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अकबरी लोटा: आपदा में अवसर की एक मज़ेदार कहानी (लेखक: अन्नपूर्णानंद वर्मा)

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
April 2, 2022
in क्लासिक कहानियां, बुक क्लब
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अकबरी लोटा: आपदा में अवसर की एक मज़ेदार कहानी (लेखक: अन्नपूर्णानंद वर्मा)
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अगर हम ख़ुद को शांत और संयमित रख सकें तो बड़ी-से-बड़ी आपदा हमारे लिए अवसर बन सकती है. अन्नपूर्णानंद वर्मा की यह मज़ेदार कहानी इसका अनूठा उदाहरण है.

लाला झाऊलाल को खाने-पीने की कमी नहीं थी. काशी के ठठेरी बाज़ार में मकान था. नीचे की दुकानों से एक सौ रुपये मासिक के क़रीब किराया उतर आता था. अच्छा खाते थे, अच्छा पहनते थे, पर ढाई सौ रुपये तो साथ आंख सेंकने के लिए भी न मिलते थे. इसलिए जब उनकी पत्नी ने एक दिन एकाएक ढाई सौ रुपये की मांग पेश की, तब उनका जी एक बार ज़ोर से सनसनाया और फिर बैठ गया. उनकी यह दशा देखकर पत्नी ने कहा,‘डरिए मत, आप देने में असमर्थ हों तो मैं अपने भाई से मांग लूं?’
लाला झाऊलाल तिलमिला उठे. उन्होंने रोब के साथ कहा,‘अजी हटो, ढाई सौ रुपये के लिए भाई से भीख मांगोगी, मुझसे ले लेना.’
‘लेकिन मुझे इसी ज़िंदगी में चाहिए.’
‘अजी इसी सप्ताह में ले लेना.’
‘सप्ताह से आपका तात्पर्य सात दिन से है या सात वर्ष से?’
लाला झाऊलाल ने रोब के साथ खड़े होते हुए कहा,‘आज से सातवें दिन मुझसे ढाई सौ रुपये ले लेना.’
लेकिन जब चार दिन ज्यों-त्यों में यों ही बीत गए और रुपयों का कोई प्रबंध न हो सका तब उन्हें चिंता होने लगी. प्रश्न अपनी प्रतिष्ठा का था, अपने ही घर में अपनी साख का था. देने का पक्का वादा करके अगर अब दे न सके तो अपने मन में वह क्या सोचेगी? उसकी नज़रों में उसका क्या मूल्य रह जाएगा? अपनी वाहवाही की सैकड़ों गाथाएं सुना चुके थे. अब जो एक काम पड़ा तो चारों खाने चित हो रहे. यह पहली बार उसने मुंह खोलकर कुछ रुपयों का सवाल किया था. इस समय अगर दुम दबाकर निकल भागते हैं तो फिर उसे क्या मुंह दिखलाएंगे?
खैर, एक दिन और बीता. पांचवें दिन घबराकर उन्होंने पं. बिलवासी मिश्र को अपनी विपदा सुनाई. संयोग कुछ ऐसा बिगड़ा था कि बिलवासी जी भी उस समय बिलकुल खुक्ख थे. उन्होंने कहा,‘मेरे पास हैं तो नहीं पर मैं कहीं से मांग-जांचकर लाने की कोशिश करूंगा और अगर मिल गया तो कल शाम को तुमसे मकान पर मिलूंगा.’
वही शाम आज थी. हफ़्ते का अंतिम दिन. कल ढाई सौ रुपये या तो गिन देना है या सारी हेकड़ी से हाथ धोना है. यह सच है कि कल रुपया न आने पर उनकी स्त्री उन्हें डामलफांसी न कर देगी-केवल ज़रा-सा हंस देगी. पर वह कैसी हंसी होगी, कल्पना मात्र से झाऊलाल में मरोड़ पैदा हो जाती थी.
आज शाम को पं. बिलवासी मिश्र को आना था. यदि न आए तो? या कहीं रुपये का प्रबंध वे न कर सके?
इसी उधेड़-बुन में पड़े लाला झाऊलाल छत पर टहल रहे थे. कुछ प्यास मालूम हुई. उन्होंने नौकर को आवाज़ दी. नौकर नहीं था, ख़ुद उनकी पत्नी पानी लेकर आईं.
वह पानी तो ज़रूर लाईं पर गिलास लाना भूल गई थीं. केवल लोटे में पानी लिए वह प्रकट हुईं. फिर लोटा भी संयोग से वह जो अपनी बेढंगी सूरत के कारण लाला झाऊलाल को सदा से नापसंद था. था तो नया, साल दो साल का ही बना पर कुछ ऐसी गढ़न उस लोटे की थी कि उसका बाप डमरू, मां चिलम रही हो.
