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प्यार व्यार शादी वादी: कहानी दुनियादारी की (लेखक: अंतोन चेखव)

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
October 15, 2021
in क्लासिक कहानियां, ज़रूर पढ़ें, बुक क्लब
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प्यार व्यार शादी वादी: कहानी दुनियादारी की (लेखक: अंतोन चेखव)
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क्या होता है, जब दो युवाओं पर उनके परिवार वाले ज़बर्दस्ती शादी के लिए दबाव डालते हैं? एक शाम वे दोनों मिलते हैं और बताते हैं, क्यों वे शादी नहीं करना चाहते. क्या होता है उसके बाद, जानने के लिए पढ़ें अंतोन चेखव की दिलचस्प कहानी ‘प्यार व्यार शादी वादी’.

जब सभी लोग फलों के रस से बनी पूंश नामक हलकी शराब पी चुके तो हमारे माता-पिता ने फुसफुसाकर आपस में कुछ बात की और वे हमें उस कमरे में अकेला छोड़कर बाहर चले गए. मेरे पिता ने जाते-जाते फुसफुसाकर मुझसे कहा,‘चल, आगे बढ़ और उससे बात कर.’
‘अरे बाऊजी, अगर मैं इससे प्यार नहीं करता हूं तो कैसे ज़बरदस्ती मैं इससे यह कह सकता हूं कि मैं तुम्हें चाहता हूं…’
‘यार! तुझे इससे क्या लेना-देना है? बेवकूफ़ी मत कर… ज़रा दिमाग़ से काम ले…’
यह कहकर मेरे पिता ने कहर भरी नज़र मुझपर डाली और कमरे से बाहर चले गए. तभी उढ़का हुआ दरवाज़ा खुला और किसी उम्रदराज़ औरत का हाथ कमरे में आया और उसने मेज़ पर रखी हुई मोमबत्ती उठा ली. अब कमरे में पूरी तरह से अन्धेरा छा गया था.
मैंने सोचा, ख़ैर चलो, अब जो होगा, देखा जाएगा. इसके बाद मैंने थोड़ी चालाकी बरतते हुए कहा,‘ज़ोया, यह अन्धेरा मुझे भला लग रहा है. आख़िर अब हम अकेले हैं और अपने मन की बात कह सकते हैं. अन्धेरा मेरे चेहरे पर झलक आई शर्म को छुपा रहा है. यह शर्म का अहसास मेरे मन में इसलिए पैदा हुआ है क्योंकि अपनी भावनाओं के कारण इस समय मेरा दिल जल रहा है… उसमें जैसे आग भड़क रही है…’
यह कहकर मैं चुप हो गया. उधर ज़ोया का दिल इतनी ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था कि उसकी आवाज़ मुझे भी सुनाई दे रही थी. घबराहट से ज़ोया दांत किटकिटा रही थी. उसका बदन भी बुरी तरह से कांप रहा था और यह कंपकंपाहट उस बेंच से होकर, जिसपर हम बैठे हुए थे, मुझ तक भी पहुंच रही थी. यह बेचारी लड़की भी मुझसे प्यार नहीं करती थी, बल्कि यह तो मुझसे वैसे ही नफ़रत करती थी, जैसे कोई कुत्ता उस छड़ी से नफ़रत करता है, जिससे कभी-कभी उसे सज़ा दी जाती है. हालांकि मुझे तब तक बहुत से पुरस्कार और पदक मिल चुके थे, लेकिन फिर भी उस समय उस लड़की के सामने मैं एक वैसा ही वनमानुष बना बैठा था, जो असभ्य, अशिष्ट और गंवार होता है. मैं भारी थोबड़ेवाले, बड़े-बड़े रोयोंवाले किसी बदसूरत जानवर की तरह लग रहा था. लगातार चलने वाले ज़ुकाम और अक्सर पी जाने वाली शराब की वज़ह से मेरी नाक फूली हुई थी और मेरा थोबड़ा लाल-भभूका बना हुआ था. मैं इतना ढीला-ढाला और आलसी हो चुका था कि भालू भी मेरे सामने ज़्यादा फुरतीला और ज़्यादा चालाक दिखाई देता. और मैं कितना नीचे गिर चुका था, उसके बारे में तो कुछ बताया ही नहीं जा सकता. कभी मैंने इसी ज़ोया से, जिससे अब मेरे रिश्ते की बात चल रही थी, रिश्वत भी खाई थी. उससे अपने मन की बात कहकर मैं चुप हो गया था क्योंकि अब मुझे इस लड़की पर दया आ रही थी.
