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ओए अफ़लातून
Home ज़रूर पढ़ें

पसीना छुड़ाइए और सेहतमंद बन जाइए

डॉक्टर दीपक आचार्य by डॉक्टर दीपक आचार्य
March 30, 2022
in ज़रूर पढ़ें, फ़िटनेस, हेल्थ
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पसीना छुड़ाइए और सेहतमंद बन जाइए
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अपने तन यानी शरीर को यदि स्वस्थ बनाए रखना है तो पसीना बहाना बहुत ज़रूरी है. हालांकि आप भी यह बात जानते होंगे, पर अमल में तो नहीं ला पाते न. तो अफ़लातून तन पाने के लिए आपको मेहनत करनी होगी, पसीना बहाना होगा और इसी बारे में बड़े काम की जानकारी दे रहे हैं डॉक्टर दीपक आचार्य. हमें उम्मीद है कि इसे पढ़ने के बाद आप भी निकल पड़ेंगे पसीना बहाने.

 

 

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तो बताइए कि आप में से कौन-कौन तैयार है पसीना छुटाने के लिए? मेरी रिसर्च और घुमक्कड़ी का बहुत बड़ा हिस्सा जंगलों और पहाड़ों पर बीतता है. गर्मियों में बड़ी-बड़ी चट्टानों और पहाड़ों पर हाइकिंग करना हम सभी के लिए टेढ़ी खीर होता है. शरीर गर्मी और थकान की वजह से पसीने से तरबतर हो जाता है. एक बार भरी गर्मी में पहाड़ों पर भटकते हुए जब एक पेड़ की छांव में आराम करने का मौक़ा मिला तो पसीने से तरबतर मैं गर्मी को कोसे जा रहा था. मेरे साथ बगल में बैठे एक बुज़ुर्ग आदिवासी जानकार ने आंखें बड़ी करते हुए मुझे समझाना शुरू किया कि महीने में कम से कम एक बार शरीर से पसीना फूटना ज़रूरी है. मेरे द्वारा ज़्यादा पूछे जाने पर बताया गया कि शरीर को बीमारियों, त्वचा के रोगों से दूर रखना है तो पसीना बहना बहुत ज़रूरी है. बात तो बड़ी लॉजिकल कही उन्होंने. शरीर को डीटॉक्स करने में पसीना बड़ा अहम रोल निभाता है. शरीर के भीतर के हेवी मेटल्स हों या तमाम तरह के केमिकल्स या त्वचा पर जमे हुए बैक्टेरिया, सबको बाहर फेंक निकालने के लिए पसीना छूटना ज़रूरी है.

अब रिसर्च के बारे में भी जान लीजिए
चीन का एक रिसर्च जर्नल है, एन्वायरन्मेंट साइंस पलूशन रिसर्च इंटरनैशनल, इसमें वर्ष 2016 में वैज्ञानिक शेंग की टीम ने एक बेहतरीन क्लिनिकल रिपोर्ट प्रकाशित की. ये रिपोर्ट बताती है कि जिन लोगों ने एक्सरसाइज़ या किसी फ़िज़िकल ऐक्टिविटी के कारण पसीना बहाया, उनके शरीर में हेवी मेटल्स की मात्रा पसीना आने से पहले की तुलना में कम आंकी गई. मज़े की बात ये भी थी कि हेवी मेटल्स की जानकारी के लिए इन लोगों के मूत्र और पसीने के सैम्पल लिए गए थे. पसीने के सैम्पल में ज़्यादा हेवी मेटल्स देखे गए. अब आपके दोस्त दीपकआचार्य से एन्वायरन्मेंटल ऐंड पब्लिक हेल्थ जर्नल की स्टडी के बारे में भी जान लीजिए. वर्ष 2012 में स्टीफ़न जीनियस और उनके साथियों ने एक बेहतरीन रिसर्च स्टडी की. बिस्फ़ेनॉल ए, एक इंडस्ट्रियल केमिकल है जो प्लास्टिक और रेसिंस मैनुफैक्चरिंग प्लांट में काम करने वाले लोगों या आसपास के रहवासियों के शरीर में आ जाता है, जिसके हेल्थ पर कई तरह के प्रभाव पड़ते हैं. जीनियस की टीम ने इस तरह की इंडस्ट्री में काम करने वाले लोगों के ख़ून, पेशाब और पसीने के सैम्पल लिए और इन्होंने पाया कि सबसे अधिक मात्रा में पसीने के जरिए ही बिस्फ़ेनॉल ए रिलीज़ हुआ.
पसीने को लेकर इतना ज्ञान पेल दिया गया है तो वर्ष 2016 में जर्नल ग्लायकोबायोलॉजी में छपी रॉबिन पीटरसन की रिपोर्ट का ज़िक्र आना भी जरूरी है. इन्होंने बताया कि पसीने में ग्लायकोप्रोटीन्स होते हैं जो बैक्टीरिया को आकर्षित करते हैं, पसीना आने के वक़्त त्वचा पर जितने बैक्टीरिया हैं, सारे पसीने में लिपटकर बाहर फेंक दिए जाते हैं. पसीने की जो गंध होती है, वो टॉक्सिन्स और बैक्टीरिया की वजह से ही होती है.