लाला ने लोटा ले लिया, बोले कुछ नहीं, अपनी पत्नी का अदब मानते थे. मानना ही चाहिए. इसी को सभ्यता कहते हैं. जो पति अपनी पत्नी का न हुआ, वह पति कैसा? फिर उन्होंने यह भी सोचा कि लोटे में पानी दे, तब भी गनीमत है, अभी अगर चूं कर देता हूं तो बालटी में भोजन मिलेगा. तब क्या करना बाक़ी रह जाएगा?
लाला अपना ग़ुस्सा पीकर पानी पीने लगे. उस समय वे छत की मुंडेर के पास ही खड़े थे. जिन बुजुर्गों ने पानी पीने के संबंध में यह नियम बनाए थे कि खड़े-खड़े पानी न पियो, सोते समय पानी न पियो, दौड़ने के बाद पानी न पियो, उन्होंने पता नहीं कभी यह भी नियम बनाया या नहीं कि छत की मुंडेर के पास खड़े होकर पानी न पियो. जान पड़ता है कि इस महत्वपूर्ण विषय पर उन लोगों ने कुछ नहीं कहा है.
लाला झाऊलाल मुश्किल से दो-एक घूंट पी पाए होंगे कि न जाने कैसे उनका हाथ हिल उठा और लोटा छूट गया.
लोटे ने दाएं देखा न बाएं, वह नीचे गली की ओर चल पड़ा. अपने वेग में उल्का को लजाता हुआ वह आंखों से ओझल हो गया. किसी ज़माने में न्यूटन नाम के किसी खुराफाती ने पृथ्वी की आकर्षण शक्ति नाम की एक चीज़ ईजाद की थी. कहना न होगा कि यह सारी शक्ति इस समय लोटे के पक्ष में थी.
लाला को काटो तो बदन में ख़ून नहीं. ऐसी चलती हुई गली में ऊंचे तिमंजले से भरे हुए लोटे का गिरना हंसी-खेल नहीं. यह लोटा न जाने किस अनाधिकारी के झोंपड़े पर काशीवास का संदेश लेकर पहुंचेगा.
कुछ हुआ भी ऐसा ही. गली में ज़ोर का हल्ला उठा. लाला झाऊलाल जब तब दौड़कर नीचे उतरे तब तक एक भारी भीड़ उनके आंगन में घुस आई.
लाला झाऊलाल ने देखा कि इस भीड़ में प्रधान पात्र एक अंग्रेज़ है जो नखशिख से भीगा हुआ है और जो अपने एक पैर को हाथ से सहलाता हुआ दूसरे पैर पर नाच रहा है. उसी के पास अपराधी लोटे को भी देखकर लाला झाऊलाल जी ने फौरन दो और दो जोड़कर स्थिति को समझ लिया.
गिरने के पूर्व लोटा एक दुकान के सायबान से टकराया. वहां टकराकर उस दुकान पर खड़े उस अंग्रेज़ को उसने स्नान कराया और फिर उसी के बूट पर आ गिरा.
उस अंग्रेज़ को जब मालूम हुआ कि लाला झाऊलाल ही उस लोटे के मालिक हैं तब उसने केवल एक काम किया. अपने मुंह को खोलकर खुला छोड़ दिया. लाला झाऊलाल को आज ही यह मालूम हुआ कि अंग्रेज़ी भाषा में गालियों का ऐसा प्रकांड कोष है.
इसी समय पं. बिलवासी मिश्र भीड़ को चीरते हुए आंगन में आते दिखाई पड़े. उन्होंने आते ही पहला काम यह किया कि उस अंग्रेज़ को छोड़कर और जितने आदमी आंगन में घुस आए थे, सबको बाहर निकाल दिया. फिर आंगन में कुर्सी रखकर उन्होंने साहब से कहा,‘आपके पैर में शायद कुछ चोट आ गई है. अब आप आराम से कुर्सी पर बैठ जाइए.’
साहब बिलवासी जी को धन्यवाद देते हुए बैठ गए और लाला झाऊलाल की और इशारा करके बोले,‘आप इस शख्स को जानते हैं?’
‘बिलकुल नहीं. और मैं ऐसे आदमी को जानना भी नहीं चाहता जो निरीह राह चलतों पर लोटे के वार करे.’
‘मेरी समझ में ही इज़ ए डेंजरस ल्यूनाटिक’ (यानी, यह खतरनाक पागल है).
‘नहीं, मेरी समझ में ही इज़ ए डेंजरस क्रिमिनल’ (नहीं, यह ख़तरनाक मुजरिम है).
परमात्मा ने लाला झाऊलाल की आंखों को इस समय कहीं देखने के साथ खाने की भी शक्ति दे दी होती तो यह निश्चय है कि अब तक बिलवासी जी को वे अपनी आंखों से खा चुके होते. वे कुछ समझ नहीं पाते थे कि बिलवासी जी को इस समय क्या हो गया है.
