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Home ज़रूर पढ़ें

नज़र कमज़ोर हो रही हो तो ख़ुद को दें शिमला मिर्च का तोहफ़ा

डॉक्टर दीपक आचार्य by डॉक्टर दीपक आचार्य
October 27, 2021
in ज़रूर पढ़ें, डायट, हेल्थ
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नज़र कमज़ोर हो रही हो तो ख़ुद को दें शिमला मिर्च का तोहफ़ा
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शिमला मिर्च तो हम सभी ने कभी न कभी खाई ही होगी. कभी शिमला मिर्च के भीतर आलू भरकर बनाई गई सब्ज़ी, कभी आलू-शिमला मिर्च, कभी बेसन और शिमला मिर्च तो कभी कचूम्बर सलाद में डालकर. पर क्या आपको पता है कि शिमला मिर्च आपकी आंखों के स्वास्थ्य के लिए बेहद अच्छी है? इस बारे में और काम की, और साइंटिफ़िक जानकारी दे रहे हैं डॉक्टर दीपक आचार्य.

शिमला मिर्च तो हर किसी ने देखी भी होगी, खाई भी होगी, लेकिन आप इसके एक नायाब गुण के बारे में क़तई नहीं जानते होंगे. और वो ये है कि मोतियाबिंद (कैटरेक्ट) और मैक्यूलर डीजनरेशन जैसी समस्याओं को रोकने के लिए शिमला मिर्च बड़ी ख़ास होती है. क्यों होती है ख़ास जानना चाहेंगे?

ल्यूटीन (Lutein) और ज़िएक्ज़ैन्थीन (zeaxanthin), ये दो ऐसे नैचुरल कंपाउंड्स हैं, जो आंखों की सेहत के लिए बड़े ही महत्वपूर्ण हैं. ये दोनों कंपाउंड्स बेहतरीन ऐंटीऑक्सीडेंट्स हैं और आंखों की सेहत के लिए तो अति महत्वपूर्ण हैं, लेकिन दुर्भाग्य से ये हमारे शरीर में बनते नहीं हैं. इनकी पूर्ति हम बेहतरीन खानपान से ही कर सकते हैं, शिमला मिर्च के अलावा और भी कई फल और सब्जियां हैं, जिनमें ये दोनों ऐंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं. लेकिन, शिमला मिर्च की ख़ासियत ये है कि इनमें कैलरीज़ कम होती हैं और हल्की-फुल्की होने के साथ-साथ ये बहुत सारे विटामिन्स से भरपूर हैं. और सबसे ख़ास बात ये है कि डायबेटिक्स भी इसे शौक़ से खा सकते हैं. चूंकि आंखों से जुड़ी इन समस्याओं (कैटरेक्ट और मैक्यूलर डीजनरेशन) की मुख्य वजहों में से एक डायबिटीज़ ही है, इसलिए शिमला मिर्च एक बेहतरीन ऑप्शन है.

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बोलगर्सके सुखोय खाया तो ये भी जाना
मॉस्को (रूस) से 600 किमी दूर मोरूम एक छोटा-सा क़स्बा है. मैं क़रीब 25 दिन वहां रहा था. एक रात किसी ने मुझे खाने पर बुलाया, खाने से पहले ड्रिंक्स वगैरह का रिवाज होता है वहां. एक तश्तरी में कुछ पपड़ी की तरह का आइटम रखा हुआ था. ड्रिंक्स के साथ इसे चाव से खाया जा रहा था और जब मैं इस आइटम को चुग रहा था तो मुझे बताया गया कि ये आंखों के लिए बहुत अच्छा है. जब मैंने इसके बारे में और पूछताछ की तो मुझे पता चला कि ये ‘बोलगर्सके सुखोय’ है. अब ये इतने कठिन नाम वाली चीज़ जानते हैं क्या थी? कुछ और नहीं, सूखी हुई शिमला मिर्च थी और तब पहली बार ये भी पता चला कि सूखे को रूसी भाषा में सुखोय कहते हैं!

तो इस पंचायत का निष्कर्ष क्या है?
अजी वो तो बड़ा सीधा-सा है, ये सब पंचायत छोड़ें. हफ़्ते में 2-3 बार शिमला मिर्च भी खाएं. किसी भी तरीक़े से: सब्जी बनाकर, सलाद के तौर पर या बोलगर्सके सुखोय की तरह. अब आप दीपक आचार्य से ये ना पूछना कि हरी वाली खाएं, या लाल या पीली वाली शिमला मिर्च… भई, जो आसानी से मिले वो वाली खा लें.
और हां, वो ‘बोलगर्सके सुखोय’ बनाना हो तो ज़्यादा टीमटाम करने की ज़रूरत नहीं, लंबी-लंबी धार में शिमला मिर्च कट करें, दो दिन धूप में सुखा दें, एक दिन छांव में फैलाकर रखें और कंटेनर में डाल दें. जब खाने का मूड बने तो डिब्बा खंगालें और चाट मसाला डालकर चट्ट कर जाएं. है ना सॉलिड तोहफ़ा आपके लिए ये. अब क्या सोच रहे हैं आप? तो चलिए मेरी तरफ़ से गुनगुना लीजिए:
तोहफ़ा तोहफ़ा तोहफ़ा तोहफ़ा,
लाया लाया लाया लाया

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट

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डॉक्टर दीपक आचार्य

डॉक्टर दीपक आचार्य

डॉक्टर दीपक आचार्य, पेशे से एक साइंटिस्ट और माइक्रोबायोलॉजिस्ट हैं. इन्होंने मेडिसिनल प्लांट्स में पीएचडी और पोस्ट डॉक्टरेट किया है. पिछले 22 सालों से हिंदुस्तान के सुदूर आदिवासी इलाक़ों से आदिवासियों के हर्बल औषधीय ज्ञान को एकत्र कर उसपर वैज्ञानिक नज़रिए से शोध कर रहे हैं.

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ओए अफ़लातून

हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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