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फ़ैमिली मैन 2: वेब सिरीज़ जिसके लिए आप वीकएंड की रातें क़ुर्बान कर सकते हैं

जयंती रंगनाथन by जयंती रंगनाथन
June 7, 2021
in ओए एंटरटेन्मेंट, ज़रूर पढ़ें, रिव्यूज़
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फ़ैमिली मैन 2: वेब सिरीज़ जिसके लिए आप वीकएंड की रातें क़ुर्बान कर सकते हैं
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पिछले कुछ समय कई हिट वेब सिरीज़ का दूसरा सीज़न औसत या बेकार रहा है. ऐसे में वर्ष 2019 में आई वेब सिरीज़ फ़ैमिली मैन के दूसरे सीज़न को लेकर मन में थोड़ा संशय था, पर मनोज बाजपेयी और सामंथा प्रभु की भिड़ंत वाला दूसरा सीज़न भी पहले की तरह कमाल ही कहा जाएगा.

वेब सिरीज़: फ़ैमिली मैन 2
कुल एपिसोड: 9
प्लैटफ़ॉर्म: एमेज़ॉन प्राइम
सितारे: मनोज बाजपेयी, प्रियामनी, सामंथा प्रभु, शरीब हाशमी, शरद केलकर, दिलीप ताहिल और अन्य
शो क्रिएटर: राज और डीके
निर्देशक: राज, डीके और सुपन एस वर्मा
रेटिंग: 4/5 स्टार

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जब आप किसी हिट वेब सिरीज़ के दूसरे सीज़न का शिद्दत से इंतज़ार करते हैं, तो एक दांव खेल रहे होते हैं. पहले सीज़न की क़ामयाबी का साया अकसर दूसरे सीज़न पर पड़ ही जाता है. पिछले दो सालों में चाहे सैक्रेड गेम्स हो या मिर्ज़ापुर, आउट ऑफ़ लव हो या फ़ोर मोर शॉट्स प्लीज़ अपने पहले सीज़न के मुक़ाबले इनका दूसरा सीज़न ठंडा रहा. सैक्रेड गेम्स का दूसरा सीज़न तो बेहद स्लो और बोरिंग था. उसके मुक़ाबले मिर्ज़ापुर के दूसरे सीज़न में फिर भी दम था. यह ख़तरा फ़ैमिली मैन 2 के साथ भी था. पहला सीज़न दमदार, जानदान और चौंकाऊ था. हर क़दम पर थ्रिल था. ऊपर से मनोज बाजपेयी की ज़बरदस्त ऐक्टिंग, राज और डीके की ग्रिपिंक कहानी और डायरेक्शन ने फ़र्स्ट सीज़न को धमाकेदार बना दिया था. फ़र्स्ट सीज़न के अंतिम एपिसोड को देखते हुए सीज़न दो का इंतजार शुरू हो गया था. सीज़न दो का ट्रेलर कुछ ऐसा था कि देखने की उत्सुकता बढ़ गई.
मैं इस तरह के सिरीज़ वीकएंड पर देखती हूं. शनिवार से इतवार तक, बिंज वॉच करती हूं. मेरे पति ने शुक्रवार से यह सिरीज़ देखना शुरू कर दिया था. इसलिए शनिवार को मैंने छठवें एपिसोड से उनके साथ यह सिरीज़ देखना शुरू किया. उसी दिन रात को मैं पहले एपिसोड पर लग गई. देर रात तक तीन एपिसोड ख़त्म किए और सुबह नाश्ते के साथ चौथा और पांचवां डकार गई. अब कोई इस तरह बिंज वॉच करे, तो इसका मतलब है, सिरीज़ वाक़ई… बेहद रोचक, रोमांचक और ग़ज़ब की बनी है.
बात करते हैं इससे जुड़े मेरे सेंटिमेंट की. सीज़न टू से सुपन एस वर्मा जुड़े हैं. दस साल के थे, तब से उन्हें जानती हूं. कोई अपना जब किसी प्रोजेक्ट से जुड़ा हो, तो उसकी क़ामयाबी आपकी अपनी क़ामयाबी भी बन जाती है. सुपन ने इस सिरीज़ का स्क्रीनप्ले, डॉयलॉग लिखा है और निर्देशन भी किया है.
अब बात करते हैं सीज़न 2 की कहानी के बारे में. हमारे चहेते श्रीकांत टास्क छोड़ कर अब एक एमएनसी में नौ से पांच की नौकरी कर रहे हैं. फ़ैमिली में अभी भी कुछ पंगे हैं. दूसरी तरफ़ श्रीकांत के टास्क के सहयोगी चेन्नई में एक मिशन पर पहुंच गए हैं. आख़िरकार श्रीकांत अपनी नौकरी छोड़ कर वापस वही काम करने लगते हैं, जिसमें उनका जी और जान बसता है.

इस बार कहानी की पृष्ठभूमि में हैं श्रीलंका के एलटीटीई के बचे हुए मेंबर्स, जो इंडियन प्राइम मिनिस्टर से बदला लेने की ताक में हैं. इनके साथ जब इस्लामिक टेरेरिस्ट जुड़ जाए तो बड़ा धमाका होना लाजिम है. मनोज बाजपेई को टक्कर देने पहुंच गई हैं एलटीटीई की राजी, जो इन दिनों चेन्नई में एक फ़ैक्ट्री में काम करती है. राजी की भूमिका में साउथ की सामंथा प्रभु ने जान डाल दी है. वो बंदी आंखों से बात करती है, लड़ती है, गुर्राती है और छा जाती है. सिरीज़ अंत तक रोचक और क्रिस्प है. कहीं आप उलझते नहीं हैं. इस तरह की सिरीज़ को देख कर एक सुकून-सा महसूस होता है कि आख़िरकार हमारे यहां इतने कमाल के स्टैंडर्ड का काम होने लगा है.
बस एक बात, इस सिरीज़ में चुहलपना पहले सीज़न के मुक़ाबले थोड़ा कम है. एलटीटीई या चेन्नई में लोग तमिल में बात करते हैं. मेरे लिए यह एड्वांटेज है क्योंकि तमिल मेरी मातृभाषा है. पर जिन्हें तमिल नहीं आती, उन्हें सब टाइटिल पर लगातार निगाह रखनी होगी. मेरे कुछ मित्रों ने कहा कि उन्हें डॉयलाग समझने में थोड़ी दिक्कत हुई. पर आप अगर कहानी एक रौ में देख रहे हैं, तो मुझे नहीं लगता भाषा आड़े आएगी. तो आनेवाले वीकएंड समय निकालकर फ़ैमिली मैन का दूसरा सीज़न देख डालिए.

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जयंती रंगनाथन

जयंती रंगनाथन

वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन ने धर्मयुग, सोनी एंटरटेन्मेंट टेलीविज़न, वनिता और अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम किया है. पिछले दस वर्षों से वे दैनिक हिंदुस्तान में एग्ज़ेक्यूटिव एडिटर हैं. उनके पांच उपन्यास और तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. देश का पहला फ़ेसबुक उपन्यास भी उनकी संकल्पना थी और यह उनके संपादन में छपा. बच्चों पर लिखी उनकी 100 से अधिक कहानियां रेडियो, टीवी, पत्रिकाओं और ऑडियोबुक के रूप में प्रकाशित-प्रसारित हो चुकी हैं.

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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