साहब ने बिलवासी जी से पूछा,‘तो क्या करना चाहिए?’
‘पुलिस में इस मामले की रिपोर्ट कर दीजिए जिससे यह आदमी फौरन हिरासत में ले लिया जाए.’
‘पुलिस स्टेशन है कहां?’
‘पास ही है, चलिए मैं बताऊं.’
‘चलिए.’
‘अभी चला. आपकी इजाज़त हो तो पहले मैं इस लोटे को इस आदमी से ख़रीद लूं. क्यों जी बेचोगे? मैं पचास रुपये तक इसके दाम दे सकता हूं.’
लाला झाऊलाल तो चुप रहे पर साहब ने पूछा,‘इस रद्दी लोटे के पचास रुपये क्यों दे रहे हैं?’
‘आप इस लोटे को रद्दी बताते हैं? आश्चर्य! मैं तो आपको एक विज्ञ और सुशिक्षित आदमी समझता था.’
‘आखिर बात क्या है, कुछ बताइए भी.’
‘जनाब यह एक ऐतिहासिक लोटा जान पड़ता है. जान क्या पड़ता है, मुझे पूरा विश्वास है. यह वह प्रसिद्ध अकबरी लोटा है जिसकी तलाश में संसार-भर के म्यूज़ियम परेशान हैं.’
‘यह बात?’
‘जी, जनाब. सोलहवीं शताब्दी की बात है. बादशाह हुमायूं शेरशाह से हारकर भागा था और सिंध के रेगिस्तान में मारा-मारा फिर रहा था. एक अवसर पर प्यास से उसकी जान निकल रही थी. उस समय एक ब्राह्मण ने इसी लोटे से पानी पिलाकर उसकी जान बचाई थी. हुमायूं के बाद अकबर ने उस ब्राह्मण का पता लगाकर उससे इस लोटे को ले लिया और इसके बदले में उसे इसी प्रकार के दस सोने के लोटे प्रदान किए. यह लोटा सम्राट अकबर को बहुत प्यारा था. इसी से इसका नाम अकबरी लोटा पड़ा. वह बराबर इसी से वजू करता था. सन् 57 तक इसके शाही घराने में रहने का पता है. पर इसके बाद लापता हो गया. कलकत्ता के म्यूज़ियम में इसका प्लास्टर का मॉडल रखा हुआ है. पता नहीं यह लोटा इस आदमी के पास कैसे आया? म्यूज़ियम वालों को पता चले तो फैंसी दाम देकर ख़रीद ले जाएं.’
इस विवरण को सुनते-सुनते साहब की आंखों पर लोभ और आश्चर्य का ऐसा प्रभाव पड़ा कि वे कौड़ी के आकार से बढ़कर पकौड़ी के आकार की हो गईं. उसने बिलवासी जी से पूछा,‘तो आप इस लोटे का क्या करिएगा?’
‘मुझे पुरानी और ऐतिहासिक चीज़ों के संग्रह का शौक़ है.’
‘मुझे भी पुरानी और ऐतिहासिक चीज़ों के संग्रह करने का शौक़ है. जिस समय यह लोटा मेरे ऊपर गिरा था, उस समय मैं यही कर रहा था. उस दुकान से पीतल की कुछ पुरानी मूर्तियां ख़रीद रहा था.’
‘जो कुछ हो, लोटा मैं ही ख़रीदूंगा.’
‘वाह, आप कैसे ख़रीदेंगे, मैं ख़रीदूंगा, यह मेरा हक़ है.’
‘हक़ है?’
‘ज़रूर हक़ है. यह बताइए कि उस लोटे के पानी से आपने स्नान किया या मैंने?’
‘आपने.’
‘वह आपके पैरों पर गिरा या मेरे’
‘आपके.’
‘अंगूठा उसने आपका भुरता किया या मेरा?’
‘आपका.’
‘इसलिए उसे ख़रीदने का हक़ मेरा है.’
‘यह सब बकवास है. दाम लगाइए, जो अधिक दे, वह ले जाए.’
‘यही सही. आप इसका पचास रुपया लगा रहे थे, मैं सौ देता हूं.’
‘मैं डेढ़ सौ देता हूं.’
‘मैं दो सौ देता हूं.’
‘अजी मैं ढाई सौ देता हूं.’ यह कहकर बिलवासी जी ने ढाई सौ के नोट लाला झाऊलाल के आगे फेंक दिए.
साहब को भी ताव आ गया. उसने कहा,‘आप ढाई सौ देते हैं, तो मैं पांच सौ देता हूं. अब चलिए.’
