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हजामत का साबुन: कहानी इंसान के अलग-अलग चेहरों की (लेखक: अज्ञेय)

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
October 18, 2022
in क्लासिक कहानियां, बुक क्लब
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Hajamat-ka-sabun_Agyeya_Kahani
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हर इंसान के कई चेहरे होते हैं. वह अपने बारे में, दूसरों के बारे में और किसी तीसरे के बारे में अलग-अलग सोचता है. इसी बात को अज्ञेय की कहानी हजामत का साबुन रोचक तरीक़े से बयां करती है.

दुकान में घुसा तो छोटे लाला नौकर को पीट रहे थे.
लाला की दुकान से मैं तब-तब थोड़ा-बहुत सामान लेता रहता हूं. इसलिए बड़े लाला और छोटे लाला और उनके दोनों नौकरों को पहचानता हूं. यों लाला कहने से जो चित्र आंखों के सामने आता है उसके चौखटे में दोनों में से कोई ठीक नहीं बैठता था. मुटापा तो दोनों में इतना था कि नाम के साथ मेल खा जाए, लेकिन इससे आगे थोड़ी कठिनाई होती थी. दोनों प्रायः सूट पहनकर दुकान पर बैठते थे, दुकान का फ़र्नीचर लोहे का था और मेज पर कांच लगा हुआ था. दुकान में किराने से लेकर परचून तक की चीज़ें तो थीं ही, इसके अलावा साज-सिंगार का सामान, अंग्रेज़ी दवाइयां वगैरह भी थीं और पिछले दो-एक वर्ष से दुकान को स्पिरिट और शराब रखने का भी परमिट मिल गया था. मुझे इस तरह की बहुधन्धी दुकानों से कोई विशेष प्रेम हो, ऐसा तो नहीं है, लेकिन दुकान बस-स्टैंड के निकट पड़ती थी और दफ़्तर से घर लौटते समय वहां से कुछ ख़रीद ले जाने में सुभीता था.
थोड़ी देर मैं असमंजस में खड़ा रहा. लाला पीटने में इतना व्यस्त था तो नौकर का पिटने में और अधिक व्यस्त होना स्वाभाविक था. ग्राहक की तरफ़ ध्यान देने की फुरसत किसी को नहीं थी. समझदारी की बात तो यही थी कि वहां से चल देता और जो ख़रीदारी दूसरे दिन तक न टल सकती, वह कहीं और से कर लेता. इससे भी बड़ी समझदारी की बात यह है कि जहां हाथापाई हो रही हो, वहां नहीं ठहरना चाहिए. लेकिन मुझमें दोनों तरह की समझदारी की कमी है और हमेशा रही है. आज से कल तक टालने की बात तो समझ में आ सकती, लेकिन आदमी का पीटता हुआ देखकर समझदारी-भरी उपेक्षा मेरे बस की नहीं है.
लाला के मोटे थुलथुल हाथ का थप्पड़ जो नौकर के गाल पर और आड़े हुए हाथ पर पड़ा तो मेरे मन में तीखी प्रतिक्रिया हुई, ओ लाले के बच्चे, क्यों पीटता है!’’
ऐसी मेरी भाषा नहीं है, ग़ुस्से में भी नहीं. पर उस समय लाला को ‘लाला का बच्चा’ कहना ही मुझे ठीक जान पड़ा, या ऐसे कह लीजिए कि लाला के बच्चे के नाम से ही मोटे और भौंड़े रूप को मैं कोई संगति दे सका.
लाला ने फिर एक थप्पड़ मारा और चिल्लाकर, बोले, तूने मुझे टेलीफ़ोन क्यों नहीं कर दिया?’’
मेरी मुट्ठियां भिंच गयीं. टेलीफ़ोन न करने पर नौकर को मारना मुझे सहन नहीं हुआ. मुझे पूरा विश्वास हो गया कि नौकर को भी वह सहन नहीं होगा. मैंने जैसे मान लिया कि अभी-अभी नौकर भी वापस एक थप्पड़ लाला के-लाला के बच्चे के-मुंह पर जड़ देगा.
पर वह हुआ नहीं. नौकर ने वह थप्पड़ भी चुपचाप खा लिया. और उसके बाद भी मार खाता गया और लाला के बच्चे की फटकार सुनता गया.
लाला ने और चीखकर कहा,‘‘बोलता क्यों नहीं-हीरू के बच्चे?’’