‘चलिए, बाहर बगीचे में चलते हैं,’ मैंने उससे कहा,‘यहां घुटन महसूस हो रही है.’
हमारे माता-पिता उस कमरे के बाहर ही खड़े हुए थे और हमारी बातचीत सुनने की कोशिश कर रहे थे. हमें बाहर निकलता देख वे जल्दी से बरामदे के एक कोने में जाकर खड़े हो गए. हम घर से बाहर निकल आए और घर के सामने बने बगीचे में एक पगडण्डी पर चलने लगे. ज़ोया के चेहरे पर चान्द की रौशनी चमक रही थी. मैं बेवकूफ़ों की तरह उसे घूर रहा था. मैंने उसके चेहरे पर झलक रहे लावण्य और मधुरता को महसूस किया, फिर एक गहरी सांस भरी और उससे कहा,‘लगता है, नर कोयल गा रहा है, अपनी मादा को लुभा रहा है… पर मैं, भला, किसी को क्या लुभा सकता हूं …?’
ज़ोया का चेहरा शर्म से लाल हो गया और उसने अपनी नज़रें झुका लीं. शायद उसे पहले ही यह बता दिया गया था कि उसे मेरे सामने किस तरह का अभिनय करना है. हम दोनों बगीचे के उस पार नदी किनारे पहुंच गए थे. वहां एक बेंच पड़ी थी. हम दोनों बेंच पर बैठ गए और नदी में लहरों की अठखेलियां देखने लगे. नदी के उस पार सफ़ेद गिरजाघर चमक रहा था और गिरजाघर के पीछे लगे पेड़ों के उस पार ज़मींदार कुलदारफ़ की बड़ी-सी हवेली झलक रही थी. इसी हवेली में वह क्लर्क बलनीत्सिन रहता है, जिसे ज़ोया पूरे मन से चाहती है. बेंच पर बैठकर ज़ोया ने अपनी निगाहें उस हवेली पर टिका दीं. मुझे ज़ोया पर फिर दया आई और घबराहट से मेरा दिल बैठने लगा. हे ख़ुदा… हे ईश्वर… हमारे मां-बाप को स्वर्ग में भेजना… लेकिन कम से कम एक हफ़्ता उन्हें ज़रूर नरक में रखना.
‘मेरी ज़िन्दगी सिर्फ़ एक इनसान की ताबेदार है. सिर्फ़ वही इनसान मेरी ख़ुशी की ज़िम्मेदारी ले सकता है,’ मैंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा,‘उस लड़की के लिए मेरे मन में एक ख़ास जगह है, एक ख़ास अहसास है… सच-सच कहूं तो मैं उसे मोहब्बत करता हूं… मैं बुरी तरह से उसके इश्क़ में डूबा हुआ हूं… उससे बेहद प्यार करता हूं. सवाल यह है कि वो मुझे चाहती है या नहीं? अगर वो मुझे नहीं चाहती, वो मुझसे प्यार नहीं करती तो समझिए मैं बरबाद हो जाऊंगा… मैं मर जाऊंगा… और जानती हैं… वह लड़की कौन है?… आप ही हैं… आप ही हैं वो ख़ास इनसान मेरे लिए. क्या सचमुच ऐसा हो सकता है कि आप भी मुझे प्यार करें? बताइए न? क्या आप भी मुझे चाहती हैं…?’
‘जी, आपको ही चाहती हूं,’ ज़ोया ने बुदबुदाकर होठों ही होंठों में कहा.