बिलवासी जी अफ़सोस के साथ अपने रुपये उठाने लगे, मानो अपनी आशाओं की लाश उठा रहे हों. साहब की ओर देखकर उन्होंने कहा,‘लोटा आपका हुआ, ले जाइए, मेरे पास ढाई सौ से अधिक नहीं हैं.’
यह सुनना था कि साहब के चेहरे पर प्रसन्नता की कूंची गिर गई. उसने झपटकर लोटा लिया और बोला,‘अब मैं हंसता हुआ अपने देश लौटूंगा. मेजर डगलस की डींग सुनते-सुनते मेरे कान पक गए थे.’
‘मेजर डगलस कौन हैं?’
‘मेजर डगलस मेरे पड़ोसी हैं. पुरानी चीज़ों के संग्रह करने में मेरी उनकी होड़ रहती है. गत वर्ष वे हिंदुस्तान आए थे और यहां से जहांगीरी अंडा ले गए थे.’
‘जहांगीरी अंडा?’
‘हां, जहांगीरी अंडा. मेजर डगलस ने समझ रखा था कि वे ही अच्छी चीज़ें ले सकते हैं.’
‘पर जहांगीरी अंडा है क्या?’
‘आप जानते होंगे कि एक कबूतर ने नूरजहां से जहांगीर का प्रेम कराया था. जहांगीर के पूछने पर कि, मेरा एक कबूतर तुमने कैसे उड़ जाने दिया, नूरजहां ने उसके दूसरे कबूतर को उड़ाकर बताया था, कि ऐसे. उसके इस भोलेपन पर जहांगीर दिलोजान से निछावर हो गया. उसी क्षण से उसने अपने को नूरजहां के हाथ कर दिया. कबूतर का यह अहसान वह नहीं भूला. उसके एक अंडे को बड़े जतन से रख छोड़ा. एक बिल्लोर की हांडी में वह उसके सामने टंगा रहता था. बाद में वही अंडा जहांगीरी अंडा के नाम से प्रसिद्ध हुआ. उसी को मेजर डगलस ने पारसाल दिल्ली में एक मुसलमान सज्जन से तीन सौ रुपये में ख़रीदा.
‘यह बात?’
‘हां, पर अब मेरे आगे दून की नहीं ले सकते. मेरा अकबरी लोटा उनके जहांगीरी अंडे से भी एक पुश्त पुराना है.’
‘इस रिश्ते से तो आपका लोटा उस अंडे का बाप हुआ.’
साहब ने लाला झाऊलाल को पांच सौ रुपये देकर अपनी राह ली. लाला झाऊलाल का चेहरा इस समय देखते बनता था. जान पड़ता था कि मुंह पर छह दिन की बढ़ी हुई दाढ़ी का एक-एक बाल मारे प्रसन्नता के लहरा रहा है. उन्होंने पूछा,‘बिलवासी जी! मेरे लिए ढाई सौ रुपया घर से लेकर आए! पर आपके पास तो थे नहीं.’
‘इस भेद को मेरे सिवाए मेरा ईश्वर ही जानता है. आप उसी से पूछ लीजिए, मैं नहीं बताऊंगा.’
‘पर आप चले कहां? अभी मुझे आपसे काम है दो घंटे तक.’
‘दो घंटे तक?’
‘हां, और क्या, अभी मैं आपकी पीठ ठोककर शाबाशी दूंगा, एक घंटा इसमें लगेगा. फिर गले लगाकर धन्यवाद दूंगा, एक घंटा इसमें भी लग जाएगा.’
‘अच्छा पहले पांच सौ रुपये गिनकर सहेज लीजिए.’
रुपया अगर अपना हो, तो उसे सहेजना एक ऐसा सुखद मनमोहक कार्य है कि मनुष्य उस समय सहज में ही तन्मयता प्राप्त कर लेता है. लाला झाऊलाल ने अपना कार्य समाप्त करके देखा. पर बिलवासी जी इस बीच अंतर्धान हो गए.
उस दिन रात्रि में बिलवासी जी को देर तक नींद नहीं आई. वे चादर लपेटे चारपाई पर पड़े रहे. एक बजे वे उठे. धीरे, बहुत धीरे से अपनी सोई हुई पत्नी के गले से उन्होंने सोने की वह सिकड़ी निकाली जिसमें एक ताली बंधी हुई थी. फिर उसके कमरे में जाकर उन्होंने उस ताली से संदूक खोला. उसमें ढाई सौ के नोट ज्यों-के-त्यों रखकर उन्होंने उसे बंद कर दिया. फिर दबे पांव लौटकर ताली को उन्होंने पूर्ववत अपनी पत्नी के गले में डाल दिया. इसके बाद उन्होंने हंसकर अंगड़ाई ली. दूसरे दिन सुबह आठ बजे तक चैन की नींद सोए.

Illustrations: Pinterest

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