सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने और देशभर को उसी मार्ग पर चलना सिखाने वाले मोहनदास करमचंद गांधी या एम के गांधी या हमारे राष्ट्रपिता या हमारे बापू समय के पाबंद तो थे ही, पर उनका हास्यबोध और हाज़िरजवाबी भी कुछ कम नहीं थी. आज, यहां हम उनकी जन्म तिथि के अवसर पर हम उनकी हाज़िरजवाबी से जुड़े कुछ प्रसंग जानेंगे…
सार-सार को गहि रहे, थोथा देई उड़ाय
कबीर दास जी का ये दोहा तो आपने सुना ही होगा:
साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।।
जिसका अर्थ है कि साधु का स्वाभाव किसी अनाज फटकने वाले सूप की तरह होना चाहिए, जो सार तत्व को तो ग्रहण कर ले, लेकिन जो असार, थोथी यानी अनुपयोगी बातें हैं, उन्हें वह त्याग दे. गांधी जी ने इस दोहे को जैसे जीवन में उतार लिया था.
एक बार एक अंग्रेज़ ने महात्मा गांधी को पत्र लिखा. पत्र गांधी जी को मिला तो उन्होंने उसका पत्र पढ़ा. उस पत्र में अपशब्दों और असहमतियों के अलावा कुछ भी नहीं था. गांधी जी ने पत्र को रद्दी में फेंक दिया और उसमें एक आलपिन लगा हुआ था, उसे संभालकर रख लिया. कुछ दिनों बाद वह व्यक्ति जिसने पत्र लिखा था, गांधी से आमने-सामने भेंट करने आया. उसने गांधी जी से पूछा- आपने मेरा पत्र पढ़ा या नहीं?
गांधी जी ने जवाब दिया- मैंने आपका पत्र पढ़ा, बल्कि बड़े ध्यान से पढ़ा.
तो उसने आगे पूछा- फिर उसका क्या सार निकाला आपने?
गांधी जी ने मुस्कुराकर कहा- उसमें से एक आलपिन निकाला है. बस, वही सार था उसमें, बाकी सब असार था तो उसे मैंने फेंक दिया.
आप वॉकर हैं तो मैं भी वॉकर हूं
गांधी जी को समय को बर्बाद न करने के उनके गुण लिए भी जाना जाता है. उनके साथ घटी यह दूसरी घटना न केवल समय का सदुपयोग करने की सीख देती है, बल्कि उनकी हाज़िरजवाबी को भी दिखलाती है. दांडी मार्च के दौरान गांधी जी लोगों के कहने पर एक जगह पर कुछ देर के लिए रुक गए. जब वे वहां से चलने को हुए, तभी एक अंग्रेज़ ने आकर उनसे कहा, ‘‘हेलो मिस्टर गांधी, मेरा नाम वॉकर है.’’ गांधी जी ने उसका अभिवादन किया और चूंकि उनका ध्यान अपने लक्ष्य यानी दांडी मार्च की ओर था और उन्हें दांडी पहुंचना था और मुस्कुराकर बाले, ‘‘आप वॉकर हैं तो मैं भी वॉकर हूं.’’ ये कहते हुए वे चलते यानी वॉक करते हुए, वहां से अपने लक्ष्य की ओर निकल पड़े. तब किसी ने उन्हें बताया कि यदि आप उनसे मिल लेते तो आपका नाम अख़बारों में भी आता, आप और प्रसिद्ध हो जाते. गांधी जी ने कहा, ‘‘मेरे लिए प्रसिद्धी से कहीं ज़्यादा मेरा समय क़ीमती है!’’
दूसरे ‘प्लस फ़ोर’ पहनते हैं, मैं ‘माइनस फ़ोर’
जब आप अपना ख़ुद का ही मज़ाक बना लेते हैं तो कोई दूसरा आपका मज़ाक बना ही नहीं सकता. गांधी जी से जुड़ा यह किस्सा महात्मा गांधी की मृत्यु के बाद 1969 में, उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लॉर्ड माउंटबेटन ने सुनाया था, जिसे हम यहां जस का तस पेश कर रहे हैं, जिससे आपको पता चल जाएगा कि महात्मा गांधी, जिनका पहनावा एक वक़्त के बाद धोती और शॉल ही हुआ करता था और उन्हें अपने पहनावे पर मिलने वाली टिप्पणियों की भी कोई परवाह नहीं थी, बल्कि वे तो ख़ुद ही अपने पहनावे के बारे में मज़ाक बना लिया करते थे.
गांधी जी को श्रद्धांजलि देते हुए लॉर्ड माउंटबेटन ने कहा था- यहां हम जिस व्यक्ति को उसकी शताब्दी श्रद्धांजलि देने के लिए इकट्ठा हुए हैं, वह छोटे शारीरिक कद का था. गंदे कपड़े पहने हुए, नंगे पैर या सैंडल पहने हुए, उसकी सस्ती-सी जेब घड़ी, डोरी के एक टुकड़े पर लटकी होती थी और यह तस्वीर पूरी होती थी स्टील-रिम वाले चश्मे की एक जोड़ी के साथ. वास्तव में कुछ लोगों को वह एक अजीब-सा, छोटा-सा व्यक्ति लगा होगा. लेकिन उनके शरीर के छोटे ढांचे के भीतर, एक इतना बड़ा दिल था कि इसमें सभी गरीबों और पीड़ितों को शामिल किया जा सकता था. उसके दिल का एक हिस्सा उन लोगों को क्षमा करने और इसके लिए बहाने खोजने के लिए तैयार था, जो उसके दुश्मन थे. उन्हें इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता था कि बिना सोचे-समझे लोग उनके रूप-रंग को लेकर उपहासपूर्ण टिप्पणियाँ करते थे.
उस समय यहां भीख मांगने वाले निकरबॉकर (बैगी जैसे ढीले-ढाले पतलून, जो घुटने से करीब 4 इंच नीचे तक लटकते हैं) लोकप्रिय थे. उन्होंने अपनी लंगोटी से उसकी तुलना करके ये कहकर सभी की बोलती बंद कर कि दूसरे ‘प्लस फ़ोर’ पहनते हैं, मैं ‘माइनस फ़ोर’ पहनता हूं. उन्हें केवल इस बात की परवाह थी कि लोग उनके उपदेशों और अहिंसा के उनके व्यक्तिगत उदाहरण का अनुसरण करें. उनके कपड़ों की तरह ही उनका संदेश भी सरल था. यह यीशु की शिक्षा का पालन करना था, “अपने पड़ोसी से भी अपने जितना ही प्रेम करो.