उसकी यह बात सुनकर मैं स्तब्ध रह गया क्योंकि मुझे लग रहा था कि मेरी बात सुनकर उसकी आंखों में आंसू आ जाएंगे, वह रोएगी और फिर धीरे से इनकार कर देगी क्योंकि वह किसी और को चाहती है. मैं उसकी इस मोहब्बत से ही उम्मीदें लगाकर बैठा हुआ था. पर अब मामला खटाई में पड़ गया था. वो अपने मां-बाप की इच्छा की मुख़ालफ़त करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थी.
‘जी, मैं भी आपको ही चाहती हूं,’ ज़ोया ने फिर से दोहराया और फूट-फूटकर रोने लगी.
‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता!’ मैंने घबराकर कांपती हुई आवाज़ में कहा. मैं इतना घबरा गया था कि मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि मुझे अब उससे क्या कहना चाहिए,‘ज़ोया, यह सच है क्या? कहीं मेरी बात पर यक़ीन करके ही तो आपने हामी नहीं भर दी. मेरी बातों पर ज़रा भी विश्वास नहीं कीजिए. ओ ख़ुदा! यह क्या हो गया? ज़ोया मैं यक़ीन करने लायक नहीं हूं. मुझे आपसे ज़रा भी प्यार नहीं है… वह तो मैंने यूं ही कह दिया था… मुझे सारे ज़माने की बददुआएं लगें, अगर मैंने सच कहा हो… मुझे यक़ीन है कि आप भी मुझसे प्यार नहीं करतीं! प्यार-व्यार… ये सब बेकार की बातें हैं…’
मैं बदहवास होकर बेंच के चारों तरफ़ भागने लगा था. ‘अरे ये सब मज़ाक है, ज़ोया! ये प्यार-व्यार, ये शादी-वादी सब फ़ालतू की चीज़ें हैं. ज़मीन-ज़ायदाद के मामले हैं ये सब और इन्हीं मामलों की वजह से हमारा रिश्ता तय किया जा रहा है. आपसे शादी करने से तो बेहतर है कि मैं अपने गले में एक भारी पत्थर लटका लूं. उन्हें आख़िर क्या हक़ है कि वो हमारी ज़िन्दगियों के साथ खिलवाड़ करें. वो लोग हमें अपना ग़ुलाम समझते हैं क्या? हमें अपना कुत्ता समझते हैं कि जब मरज़ी हुई, जिस किसी भी खूंटे से बान्ध दिया. नहीं, हम ये शादी नहीं करेंगे… चाहे कुछ भी हो जाए. हमने अभी तक उनकी सारी बातें मानी थीं, लेकिन अब मैं नहीं मानूंगा. मैं अभी जाकर उनसे कहता हूं कि मैं आपसे शादी नहीं कर सकता. बस, बात ख़त्म हो जाएगी.’
अचानक ही ज़ोया ने रोना बन्द कर दिया और एक पल में ही उसकी आंखें सूख गईं.
उधर मैं अपने जुनून में बोलता ही जा रहा था,‘मैं अभी उन्हें बता दूंगा… आप भी कह दीजिएगा… आप उन्हें बता दीजिए कि आप मुझे क़तई नहीं चाहती हैं और बलनीत्सिन से प्यार करती हैं. आप कह दीजिए कि शादी करूंगी तो बलनीत्सिन से ही… मुझे मालूम है कि आप उसे कितनी गहराई से प्यार करती हैं!’
मेरे साथ चलते-चलते ज़ोया अचानक हंसने लगी थी. वो बड़ी ख़ुश दिखाई दे रही थी.