तो नौकर का नाम हीरू है. इस तरह थोड़ा-थोड़ा करके परिस्थिति मेरी समझ में आने लगी. घटना कुल जमा यह हुई थी कि छोटे लाला जब दुकान पर आये थे तो नौकर को घर पर ललाइन की सेवा में और उनके छोटे बच्चे की टहल में छोड़ आये थे. इस बीच ललाइन ने नौकर को हुक़्म दिया कि दुकान से चावल ला दे. नौकर बच्चे को घर पर छोड़कर दुकान से चावल ले आया. आधे घंटे के इस अवकाश में बच्चा ललाइन के अनदेखे बाहर निकल गया और पड़ोसी लाला के घर चला गया, जिसके हम उम्र लड़के से उसकी दोस्ती थी. नौकर ने लौटकर जब बच्चे को नहीं देखा, तब उसे और उसके कहने पर ललाइन को चिन्ता हुई. कोई आधे घंटे में यह पता लग गया कि बच्चा पड़ोस के घर में ही है, लेकिन इस बीच ललाइन का घबराहट से बुरा हाल हो चुका था. दोपहर को लाला जब खाने घर गये थे तब ललाइन ने उन्हें बता दिया था कि कैसे उन्हें बड़ी घबराहट हुई थी. अब लाला दुकान पर लौटकर नौकर से जवाब तलब कर रहे थे कि अगर बच्चा नहीं मिल रहा था तो फ़ौरन उन्हें टेलीफ़ोन क्यों नहीं कर दिया गया कि बच्चा नहीं मिल रहा है. अगर उसको कुछ हो गया होता तो?
टेलीफ़ोन ललाइन भी कर सकती थी-या अगर ख़ुद नम्बर मिलाना उन्हें नहीं आता था तो टेलीफ़ोन करने की बात उन्हें भी सूझ सकती थी, यह नौकर ने अभी तक नहीं कहा. पता नहीं उसे सूझा ही नहीं था, या कि मार का डर उसका मुंह बन्द किये हुए था.
लाला ने कांच की मेज़ पर रखे हुए टेलीफ़ोन को उठाकर पकड़ते हुए फिर कहा,‘‘यह साला है किसलिए? अगर तू…’’ और फिर एक थप्पड़ हीरू को जड़ दिया.
मैंने बड़ी एकाग्रता से मन में कहा,‘‘अरे हीरू, तू भी इनसान है. मार लाला के बच्चे को एक थप्पड़ और पूछ इससे कि…’’
लेकिन हीरू ने एक और थप्पड़ खा लिया, थोड़ा-सा लड़खड़ाया और फिर ज्यों-का-त्यों हो गया.
आप रेस खेलते हैं? मैं खेलता तो नहीं, लेकिन घुड़दौड़ भी मैंने देखी है और रेस खेलनेवाले भी, इसलिए पूछता हूं. हारते हुए घोड़े पर दांव लगानेवाले की घुड़दौड़ देखते हुए जो हालत होती है वही हालत मेरी हो रही थी. भीतर दुस्साहस उत्तेजना और तनाव, कांपते हुए हाथ और सूखकर तालू से चिपकती जबान, और ऊपर से इतना एकाग्र, उपशमन का अंकुश कि जैसे अपने एकाग्रता के बल पर ही हारे हुए घोड़े को जिता दूंगा.
हर उत्तेजना में एक बेबसी होती है. सहसा अपने में उसका अनुभव करके मैंने अपने-आपसे कहा,‘‘यह उत्तेजना क्यों? क्यों तुम इस सेकेंड हैंड सनसनी का शिकार हुए? इतना घबड़ा क्यों रहे हो? छटपटाहट किस बात की है? अरे साहब कुत्तों की दौड़ में मेरा कुत्ता पिछड़ा जा रहा है, दूसरा कुत्ता खरगोश को लपक लेगा! ‘अरे, तुम तो कुत्ते नहीं हो, न तुम खरगोश ही हो… तुम अपने जीवन की उत्तेजना से जूझो, कुत्ते की या खरगोश की उत्तेजना से तुम्हें मतलब? बल्कि कुत्ता तो उत्तेजित भी नहीं है, वह एकाग्र होकर खरगोश के पीछे दौड़ रहा है. और वह… बिना चेतन भाव से ऐसा सोचे भी… यह जानता है कि उत्तेजना उसकी मदद नहीं करेगी बल्कि उसके काम में बाधक होगी. और खरगोश को तो और भी उत्तेजना के लिए फुरसत नहीं है… जिसके सामने ज़िन्दगी और मौत का सवाल हो, उसको ऐसी टुच्ची सनसनी से क्या मतलब? और तुम, तुम दौड़ देखकर छटपटा रहे हो. बल्कि तुम चाह रहे हो, मना रहे हो कि खरगोश उलटकर कुत्ते पर खिसिया उठे या कि उसे अपने जबड़ों में दबोच ले! तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो रहा है!’’
लेकिन नहीं, नौकर निरा खरगोश नहीं है. वह आदमी है. आख़िर वह विरोध में कुछ कह रहा है.
‘‘मगर लालाजी, मैं तो कुक्कू लाला को बीबीजी को सौंप के चला था’’ हां, नौकर इनसान है. अब वह तन जाएगा. अब वह…
‘‘ऊपर से सामने जवाब देता है? उल्लू के पट्ठे, साले, सूअर के बच्चे.’’
‘‘लाला-लाला के बच्चे… हीरू का बच्चा है और तुम्हारा साला है, तो तुम कौन हो, ओ सूअर के दामाद!’’