अब इतनी सारी पंचायत करने का मतलब क्या हुआ?
इट्स वेरी सिंपल बाबूजी… घूमो, फिरो, वर्जिश करो, धूप में निकलो, पसीना आए तो ख़ूब आने दो, खट्ट से एयर कंडीशनर में या छांव में घुसो मत. प्रकृति ने व्यवस्था कर रखी है आपको डीटॉक्स करवाने की, आजमाओ उसे. पूरे शरीर पर छन्नी जैसे छेद हैं, पसीना बहने की नालियां, सारी चोक करके रखे हो, दुनियाभर के टीम-टाम और आलतू-फालतू केमिकल्स बॉडी के भीतर घुसे पड़े हुए हैं. चोक नालियों को खोलो, पसीना बहेगा तो ज़हर निकालेगा, निकालो… इन गर्मियों में हर महीने कम से कम 2 बार धूप झेलो, पसीना छूटने दो, पानी के बैलेंस को भी बनाए रखो,पानी भी पीते रहो लेकिन पसीने से डरो मत, ये पसीना आपकी सेहत ही बनाएगा, सच्ची, बाय गॉड की कसम! पसीने के निकलने से इम्युनिटी भी बढ़ती है.. पसीना निकालकर शाम को नहाना भी ज़रूरी है, क्योंकि पसीने के ग्लायकोप्रोटीन्स शरीर की त्वचा पर चिपके रह गए तो बैक्टीरिया को आकर्षित करेंगे. बुजुर्गों की एक बात तो याद होगी ही ना, खेलकूद कर आओ या यात्रा के बाद घर पहुंचो तो पहले स्नान करो. अब लॉजिक को को-रिलेट करना आसान होगा, है ना?
कुल मिलाकर, मुद्दे की बात ये है कि निकलो तो सही बाहर, भटको तो सही. ये धूप, पसीना, वर्जिश की बात सारे के सारे लोग जानते हैं, पर मानते नहीं. है, लॉजिक सटीक और सॉलिड है, बाक़ी आपकी इच्छाशक्ति. हम तो ख़ूब बहाते हैं पसीना.
भई अपना काम है बनता, बाक़ी जैसा समझे जनता…

फ़ोटो: गूगल

 

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डॉक्टर दीपक आचार्य

डॉक्टर दीपक आचार्य

डॉक्टर दीपक आचार्य, पेशे से एक साइंटिस्ट और माइक्रोबायोलॉजिस्ट हैं. इन्होंने मेडिसिनल प्लांट्स में पीएचडी और पोस्ट डॉक्टरेट किया है. पिछले 22 सालों से हिंदुस्तान के सुदूर आदिवासी इलाक़ों से आदिवासियों के हर्बल औषधीय ज्ञान को एकत्र कर उसपर वैज्ञानिक नज़रिए से शोध कर रहे हैं.

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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