‘आपको भी तो किसी और लड़की से प्यार है,’एक हाथ से अपना दूसरा हाथ सहलाते हुए ज़ोया ने कहा,‘आप मोहतरमा देबे से प्यार करते हैं…’
‘हां, आप ठीक कह रही हैं. मैं देबे को ही चाहता हूं. हालांकि वह हमारे धर्म की नहीं है, वह बहुत पैसेवाली भी नहीं है… पर वह बहुत नेक और दयालु लड़की है… बेहद समझदार है… बस, इसी वजह से मैं उसे चाहता हूं… चाहे मेरे घरवाले मुझे कितनी भी ग़ालियां दें… पर मैं यदि शादी करूंगा, तो उससे ही. उसे तो मैं अपनी जान से भी ज़्यादा चाहता हूं! उसके बिना मेरा जीवन बेकार है… उसके बिना, मैं जी नहीं सकता! अगर मेरी शादी देबे से नहीं होगी तो मैं जीते जी मर जाऊंगा! चलिए, चलते हैं और इन बाज़ीगरों को बता देते हैं कि हम ये शादी नहीं करेंगे. मैं आपका बेहद शुक्रगुज़ार हूं कि आपने मेरी बात मान ली है.’
हम दोनों के दिल बल्लियों उछल रहे थे. हम ख़ुशी से पागल हो गए थे. मैं बार-बार ज़ोया को शुक्रिया कह रहा था और ज़ोया भी ख़ुशी से मेरे हाथों को चूम रही थी. हम दोनों एक-दूसरे को नेक और ईमानदार बता रहे थे. फिर ज़ोया ने मेरे सिर और मेरे गालों को चूमना शुरू कर दिया. मैं बार-बार उसके हाथ चूम रहा था. मैं उसके एहसान के तले इतनी बुरी तरह से दब गया था कि सारी तमीज़ भूलकर मैंने उससे लिपटना शुरू कर दिया था. कहना चाहिए कि एक-दूसरे से मोहब्बत न होने का यह इज़हार इतना ख़ुशगवार इज़हार था कि वह हमें मोहब्बत के इज़हार से ज़्यादा ज़रूरी लग रहा था. हमारे चेहरे ख़ुशी की वजह से गुलाबी हो गए थे. हम घर की तरफ़ चल पड़े ताकि अपने-अपने मां-बाप को अपने इस फ़ैसले की जानकारी दे सकें.
‘अरे, वो हमें ग़ालियां ही देंगे न, हमारी पिटाई कर देंगे,’ मैं बड़े जोश में बोल रहा था,‘हद से हद हमें घर से निकाल देंगे, पर हम ख़ुश तो रहेंगे न!’
हम घर पहुंचे तो देखा कि हम दोनों के माता-पिता वहीं दरवाज़े पर हमारा इन्तज़ार कर रहे थे. हमारे ख़ुशी से चमकते चेहरे देखकर उन्होंने तुरन्त नौकर को बुलाया और शैम्पेन की बोतल लाने को कहा. लेकिन मैंने इसका विरोध करना शुरू कर दिया. मैं हाथ उठा-उठाकर और पैर पटक-पटक कर अपनी बात कहने लगा. ज़ोया भी चिल्ला रही थी और ज़ोर-ज़ोर से रो रही थी. वहां हंगामा हो गया था. आख़िर उस दिन शैम्पेन की बोतल नहीं खुली.
पर आख़िर हमारी शादी कर दी गई.
आज हमारी शादी की रजत जयन्ती है. हम पिछले पच्चीस साल से एक-दूसरे के साथ रह रहे हैं. शुरू-शुरू में ज़िन्दगी की गाड़ी बड़ी मुश्क़िल से खिंची. मैं लगभग रोज़ ही ज़ोया को ग़ालियां देता था, उसे डांटा करता था. कभी-कभी तो उस पर हाथ भी छोड़ देता था. लेकिन बाद में अपनी हरक़त पर दुखी होकर और ज़ोया पर तरस खाकर मैं उसे प्यार करता था… उन्हीं दुख भरे दिनों में एक-एक करके हमारे बच्चे पैदा हो गए… और फिर… फिर हमें एक-दूसरे की आदत पड़ गई… इस वक़्त मेरी प्यारी ज़ोया मेरी पीठ के पीछे खड़ी हुई है और मेरे कन्धों पर हाथ रखकर मेरे गंजे सिर को चूम रही है.

Illustration: Pinterest

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