देखने लगा. और मैं हूं कि आप यह कह देना कह देना, वह कह देना, कहे जा रहा थी. फिर वह बोला, मुझे नहीं पता था कि आप इतनी समझदार हैं और इतना कम बोलती हैं और मेरे मुंह पर हाथ रख कर बोला, बस इतना परेशान मत होइए माय डियर. मैं कह दूंगा कि तुम्हें लेस बांधना नहीं पसंद, बट इट्स ओके मैं बांध दूंगा. तुम्हें कोई पार्क वाला पसंद है, इट्स ओके, मैं अपने पैरेंट्स की पसंद से शादी कर लूंगा.
जब उसकी बातों का मतलब समझ में आया, तो हंसी फूट पड़ी, विश्वास ही नहीं हो रहा था कि क्या से क्या हो रहा है? अब लग रहा था खुली शू लेस का कमाल है, जो सात जन्मों के बंधन में बांध कर रख दिया. फिर मैंने पूछा आप क्या मुझे जानते थे? उसने कहा, पहले से नहीं जानता था, जिस दिन मैंने आपकी शू लेस बांधी, तब आपको बिल्कुल नहीं जानता था. शाम को मम्मी ने आपका बायोडाटा फ़ोटो दिखाया तो चेहरा जाना पहचाना लगा. पर याद नहीं आ रहा था कि कहां देखा है. फिर काफ़ी वक़्त तक सोचता रहा, इसी उलझन में मैं घर पर अचानक मेरा पैर मुड़ गया, पैर की मोच को सहलाने के लिए जैसे ही झुका, तब याद आया कि आप तो वही खुली शू लेस वाली हैं. पैर की मोच की वजह से ही मैं, वॉक पर नहीं आ पाया था कुछ दिन. सब कुछ जानने के बाद अब मैं खुद पर हंस भी रही थी, और लग रहा था मेरी ख़ुशी उड़ान भरने के लिए शू लेस बांधकर तैयार है.

Illustration: Pinterest

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