लेकिन यह तो मैं मन में कह रहा हूं. और मुझे लाला से मतलब नहीं है. लाला से हीरू का मतलब है. मुझे तो नौकर से मतलब है. क्योंकि नौकर जो करे-या मैं जो चाहता हूं कि वह करे-उसके नाते में मुझे उसकी इनसानियत से मतलब है. अब हीरू, तू एक थप्पड़ तो मार दे लाला के बच्चे को. चाहे धीरे से ही-चाहे असफल ही…
नहीं, फ़िजूल है. हीरू कुछ नहीं कर रहा है. और मुझे उससे जो मतलब है और उसके नाते इनसानियत से जो मतलब है वह मेरे सामने एक बड़ी-सी गरम-गरम और ठोस ललकार के रूप में आ खड़ा हुआ है. जैसे किसी ने एक बहुत गरम निवाला मुंह में रख लिया हो और तुरन्त निगल जाना ज़रूरी हो गया हो.
‘‘मैं भी मारूंगा लाला के बच्चे को!’’ मैं बढ़कर लाला के बहुत पास आ गया कि सहसा हीरू बोला-ऐसे स्वरों में जिसको मैं कभी पहचान सकता लेकिन जिसको तुरन्त हीरू का मान लेने को मैं लाचार हूं क्योंकि हम तीनों के अलावा चौथा व्यक्ति वहां है ही नहीं.
‘‘मालिक, आप माई-बाप हैं. आपका लड़का मेरे अपने बच्चे के बराबर है. और मैं उस पर जान देने को तैयार हूं. आप…’’
लाला का फिर उठता हुआ बेडौल हाथ हवा में ही रुक गया है. उनकी चुंधी आंखों में कुछ हुआ है. जिसने मानो उनके हाथ को वहीं-का-वहीं कर जड़ दिया है. आंखों और हाथों में ऐसा सीधा क्या सम्बन्ध होता है, यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन जैसे हठात् बिजली फेर कर जाने से किसी मशीन का उठा हुआ हथौड़ा आकाश में रुक जाए, वैसी ही हालत लाला की हो गयी है.
लाला ने धीरे-धीरे जैसे ज़बरदस्ती हाथ को नीचे झुकाकर मेज़ पर से झाड़न उठा लिया है और वह हाथ पोंछने लगा.
अब मैं कुछ नहीं कर सकता-लड़ाई तो ख़त्म हो गयी है. इससे पहले ही मार देता तो…
असमंजस में मैंने जल्दी की थी, उसकी कुंठा को ग़ुस्से का रूप ले लेना तो स्वाभाविक था. लेकिन लाला का बच्चा नौकर को मारकर अब हाथ पोंछता है. चाहिए तो नौकर को जाकर नहाना कि वह इस गलीज चीज़ से छू गया है जो लाला बनी फिरती है.
‘‘हां, साऽब-आपको क्या चाहिए?’’
मुझे? अच्छी तश्तरी पर रखा हुआ तुम्हारा कटा हुआ सिर! …इस दुकान से अब भी कुछ लेने का मन नहीं है. यह लाला जैसे इनसानियत के घावों पर जमा हुआ कच्चा खुरंट है, जिससे सम्पर्क में आने की बात ही घिनौनी जान पड़ती है…
मैंने कहा,‘‘अब कुछ नहीं चाहिए. हुल्लड़ सुनकर रुक गया था. जो देखा, वह मुझे तो बड़ी शरम की बात लगी…’’
लाला बंगलें झांकने लगा. फिर घिघियाता हुआ-सा बोला,‘‘हां, सा’ब, शरम की बात तो है. क्या बताऊं, मुझे ग़ुस्सा आ गया. बच्चे की बात है, आप जानते हैं.’’ फिर कुछ रुककर अनिश्चय से, जैसे छोटे मुंहवाले कनस्तर से उंगली से खोद कर घी निकाला जा रहा हो,‘‘वैसे यह थोड़े ही है कि मैं इस नौकर की क़दर नहीं करता-उसकी लायल्टी का मुझे पूरा भरोसा है…’’ फिर सहसा व्यस्त होते हुए,‘‘लेकिन सा’ब, आप बिना कुछ लिए न जाएं-नहीं तो मुझे बड़ा मलाल रहेगा-क्या चाहिए आपको?’’
वह क्या कहानी कभी सुनी थी-बुढ़िया बूचड़ की दुकान में गयी तो बूचड़ ने सिर पर से पैर तक उसको देखकर रुखाई से पूछा,‘‘तुम्हें क्या चाहिए बुढ़िया?’’ ग़रीबिनी बुढ़िया को सवाल बड़ा अपमानजनक लगा-क्या हुआ उसे छोटा सौदा ख़रीदना है? तो वह बोली,‘चाहिए? चाहिए मुझे माल रोड पर हवेली और तीन मोटरें और चन्दन का पलंग. लेकिन तुझसे, मियां बूचड़, मुझे चाहिए सिर्फ़ दो पैसे का सूखा गोश्त.’’
मैं थोड़ी देर चुपचाप लाला की तरफ़ देखता रहा. फिर जैसे मैंने भी अपने भीतर से कहीं खोदकर निकाला,‘‘एक पैकेट चाय-छोटा पैकेट-और कोई सस्ता हजामत का साबुन है?’’

Illustration: Pinterest

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